श्रेष्ठता के पैमाने पर शुक्ला का पेशाब और आदिवासी दशमत की माफी

इस मंच के जरिए अब तक सैकड़ों बार आपसे मुखातिब हुआ हूं। आप सोच रहे होंगे कि इस मंच के जरिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक, सभी मुद्दों पर बातचीत हुई। खासतौर पर सामाजिक मुद्दों पर तो मैं इस मंच के जरिए आपसे बारंबार रूबरू होता रहा हूं। फिर मध्यप्रदेश के सीधी जिले का इस अमानवीय मुद्दा क्यों छूट गया? आखिर इस मंच पर बीमार मानसिकता वाले प्रवेश शुक्ला के घिनौने कृत्य पर चर्चा क्यों नहीं हुई? वही प्रवेश शुक्ला जिसने शराब के नशे में एक आदिवासी युवक दशमत रावत पर पेशाब कर दिया?
मुझे आप जो कहिये या जो समझिये। मैं इस मुद्दे पर इस मंच के जरिए बात नहीं करना चाहता था। वह इसलिए कि हमारे बहुसंख्यक समाज में यह नई बात नहीं है। यह सदियों से चलने वाला अंतहीन सिलसिला है। यहां एक वर्ग विशेष उच्च जाति के अहंकार में इस कदर डूबा हुआ है कि उसके खुद की श्रेष्ठ होने की भावना किसी को इंसान ही नहीं समझती। अपने देश में ऐसी घटना नई नहीं है। जाति के आधार पर अपमानित करने की अनगिनत घटना रोज घटती है। यह मामला आपसे सामने इसलिए आ गया कि इसका वीडियो बन गया। यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वीडियो नहीं बनता तो यह आई गई बात हो चुकी होती।
विश्वास नहीं हो तो संसद में सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों पर ही नजर डाल लीजिये। संसद में पेश किए आंकड़ों के मुताबिक साल 2018 में दलितों पर अत्याचार के 42 हजार सात सौ तिरानबे मामले सामने आए थे जबकि पिछले दो साल बाद यानी 2020 में यह आंकड़ा बढक़र 50 हजार हो गया।। वहीं अगर आदिवासियों की बात करें तो साल 2018 में उनके खिलाफ अपराधों के 6,528 मामले दर्ज किए गए, जो वर्ष 2020 में बढक़र 8 हजार दो सौ बहत्तर हो गए। 2019 में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, दलितों के खिलाफ 45 हजार नौ सौ इकसठ मामले और 7 हजार पांच सौ सत्तर 570 अपराध दर्ज किए गए थे। आंकड़ों पर ध्यान देते हुए यह मत भूलिये कि यह वे मामले हैं जिसमें एफआईआर दर्ज हुए। न जाने ऐसे कितने सैकड़ों-हजारों मामले होंगे जो थाने और जांच की दहलीज तक पहुंचे ही नहीं। बड़ी संख्या में शिकायतें दर्ज न होने के बावजूद आजादी से ले कर अब तक दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अपराध में सालों साल बढ़ोत्तरी ही हुई है।
आपका सवाल होगा कि फिर इस मंच पर पेशाब कांड की चर्चा क्यों? जब आप इस मंच पर इस विषय पर चर्चा ही नहीं करना चाहते थे तो घुमा फिर कर उसी टॉपिक पर क्यों आ गए? आ इसलिए गए कि पेशाब कांड के बाद कई ऐसी घटना हुई, जिसके कारण इस पर बात करना जरूरी हो गया। मतलब शुक्ला गिरफ्तार हुआ। उसके घर पर बुलडोजर चला। चुनावी राज्य मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आदिवासी युवक को अपने घर पर बुला कर पांव धोए। उन्हें मुआवजा दिया। उनसे माफी मांगी। इस घटना मामले में आरोपी की लानत मलामत की। इससे भी बड़ी एक और बात हुई, जिसके कारण इस मंच पर इस कांड की चर्चा जरूरी हो गई। दरअसल जब पीडि़त आदिवासी दशमत रावत ने आरोपी को माफ कर देने की अपील की, तब लगा कि इस विषय पर चर्चा जरूरी है।
दशमत रावत ने कहा कि पीडि़त उसके गांव के पंडित हैं। उन्हें अपने किए पर पछतावा है। इसलिए आरोपी शुक्ला को अब रिहा कर दिया जाना चाहिए। मुझे नहीं पता कि दशमत ने किन परिस्थितियों में आरोपी शुक्ला को माफ कर देने की गुहार सरकार से लगाई है। हो सकता है कि सामाजिक तानेबाने में उस पर सामाजिक दबाव हो। अगर दशमत ने दबाव में माफ कर देने की गुहार नहीं लगाई है तो इससे खूबसूरत कोई बदला नहीं हो सकता। कभी-कभी माफ कर देने से बड़ा बदला नहीं लिया जाता। दशमत ने माफ कर देने की गुहार लगा कर आरोपी शुक्ला और उसके पैरोकारों को बहुत छोटा कर दिया है। शुक्ला के जातीय अहं को अपने माफी से बेदर्दी के साथ कुचल दिया है।
मगर यहां एक दूसरा अहम सवाल सरकार के रवैये का है। जाहिर सी बात है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की आदिवासी पीडि़त युवक से माफी दरअसल राजनीति से प्रेरित है। मध्यप्रदेश में चंद महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं। यह भी बड़ा तथ्य है कि राज्य की कई सीटों पर आदिवासी वर्ग जीत हार में निर्णायक भूमिका अदा करता है। इसलिए शिवराज की माफी राजनीतिक माफी है। यह बतौर दिल से मांगी गई माफी नहीं है, बल्कि यह चुनाव में हार मिलने की डर से उपजी माफी है। अगर ऐसा नहीं है तो इससे पहले मुख्यमंत्री ने ऐसी ही दरियादिली क्यों नहीं दिखाई। सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि देश के तीन राज्य उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार में दलितों-आदिवासियों पर सबसे अधिक अत्याचार होते हैं। इन राज्यों में प्रतिदिन अत्याचार की घटना होती है, मगर चुनाव नहीं होने के कारण, मामले के तूल नहीं पकडऩे के कारण ऐसी घटनाओं का राज्य सरकार और मुख्यमंत्री बुलडोजर चलवाना तो दूर संज्ञान लेने तक की जहमत नहीं उठाते। आपको हाथरस में दलित युवती के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या का मामला याद होगा। चूंकि उस दौरान चुनाव नहीं होना था और आरोपी अगड़ी जाति के थे, इसलिए सारा शासन-प्रशासन पीडि़त परिवार के खिलाफ खड़ा हो गया। राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले में विदेशी साचिश सूंघ ली तो प्रशासन ने साफ तौर पर कहा कि युवती से बलात्कार हुआ ही नहीं। इसके उलट मुख्य धारा की मीडिया में बलात्कार के बाद हत्या की शिकार हुई दलित युवती के चरित्र पर सवाल उठाए जाने लगे। हालांकि सीबीआई जांच के बाद जब खुलासा हुआ कि दलित युवती की वाकई सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या की गई थी, तब शासन-प्रशासन बीती ताहि बिसार दे की नीति का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ गई।
फिर मत भूलिए कि हम और आप पेशाब कांड जैसी घटनाओं के आदी हैं। हम ऐसी घटनाओं को देख सुन कर सन्न नहीं रह जाते। हम यह मान लेते हैं कि यह कोई बड़ी घटना है ही नहीं। समस्या हमारी मानसिकता है। हमने अपने आसपास यही देखा है। जिस आदिवासी ने सिर पर पेशाब सहा, उनके बाप-दादाओं ने भी यही सहा है। पीडि़त आदिवासी ने भी अपने बाप-दादाओं से यही सुना है। पीडि़त आदिवासी युवक ने अपने बाप-दादाओं से सुन रखा होगा कि कैसे उसके समाज के लोगों की बस इस बात पर जूतों से पिटाई हो जाती थी कि वह अपने लिए निषिद्ध जगह पर बैठ गया। ऐसे में बात इसलिए बिगड़ गई कि घटना का फोटो खिंच गया और वीडियो बन गया। बात इसलिए भी बिगड़ गई कि मध्यप्रदेश में चंद महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं।
फिर सवाल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के रवैये का है। आदिवासी वर्ग में संदेश देने के लिए उन्होंने पीडि़त को घर बुला कर उसके पांव धोए। यहां तक बात ठीक थी। मगर चुनावी लाभ या राजनीतिक घाटे की भरपाई के लिए इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो बनवा कर प्रसारित कर दिया। सवाल है कि पांव धोने से सिर पर पड़ा पेशाब कैसे धुलेगा? शिवराज ने पांव धोने की तस्वीर के जरिए पेशाब वाली तस्वीर को छोटी करने की कोशिश की। मगर इस कोशिश में उन्होंने पीडि़त आदिवासी का बड़ा अपमान कर दिया। इस तस्वीर ने पूरी दुनिया के सामने पीडि़त का चेहरा ला दिया। अब पीडि़त दशमत कहीं भी जाएगा, लोग उसके सिर पर पेशाब करते हुए वीडियो के दृश्य याद करेंगे। मतलब भविष्य में यही दशमत की पहचान बन कर रह जाएगी।
अब आप पूछेंगे कि फिर सरकार को क्या करना चाहिए था? जवाब बेहद सरल मगर इसे पूरा करना उतना ही कठिन है। जवाब है आरोपी के घर को बुलडोजर के ढहाने से पहले न्यायिक प्रक्रिया के तहत पीडि़त को न्याय दिलाना चाहिए था। मुख्यमंत्री को समझना चाहिए था कि पांव धोने से सिर पर पड़ा पेशाब नहीं धुलेगा, मगर त्वरित न्याय दिलाने से ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति पर लगाम लग सकती थी। बुलडोजर चलाने से पहले मुख्यमंत्री शासन-प्रशासन को त्वरित न्याय उपलब्ध कराने का निर्देश देते। न्याय के जरिए पीडि़त के सिर का पेशाब धोना चाहिए था। इसके उलट मुख्यमंत्री ने पीडि़त को पांव धोकर कर उससे भी बड़ी बात वीडियो बना कर बड़ा अन्याय किया। अब पीडि़त दशमत रावत आजीवन अपने सिर पर पेशाब की बदबू ढोता रहेगा। गांव, बिरादरी, समाज, रिश्तेदार पेशाब कांड से ही उसकी पहचान तय करेंगे। कोई उसके घर का पता पूछेगा तो लोग पूछेंगे वही दशमत जिसके सिर पर पेशाब कर दिया गया था? मुख्यमंत्री ने इस मामले का उल्टा इलाज किया। चोट सिर पर लगी थी और इलाज पांव का कर दिया।
वैसे भी जाति हिंदू समाज का कोढ़ है। जाति के आधार पर नीच और श्रेष्ठता का भाव की पैठ बहुत गहरी है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सही लिखा था। उन्होंने कहा था कि हिंदू समाज में नीची से नीची करार दी गई जातियां भी अपने से नीची जाति ढूंढ लेती है। इसलिए ढूंढ लेती है कि यहां जातिगत श्रेष्ठता का अहं बहुत बड़ी बात है। जाति के आधार पर श्रेष्ठता का यह भाव सदियों से चला आ रहा है। दरअसल यह एक मानसिक बीमारी है। बुलडोजर चला कर और पांव धो कर इस बीमारी का इलाज संभव नहीं है। इसका इलाज न्याय और समाज सुधार आंदोलन है। मुश्किल यह है कि अपने देश में सती प्रथा के बाद कोई सामाजिक आंदोलन ही नहीं हुआ। दूसरी मुश्किल यह है कि हमारी वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था भी इसकी पोषक है। इस व्यवस्था ने वोट और राजनीतिक लाभ के लिए पूरे समाज को जातियों के खांचे में बदल दिया है।

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