एक थी, आरजू….एक थी, जयश्री….? एक थी पाल…?

विशेष संवाददाता
इस तरह मृत और गायब हो रही महिलाओं के मामले के लिए भी एक सूची बननी चाहिए और उन्हें सबको “शहडोल की बेटी” का दर्जा मिलना चाहिए ।
शहडोल|इससे यह तो साबित होगा ही यह सब शहडोल की बेटियां थी और हमारा कुशल पुलिस प्रशासन इन्हें अलग-अलग नजरिए से देखता था। इसलिए कुछ में तो कुछ में प्रश्न चिन्ह लगता है। और महिला सशक्तिकरण कार्यालय
के जरिए किसी चौराहे में एक स्मारक के रूप में इनका नाम अंकित होना चाहिए ताकि हर आने वाली पुलिस प्रशासन को यह याद रहे कि यह भी उनकी जिम्मेदारी थी…? जो शहडोल की बेटियां थी, जिनके लिए तत्काल कोई प्रयास नहीं किए गए.. और वे अपने खतरनाक अंजाम की ओर चली गई अथवा खतरनाक अंजाम में जी रही हैं.. जिसके लिए पुलिस और प्रशासन मूक बधिर और नेत्रहीन भी बना बैठा है…।क्योंकि यह सब एक फाइल है। या तो जिन्हें क्लोज करना है या फिर क्लोज करने की दिशा में वे लंबित है ।मनुष्य या मनुष्यता के दायरे में इन फाइलों का कोई सरोकार दिखने में तो समझ में नहीं आता। कम से कम अनुभव यही बताता है।
कह सकते हैं कि पुलिस के बस यही काम नहीं है…, उसके पास बहुत काम है। उन कामों में पुलिस थाने का निर्माण कार्य से लेकर शहडोल मुख्यालय में स्पीड ब्रेकर जैसी छोटी चीज पुलिस यातायात कार्यालय के सामने हॉस्पिटल के पास लगाई जाती है और फिर उसमें से कुछ उखड़ जाती हैं, टूट जाती हैं क्योंकि वह घटिया होती हैं ।बाकी लगी रहती हैं यह सिद्ध होने के लिए कि वह घटिया है अथवा नहीं….? यह भी अलग बात है कि उसका भुगतान ठेकेदार को हो जाता है या नहीं…? अथवा उसे ब्लैक लिस्टेड किया जाता है अथवा नहीं ….? पूरे शहर में लगे स्पीड ब्रेकर यह प्रमाणित करते हैं कि पुलिस प्रशासन छोटी से छोटी चीज से लेकर शहडोल में गायब हो चुकी बच्चियों और महिलाओं के मामले में सिर्फ स्पीड ब्रेकर की फाइल के नजर की तरह देखता है ।

यदि कहीं कोई व्यक्ति हाईकोर्ट पहुंच जाए अपने घर की महिलाओं को पुलिस की लापरवाही से गायब हो जाने अथवा किसी शैतानों की जंगल में चले जाने की आशंका से, तो उच्च न्यायालय में फाइल यह कह कर मूव कर दी जाती है की हमने गुमशुदा की तलाश के लिए ₹5000 इनाम देने की भी घोषणा की थी।
तो अगर ₹5000 में गायब महिला वापस आ सकती है तो पूरी पुलिस प्रशासन व्यवस्था में इस संदर्भ में करोड़ों रुपए खर्च करने की आखिर क्या जरूरत है…? हाई कोर्ट को स्वयं पांच दस हजार रुपये खर्च करने वाला विज्ञापन छपवा देना चाहिए, आवेदक से लेकर…?
तो फिर महिला और बच्चों का संरक्षण के लिए अलग से प्रकोष्ठ बनाने की किन कारणों से आवश्यकता है, यह समझ से परे है..? इस सबमे ज्यादा यह बात सबसे चिंताजनक है
कि अगर नगर में भारतीय जनता पार्टी का प्रशासन हो, प्रदेश और देश में या दूसरे प्रदेश में भी भाजपा का प्रशासन हो तो भी महिलाओं के संरक्षण की जिम्मेदारी मे प्रश्नचिन्ह क्यों लगना चाहिए, क्योंकि जब भी कभी महिला संरक्षण का पर्यावरण विकसित नहीं है तो भाजपा का नैतिक बल महिला प्रकोष्ठ आखिर कर क्या रहा है ..?
कितने मामलों में महिला मोर्चा ने पुलिस और प्रशासन पर प्रश्न खड़े किए हैं… शायद एक भी नहीं…? इसलिए की महिला मोर्चा या राजनीतिक नेत्रियों का महिला अपराधों के मामले को लेकर क्या कोई सोच है…? नहीं, दुनिया की सबसे बड़ी अनुशासनिक राजनीतिक सदस्यता वाली पार्टी का दंभ भरने वाली भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं को एक “टूल्स” की तरह इस्तेमाल किया। वह चाहती तो महिला प्रकोष्ठ को महिलाओं के संरक्षण के लिए जवाबदेह बनाती और शायद यही कारण था की महिलाओं की यह आरजू रह गई..? और वह भी “उपयोग करो और फेंक दो” के अंदाज में राजनीतिक हथियार बन कर रह गई…। बहुत ज्यादा हुआ तो भ्रष्टाचार का, भ्रष्ट नेताओं के साथ जमकर उपयोग किया…. शायद भाजपा की नजर में यही महिला जागरूकता है..।

और यह भाजपा का भर दोष नहीं है कांग्रेस के अंदर भी “उपयोग करो और फेंक दो” की राजनीति चलती रही है। दूसरे दल भी कभी जवाब देह नहीं रहे ।
नतीजतन शहडोल की बेटी, आरजू के मामले में जिसकी उसके ससुराल वालों ने भारी प्रताड़ना देकर अंततः मौत के घाट उतार दिया। शहडोल वासी सभी लोग शामिल होकर मौन साधना के साथ अपने जिला प्रशासन के पास गए।
ताकि कलेक्टर शहडोल बता सकें उत्तरप्रदेश की योगी सरकार को, कि क्या इसमें न्याय होगा, दोषियों को फांसी चढ़ाया जाएगा….?
यह हमारी निराशा और हताशा का एक बड़ा प्रमाण पत्र है। आखिर क्या कारण है की प्रशासनिक अमला जवाबदेह नहीं हैं, उन्हें इस पूरी भीड़ को देखकर एक चिट्ठी राज्य सरकार के माध्यम से या अपनी व्यवस्था से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को भेजकर यह आशा करनी चाहिए। किंतु क्या इस पूरी भीड़ में यह बात उन्हें दिख पाई कि उनके अपने जिले में गायब हो चुकी महिलाओं के मामले यानी “शहडोल की बेटियों” के मामले में कोई जवाबदेही है…? क्या पुलिस और प्रशासन के साथ इस मुद्दे पर निष्कर्ष निकले की कुल कितनी महिलाएं अभी तक शहडोल में गायब हैं और जिन पर इनाम घोषित है तो उन्हें ढूंढ कर क्यों नहीं लाया गया या वे जहां हैं तो क्या सुरक्षित हैं…?
हाल में बम्होरी गांव की एक बहू जो कहीं की बेटी रही होगी वह अचानक गायब हो गई, पुलिस को
तत्काल खबर भी मिल गई की किसी मुस्लिम ऑटोवाले ने अकेले इस बहू को बैठा कर अपने आटो से बुढ़ार पहुंचा दिया इसके बाद उसे बुढार की जमीन खा गई यह आसमान..? यह पुलिस को नहीं मालूम। 1 हफ्ते से ज्यादा हो गया है। अगर परिवार सक्षम होगा तो कुछ दिन या महीनों बाद बाद हाई कोर्ट जाएगा जहां से निर्देश मिलने पर जिला पुलिस अधिकारी ₹5000 का गुमशुदा वाला विज्ञापन प्रकाशित करा देंगे…।

कहते हैं जब यह महिला का मामला डीवाईएसपी सोनाली गुप्ता के कार्यालय में पहुंचा तो किसी पुलिस के कर्मचारी ने टिप्पणी की कि “यार, देखो वह के किसी के साथ भाग तो नहीं गई..” हो सकता है यह सोच भी सही हो, किंतु यह संवेदनाओं को पुलिस की तरफ से आहत करने वाला परिवार के लिए बड़ा हमला था और शायद यही कारण है कि अक्सर सभ्य परिवार पुलिस थानों में जाने से बचते हैं।
कानपुर में पुलिस थानों में या प्रशासन में इसी प्रकार की असंवेदनशील व्यवहार वाला वातावरण रहा होगा अन्यथा एक इंजीनियर लड़की आरजू फोन करके अपना संरक्षण पा सकती थी अगर उसे खतरा महसूस होता ।किंतु आरजू कटारे की यह आरजू रह गई… तो फिर हाई कोर्ट के निर्देश में जिन्हें प्रकाशित कराकर शहडोल की बेटी जयश्री मिश्रा “रेनू” महिला का पता बताने वाली ₹5000 का इनाम देने तक सीमित कर देने वाले 2016 के मामले में शहडोल की बेटी जयश्री मिश्रा को 4 साल में पुलिस क्यों नहीं ढूंढ पाई….?
कि आखिर उसकी लाश कहां है अथवा वह “शहडोल की बेटी” किस बाजार में बिक गई है या फिर किसी के साथ भाग गई है… (उनकी भाषा में) क्योंकि पुलिस की यही भाषा होती है।
क्योंकि जब रेणु 2016 में थाना शहडोल में आई थी नशे की हालत में उसे पुलिस ने ही खोज कर शहडोल थाने में सुरक्षित किया था। फिर अचानक उसका मेडिकल कराए बिना उसे किन दरिंदों को बेच दिया गया या साथ जाने दिया गया यह तो तत्कालीन टीआई ही बता सकते थे किंतु रेणु तब से लेकर आज तक गायब है….?
और अंततः जिला पुलिस अधीक्षक को हाईकोर्ट के निर्देश पर उसे खोज कर लाने वाले के लिए ₹5000 इनाम देने की विज्ञापन छापना पड़ा।

तो क्या इसी प्रकार की व्यवस्था में जो शहडोल संभाग प्रशासन के रिकॉर्ड में लंबी फेहरिस्त होगी इन्हें देखने का जोखिम पुलिसअधीक्षक ,उप पुलिस महानिरीक्षक अथवा अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक या फिर पुलिस महानिदेशक ,गृह मंत्रालय देखने का काम करता है…? शायद नहीं..?
फिर हमें यह आरजू क्यों करनी चाहिए पुलिस से या प्रशासन से कि वह हमारे आंख के सामने जब यह सब ठीक नहीं कर पा रही है तो कानपुर में वहां भी तो यही प्रशासन है…। इसी प्रकार का पढ़ा लिखा गैर जिम्मेदार तबका है जो लाखों करोड़ों रुपए की तनख्वाह तो उठाता है किंतु वह सिर्फ अपने “मालिक के अर्दली” करता है और उसके इशारे पर काम करता है।
क्योंकि शहडोल की बेटियां और भारत की बेटियां इसीलिए असुरक्षित है ….अगर शहडोल मे नागरिकों की भीड़ , जिसमें सब आशा लेकर जिला प्रशासन के पास पहुंचे थे… उसे समझा जाता तो कम से कम तत्काल दूसरे दिन शहडोल संभाग के जिले की तमाम लंबित फाइलों को झटकार कर सामने लाया जाता और एक बैठक करके यह पारदर्शी तरीके से बताया जाता कि
कितनी बेटियां गायब हैं..? अथवा कितनी बेटियों को मरा मान लिया गया है… या कितनी बेटियों के मामले में किस पुलिस कर्मचारी पर क्या जवाबदेही तय की गई है…?
किंतु लोकतंत्र में भीड़ होती है और और भीड़ शब्द शायद किसी भेड़ से निर्माण हुआ होगा क्योंकि भेड़ चाल से ही भीड़ बनती है…। और हम इसी भीड़ को लेकर मुक, बधिर और नेत्रहीन प्रशासन के सामने सिर्फ रोने पहुंच जाते हैं, कि क्या हमारी बेटियों को न्याय मिलेगा….? क्या हमारी आरजू क्या न्याय मिलेगा…?
अगर न्याय देना सुनिश्चित करना होना दिखता तो शहडोल पुलिस प्रशासन तत्काल पारदर्शी तरीके से यह प्रदर्शित करता…। कम से कम गायब हो रही, गायब हो गई अथवा गुमशुदा दर्ज करके प्रायः बंद कर दी गई फाइलों में शहडोल की बेटियों के मामले में पुलिस ने क्या जवाबदेही दिखाई है…? और यदि ऐसा किया गया होता तो जो स्थानीय अपराधी और पुलिसयो का कनेक्शन है वह भयभीत होता। कि नहीं, बेटियों के मामले हमारी आरजू सुरक्षित है ।
किंतु फिलहाल तो ऐसा नहीं दिखा, तो फिर आरजू के लिए इस भीड़ का जिसमें सभी दल के नेता और नागरिक थे इतने बिचारे बनकर क्यों रह गए.? क्या यह नेता और नागरिक एक बार बैठ कर आत्म चिंतन करेंगे की बेटियों के मामले में, बहुओं के मामले में प्रशासन पारदर्शिता दिखाएं ….?

अन्यथा जिनका भ्रष्टाचार जन्मसिद्ध अधिकार है वह तो गाजियाबाद के शमशान गृह में किसी ठेकेदार की धांधली भी 22 लोग मार डाल जाते हैं ..।यही सिद्ध हुआ।
क्या इस गलतफहमी को जिला पुलिस प्रशासन अपने पारदर्शी कार्यप्रणाली से दायित्व मानते हुए शहडोल की बेटियों के मामले में कोई प्रकाशन करेगा की कितनी महिलाएं जो गायब हो गई हैं उनकी लाश हम दे रहे हैं… उनकी बदतर हालात हम दे रहे हैं…?
क्योंकि हम सरकार का नमक खा रहे हैं…, इसलिए हम नमक-हलाल हैं, नमक-हराम नहीं। तो देखते चलिए आगे-आगे होता है ..?
क्या हमारी शहडोल की मौन भीड़ की आरजू सुरक्षित है….?

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