भारत में सबसे तेजी से उभरता हुआ वेब न्यूज़ चैनल

सत्ताधीशों ने दिया ठेका, छुटभैयों ने रास्ता छेका
ठेका कंपनी सहकार ग्लोबल के वाहनों को रोका, हर गाड़ी कमीशन की मांग का माना जा रहा मामला

272
Above News


शहडोल।सत्ता यानी शासन ने जिले मे रेत के उत्खनन एवं परिवहन का ठेका दिया और ठेकेदार कंपनी नें अपना कारोबार आरंभ भी कर दिया लेकिन सत्तारूढ़ दल के स्थानीय नुमाइंदों को सत्ताधीशों की यह बात रास नहीं आई और उन्होने रेत की गाड़ियों का रास्ता छेंक (अवरुद्ध कर) दिया। खादी के दबाव में आकर खाकी ने भी अपना सुर बदला और रेत वाहनों पर जुर्माना एवं चालान  का दौर चल पड़ा जो करोड़ों खर्च कर ठेका हासिल करने वाली फर्म के जी का जंजाल बनता जा रहा है। सत्ता के नुमाइंदों की मंशा क्या है यह तो वह ही जानें फिलहाल सहकार का दम, कथित समानांतर सरकार के चलते घुटता नजर आ रहा है। यदि कंपनी ने ठेका छोड़ा तो किरकिरी तो प्रदेश की मोहन सरकार की भी होगी।

शहडोल। रेत कारोबार ( उत्खनन एवं परिवहन) को लेकर जिले में गतिरोध की स्थिति बनती नजर आ रही है। खादी और खाकी के बीच बने समीकरण ने रेत ठेका कंपनी के पुराने सिस्टम को नकारते हुए रेत की निकासी और परिवहन के कार्य को काफी मुश्किल बना दिया है। सत्तारूढ़ दल के स्थानीय नेताओ कार्यकर्ताओं ने अपना नाका स्थापित कर रेत लोड गाड़ियों की आवाजाही तो रोकी ही पुलिस थानों ने भी अपना सिक्का कसते हुए चालान और जुर्माना वसूलना शुरू कर दिया जिसने ठेका कंपनी की राह को कठिन बना दिया है।
क्या है वजह
रेत के उत्खनन एवं परिवहन में व्यवधान उत्पन्न किए जाने की वजह क्या है यह तो सही मायने में अवरोध उत्पन्न करने वाले नेता कार्यकर्ता ही बता सकते हैं। उनकी अपनी दलील हो सकती है लेकिन जो आम जुबान पर चर्चा है उसके मुताबिक यह सब रेत के कारोबार में भागीदारी के लिए किया जा रहा है इसके पहले के रेत ठेकेदारों द्वारा स्थानीय स्तर पर भाजपा नेताओं या उनके चहेतों को खदानों का ठेका देकर कारोबार किया जाता रहा है जिससे वैध अवैध दोनों तरह से उनकी अच्छी कमाई हो जाती थी। सहकार ग्लोबल लिमिटेड ने ऐसा करने के बजाय अपने खुद के संसाधनों और लोगों के माध्यम से रेत का कारोबार संचालित किया जो यहां के नेताओं को नागवार गुजर रहा है और यही वजह है कि ठेका और ठेकेदार को फेल करने के लिए यह सब प्रपंच रचा जा रहा है।
रेत में कमल खिलाने का प्रयास ?
जन चर्चाओं पर यदि विश्वास किया जाए तो रेत ठेकेदार के विरुद्ध चल रही मुहिम का नेतृत्व भाजपा के नेताओं द्वारा किया जा रहा है? उनके निर्देश पर ही स्थानीय स्तर पर भाजपा नेताओं कार्यकर्ताओं द्वारा रेत के उत्खनन और परिवहन पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं? बताया जाता है कि लुकामपुर रेत खदान से कई दिनों से रेत लोड वाहन नहीं निकल पा रहे हैं जो निकलते भी हैं उन्हें थाना पुलिस द्वारा रोक कर उनकी चालानी व जुर्माने की कार्रवाई की जा रही है, जिससे लोगों को यह लगने लगा है कि जिले की पुलिस भी भाजपा नेताओं के दबाव में आकर काम कर रही और ठेकेदार को लगातार परेशान कर जड़ से उखाड़ने का प्रयास किया जा रहा है ? यानी तालाब में कीचड़ के बजाय नदी की रेत में कमल खिलाने का प्रयास किया जा रहा है ?
दबाव में पुलिस?
अपराध और वैधानिक गतिविधियों के साथ ही इनमें संलिप्त तत्वों के कारनामों पर रोक लगाने वाली जिले की पुलिस की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए जाने लगे और दबी जुबान यह चर्चा होने लगी है कि पुलिस भाजपा नेताओं के दबाव में काम कर रही है। कुछ महीने पहले तक जिन पुलिस कर्मियो को रेत के वाहनों को देखने तक की इजाजत नहीं थी अब वही पुलिसकर्मी कहीं भी रेत भरे वाहनों को रोक कर उनकी जांच के नाम पर चालान व जुर्माना की कार्यवाही को अंजाम दे रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि सत्तारूढ़ दल के नेताओं के दबाव बस पुलिस ने भी रेत ठेकेदार के खिलाफ अभियान में अपनी परोक्ष भागीदारी निभानी शुरू कर दी है। यदि यह वास्तव में सच है तो इतना तो तय है कि ठेकेदार का इस जिले में काम कर पाना असंभव प्राय हो जाएगा जो कहीं न कहीं प्रदेश में अधिकाधिक निवेश के जरिए विकास को गति देने संबंधी प्रदेश की डाॅ. मोहन यादव सरकार की योजना को पलीता लगाएगा।
मुद्दा कमीशन का
चर्चा यह भी है कि विभिन्न गांवों और ग्रामीण क्षेत्रों में नाकेबंदी में लगे नेताओं और उनके कथित आकाओ का एक उद्देश्य यह भी है की रेत ठेका कंपनी उन्हें हर वाहन पर एक निश्चित कमीशन दे और वह मौज कर सकें। रेत के प्रत्येक वाहन पर कमीशन कि आस में की जा रही नाके बंदी के खिलाफ कोई कार्यवाही जिला व पुलिस प्रशासन द्वारा किया न जाना कहीं ना कहीं इस आशंका को बल प्रदान करता है कि जिला व पुलिस प्रशासन सत्तारूढ़ दल के नेताओं के दबाव में काम करने पर विवश है जो जिला व संभाग के हित में नहीं माना जा सकता है। सच्चाई क्या है इसका खुलासा तो जिला व पुलिस प्रशासन द्वारा की जाने वाली जांच के बाद ही पता चल सकता है बहरहाल जन चर्चाओं का बाजार गर्म है और ठेकेदार व उसके लोग कारोबार को अंजाम दे पाने में स्वयं को समर्थ सा महसूस करने लगे हैं।

खबरों के अपडेट पाने के लिए हमारा फेसबुक पेज लाइक करें| आप हमारा एंड्राइड ऐप भी डाउनलोड कर सकते है|

Comments are closed.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Privacy & Cookies Policy
E-Paper