कहीं नक्सलवादी प्रेरित अपराध तो नही…?

*आखिर किसके कहने पर सीसीटीवी फुटेज हटाए गए…?
*विवेचना में लापरवाही…
*पुलिस 107/116 में पड़ी रही और लूट गई उनकी दुकान..
*और मध्यरात्रि टल गई कोई बड़ी वारदात…?
विशेष संवाददाता….
शहडोल|चलो पुलिस की तरह यह मान लेते हैं की कोतवाली के बगल में चार-पांच साल पहले एक कमरे में मिली निर्वस्त्र युवक की लाश, जिस जहरखुरानी से हुई थी वह आत्महत्या का कारण भी हो सकता है…,तो पहले युवक निर्वस्त्र हुआ फिर जहर पीकर आत्महत्या कर लिया होगा..? तो यह भी मान लेते हैं घटना के कुछ ही दिन के अंतराल में इसी युवक की बालाघाट में अपने पति द्वारिका के साथ रहने वाली बहन को शहडोल कल्याणपुर के बंद दुकान से कोतवाली पुलिस सुबह नसे की अर्ध-विक्षिप्त हालत में पड़ोसी निवासी ज्ञानचंद के सूचना पर शटर तोड़कर कोतवाली पुलिस ने लाया गया और बिना मेडिकल कराए रात्रि होते होते उन्हीं को सौंप दिया गया शायद जिन्होंने इस बहन की हत्या का इस तरह प्रयास किया था… कोई प्रकरण भी नहीं दर्ज किया गया |
भाई की तरह बहन ने भी पुलिस को शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी हत्या हो सकती है…,उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है फिर भी संदेही अपराधी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होती और बहन अंततः गुमशुदा हो जाती है पुलिस रिकॉर्ड में भी| यह अलग बात है की पुलिस ने उसे जिंदा मान रखा है यह भी सच हो सकता है कि सहज महिला वह अपने पतित जिंदगी से गुमशुदा बहन कहीं आत्महत्या कर ली हो…? जैसे भाई की निर्वस्त्र लाश उसके कमरे में मिल जाती है और उसे पुलिस जहरखुरानी पाए जाने पर भी आत्महत्या के दृष्टिकोण से देखना चाहती है, शायद गंभीरता से दोनों प्रकरणों में इसीलिये कार्यवाही नहीं की गई|
क्योंकि दोनों ही मामलों में पुलिस में भ्रष्ट व्यवस्था की नजर में दो हत्याओं से एक दुकान और अघोषित आय का जरिया खुल गया| ऐसा भी माना जा सकता है| यह बात यहां समाप्त हो सकती है, किंतु जब अपराधिक मनोवृति पुलिस से संरक्षित हो … तो वह लगातार विकास करती चली जाती है… क्योंकि उसे कानून और व्यवस्था का भय नहीं रह जाता | ऐसे में इनसे प्रभावित दूसरा पक्ष कुछ तो रिएक्शन करता है| और कुछ न्याय की आशा में लोकतंत्र में आवेदन देता-फिरता है कि शायद न्याय मिल जाए…? और न्याय नहीं मिलता.. बल्कि विवाद का कारण बनता है|
तो फिर पुलिस कोतवाली शहडोल की नजर में यह कानून और व्यवस्था में अशांति का कारण होता है.. और इस शांति और कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए धारा 107 /116 में दोनों पक्षों को प्रतिबंधित करने का प्रावधान होता है|
अब चाहे इसे 5हजार में मुचलके पर प्रतिबंधित कर दें या फिर 5लाख या 5करोड़ में भी प्रतिबंधित करने का का काम जैसा पुलिस करती है, किंतु यह सब कुछ कानून व्यवस्था को मानने और समझने वालों के लिए किसी पक्षकार को हो सकता है|
कम से कम उस पक्ष के लिए नहीं जो पुलिस के संरक्षण अथवा अनदेखे में हत्याओं जैसे जुर्म को सफलता के साथ अंजाम देता है और व्यवस्था का अघोषित दुकान बन जाता है; आय का जरिया भी हो जाता है |और अगर इसमें कोई अधिवक्ता भी अपनी रोजी-रोटी ढूंढने लगता है तो सभ्य समाज के लिए एक खतरा हो जाता है, उस वक्त और जब इसमें अनुसूचित जाति ,जनजाति वर्ग के हितों के लिए बनाए गए कानूनों का तड़का लगाया जाता है। या इस प्रकार की महिलाओं को भी शामिल करके यह डर दिखाने का काम होता है कि सभी समाज के लोगों कानून और व्यवस्था से और उसके आतंक को स्वीकार करना सीख लो अन्यथा आपको एससी-एसटी एक्ट में तत्काल गिरफ्तार कर लिया जाएगा |
यह अलग बात है की हाल में जबलपुर में उच्च न्यायालय ने एक मामले में एससी-एसटी एक्ट कोई दर्ज f.i.r. को रद्द किया है और शेष में जांच करने की व्यवस्था पर आदेश भी पारित किया है इस संबंध में उच्च न्यायालय के अधिवक्ता अजय द्विवेदी ने अपनी याचिका मैं जैतहरी के दयाराम राठौर को न्याय दिलाने का भरसक प्रयास किया और सफलता भी हासिल किया|
तो दूसरी तरफ कोतवाली के बगल में हो रही लगभग 2 मौतों(एक भाई की जहर खुरानी में और दूसरी गुमशुदा में संभावित हत्या) के बाद भी उच्चा्अधकारियों को लगता है 107/ 116 से शांति व्यवस्था की गारंटी हो सकती और सच बात यह है अगर रिपोर्ट, दुकान को सामने ईटा रख करके पीछे सेे अपने अधिवक्ता की सलाह पर पीछे से दीवार तोड़कर फर्नीचर की लाखों की चोरी शिकायत भी इस धुंध में दवा दी जाती है कि मामला शांति और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए 107 /116 का है|
बावजूद 21-22 फरवरी की रात्रि इसी वक्त टाइमिंग के हिसाब से रात्रि में भूमि अतिक्रमण कारी कोई पनिका आदिवासी किसी परस्ते आदिवासियों को मध्य रात्रि में चोरी छुपे दरवाजे का कुंदा तोड़कर अपने घर से होकर अवैध कब्जे की नीयत से मदद देती है और विद्युत कनेक्शन भी ताकि वे रात्रि को हर अपराधिक कृत्य कर सकें.. किंतु पुलिस विवेचना में यह नहीं देखना चाहती की रात्रि को बिजली कहां से है सीसीटीवी फुटेज क्यों संरक्षित नहीं करने चाहिए जिसमें सब पारदर्शी है
ऐसे में अनजाने में शोषणकारी व्यवस्था का जन्म होने लगता है जिसमें सभ्य पक्षकार कानूनी अराजकता का शिकार हो जाताा है, कुुछ इसी प्रकार का मामला शहडोल कोतवाली के बगल में विगत दिवस घटता रहता है और पास पड़ोस के नागरिक बिना यह सोच मिटाते हैं की उनके सीसीटीवी कैमरे में अपराधिक कृत्य को करने वाले कहीं नक्सलवादी विचारधारा के लोग चुपचाप एंट्री तो नहीं …?उनके चेहरे चिन्हित होना इसलिए भी जरूरी था क्योंकि मामला डिंडोरी और बालाघााट में भ्रष्ट व्यवस्था पर सोच रखनेे वाली व्यक्तियोंं से रहा। क्योंकि नक्सलवादियों के संबंध कानूूून और व्यवस्था नहीं मानने वाले लोगों केे ज्यादा संपर्क में रहते हैं। और यदि इसमें कोई तिवारीअधिवक्ता दिन रात सतत संलग्न है तो यह खतरनाक नए कारण भी अपराधों केेे लिए बन सकते….| लेकिन अगर सीसीटीवी से साक्ष्य फुटेज नष्ट कर दिए जाएं तो यह भी अगर कथित तौर पर नक्सलवादी देर रात कोतवाली केेे बगल में परिचालन किए हैं तो खतरनाक संदेश हो सकता है|
फिर सब बातें निरर्थक हो जाएंगी की दो हत्याएं.., दुकान लूटना और अपराधिक षड्यंत् के प्रकरण को 107/1 16 में बदल देना अथवा एससी-एसटी का भय बना कर रखना बेमानी साबित होगा …? क्योंकि उनकी मानसिकता अपनेेे निर्णय को सही ठहरा कर दंंड देने उनके निजी कानून पर निहित होती है… फिर पक्षकार सभ्य समाज की सामूहिक हत्या अगर होती है तो यह कोतवाली पुलिस के लिए और संभागीय मुख्यालय पुलिस केेे लिए भी हो सकता है एक घटना कहलाए किंतु शहडोल आदिवासी क्षेत्र की शांति और व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती होगी अगर नक्सलवादी उस सीसीटीवी फुटेज में चिन्हित होते हैं…?
अन्यथा लगातार अपराधिक मनोवृति को मिल रहे प्रोत्साहन को न सिर्फ चिन्हित करना चाहिए बल्कि उन्हें दंडित भी करनाा चाहिये कि आखिर प्रशासन से चूक कहां हो रही है..?, सिर्फ 107 /116 में 5 लाख या 5 करोड़ रुपए का मुचलका बंधपत्र भरके एक पक्ष को शोषण और दमन के जरिए चुुुुुप कराया जा सकता | किंतु अपराधिक मनोवृत्ति का दमन नहीं हो सकता |
किंतु फिलहाल ऐसा पुलिस कोतवाली शहडोल की कागजों में होता दिख रहा है। क्या इसे रोका जा सकता है….?
हमेंं लगता है हमने तब भी प्रयास किया जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व्यवहारी आए थे तब यह बता करके थी “हेलीकॉप्टर से उन्हें रीवा अमरकंटक की हत्यारी सड़क देखना चाहिए…” उनकी मर्जी थी, वह नहीं देखे और इस सड़क के कारण 54 लोग बाणसागर की नहर में डूब कर मर गए ….|
तो क्या फर्क पड़ गया..? शायद कोई फर्क नहीं पड़ा.. कुछ निरपराध एमपीआरडीसी के कर्मचारी निलंबित हो गए… जो कुछ दिन बाद छूट जाएंगे| किंतु अगर कोतवाली के बगल मेंं नक्सलवादियों का आवागमन हुआ है.. तो फर्क बहुत पड़ने वाला है| तो यह सच हो सकता है की पुलिस की हर गतिविधि को भी मानिटरिंग कर रहे और उसमें अपनी संभावना भी तलाश हो सकता है.. लापरवाह व्यवस्था में वह अभी नागरिकों का मर्ड्डर करें..| किंतु इतिहास साबित करता है कि वे सीआरपीएफ की जवानों के समूह की हत्या कर देते हैं.., वह छत्तीसगढ़ में बड़े नेताओं की समूह की हत्या कर देते हैं.. इस पर भी विचार करके 107 /116 की बजाए अपराधों की सूक्ष्मता से विवेचना करना चाहिए कि अगर कोतवाली के बगल में एक ही परिवार में दो हत्याओं के बाद लगातार घटनाएं घट रही हैं तो उसमें बालाघाट और डिंडोरी के पृष्ठभूमि से उभरे अपराधिक चरित्र नायकों ने क्या नक्सलवादियों से प्रेरित व्यक्तियों को प्रवेश तो नहीं दिया है….
बाकी जब मुख्यमंत्री ने हेलीकॉप्टर से हत्यारी सड़क नहीं देखी तो पुलिस प्रशासन क्या यह सब चेतावनी के बाद भी शक की सुई के रूप में देख सकती है..? सोचने में कुछ कम जान पड़ता है| देखते हैं क्या पुलिस सूक्ष्मता से और विवेचना में देरी के कारण यदि पारदर्शी तरीके से दुकान को लूटा जाता है या घर के अंदर रात को प्रवेश दिया जाता है तो क्या कारण थे.. क्या पुलिस देखेगी ….?हम भी देखेंगे…

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