भारतीय अस्मिता और राष्ट्रीय चेतना के आधार स्तंभ थे आदि गुरु शंकराचार्य अरुण सिंह

आदि गुरु शंकराचार्य की 1237 जयंती मनाई गई
सतना : मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद द्वारा आदि गुरु शंकराचार्य जी की 1237 जन्म शताब्दी गायत्री मंदिर प्रांगण नागोद में आयोजित की गई सर्वप्रथम अतिथियों द्वारा आदि गुरु शंकराचार्य जी के तस्वीर पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्वलित किया गया अतिथियों का स्वागत के पश्चात विकासखंड समन्वयक अरुण प्रताप सिंह द्वारा कार्यक्रम के रूपरेखा राखी साथ ही आदि गुरु शंकराचार्य जी के जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शंकराचार्य जी भारतीय अस्मिता और राष्ट्रीय चेतना के आधार स्तंभ सांस्कृतिक एकता और मानव मात्र में एकात्मकता के उद्घोषक तथा अद्वैतवाद के अजेय। योद्धा थे केरल मे मैं प्रवाहित होने वाली पूर्णा नदी के किनारे कलाड़ी गांव 780 ईसा पूर्व सामान्य ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ था उनके माता-पिता शिव भक्त थे लंबे समय से निःसंतान उसके कारण बहुत दुखी रहते थे एक रात स्वप्न में साक्षात शिवाजी दर्शन हुआ और उन्होंने कहा की एक बालक आपको अल्पायू होगा पर विलक्षण प्रतिभा का धनी होगा पूरे विश्व में कीर्ति स्थापित करेगा और एक शतायु होगा वह साधारण होगा के माता-पिता बड़े संकट में थे अल्पायू बालक का चुनाव किया ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु की तलाश हेतु 8 वर्ष की अवस्था में उन्होंने भारत भ्रमण के लिए अकेले ही चल पड़े इस बीच आने को आश्रम ऑन गुजरे तथा कई नदियों को पार करते हुए रास्ते में मिलने वाली चुनौतियां सामना किया और अपने मिशन की ओर बढ़ते हुए प्राकृतिक अवरोधों पर विजय प्राप्त की मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में गुरु गोविंदपाद जी सानिध्य में रहकर ज्ञान प्राप्त किया कई चुनौतियों का सामना करते हुए हिंदू धर्म को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उन्होंने भारत भ्रमण कर चारों दिशाओं में चार मठ श्रृंगेरी, पूरी, द्वारिका और बद्रीनाथ की स्थापना की जो हिंदू धर्म के लिए महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में आज भी पहचाने जाते हैं उमाशंकर गर्ग जी ने कहा कि अद्वैत वेदांत दर्शन में ब्रह्म का परम वास्तविकता परम सत्य है ब्रह्म सत्य है और यह सभी जगह का आधार है वह मानते थे कि सभी जीव और वस्तुएं ब्रह्म के ही भाग है और इसलिए एक ही है रमाशंकर शुक्ल ने कहा कि आदि गुरु शंकराचार्य जी के कहां की बालक शंकर उदयईमान सूर्य के समान थे थोड़े ही काल में वह चारों वेदों और उनकी शाखाओ में पारंगत हो गए 6 वर्ष की अवस्था में उन्होंने बालबोध संग्रह लिखा जिससे उनके सहपाठी संस्कृत ग्रंथों की समुचित व्याख्या कर सके।
साहित्यकार शालिक शर्मा जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि केवल शंकर जब 7 वर्ष के थे तब उन्होंने सभी शास्त्रों में महारथ हासिल कर ली थी उनकी स्मरण शक्ति इतनी लाल जवाब थी कि किसी भी शास्त्र को किसी भी पंक्ति को या किसी भी समय उद्गृत कर सकते थे वाद विवाद में वह अपने विरोधियों को संतुष्ट करने में समर्थ थे ध्रुवराज सिंह पटपरनाथ मंदिर के पुजारी पंडित श्री लक्ष्मी नारायण शुक्ला अपने-अपने विचार रखेंकार्यक्रम की रही उपस्थित गायत्री परिवार से जेपी सिंह अजीत सिंह, अनिल प्रताप सिंह, वरिष्ठ शिक्षक राकेश सिंह , किंडरगार्डन स्कूल के संचालक राकेश सोनी ,सुशील गुर्जर नवांकुर संस्था के गड़ा पार कल्याण समिति कमला कपाड़िया बेलगहना उत्थान समिति के अध्यक्ष धीरज सिंह अर्पण एजुकेशन सोसाइटी के अध्यक्ष आशुतोष शर्मा जय गुरुदेव वेलफेयर सोसाइटी सचिव संजय सोनी महाकाल का जन्म कल्याण समिति के अध्यक्ष विनोद शुक्ला मैटर आकृति पांडे रीना वर्मा दिव्यांशी सिंह प्रस्फुटन समिति रामबालक दहिया सुभद्रा सिंह प्रतिभा चतुर्वेदी भूपेंद्र त्रिपाठी अरविंद सिंह सुखेंद्र सिंह अतुल सेन सीएमसीएलडीपी के छात्र अन्य गणमन नागरिक उपस्थिति में कार्यक्रम संपन्न हुआ कार्यक्रम का संचालन मेंटर्स निधि सिंह द्वारा किया गया एवं आभार प्रदर्शन सरोज गुर्जर द्वारा किया गया

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