इति आदिवासी क्षेत्रे- “आदेश बिकता है, बोलो खरीदोगे…?” पार्ट 2

( विशेष संवाददाता )शहडोल:-तो 1 सितंबर 2020 में कमिश्नर कार्यालय से एक और बरहा के शिक्षक कार्य के अमित सिंह को मंडल संयोजक गोहपारू ब्लॉक का प्रभार दे दिया गया है। यह अलग बात है कि शासन ने समय-समय पर अलग-अलग आदेश करके रिमाइंडर करने का काम किया कि किसी भी कीमत पर शिक्षकों को गैरशैक्षणिक कार्य में ना लगाया जाए ।अजीबोगरीब सरकार की कार्यप्रणाली है हालांकि अब यह आदेश निरस्त नहीं होगा।

और यही विरोधाभास पग-पग पर है। अब जानबूझकर यह परिस्थितियां पैदा होती हैं या फिर “अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर देय” के अंदाज में प्रसासन की कार्यप्रणाली अपने कार्यों का क्रियान्वयन करती है। यह तो वक्त बताएगा…।तो फिर क्या “आदेश” होने के बाद भी आदेश के वजन के अभाव में आदेश हवा में उड़ जाता है…?., जी हां; पिछला उपआयुक्त आदिवासी विभाग के आदेश को देखें तो आभास कुछ ऐसा ही होता है। कि “ऑफ द रिकॉर्ड” सुनिश्चित आचार संहिता चाहे वह गैरकानूनी है उसका पालन नहीं होता है तो आदेश का कोई महत्व नहीं होता है, वह हवा में उड़ जाता है या फिर उड़ा दिया जाता है। पिछले दरवाजे से कुछ इस प्रकार से अलग-अलग आदेश होते हैं जैसे लगता है कि “आदेश बिकता है बोलो खरीदोगे..?.”।और सच में क्षमता के आधार पर जारी किए गए आदेश ही पाते ही टिक पाते हैंअन्यथा आदेश उड़ जाते हैं ।होता है, यह भी होता है कि आदेश जिस प्रशासकीय अधिकारी ने किए हैं उसका महत्व हो चाहे ना हो.. जिस नेता ने या मंत्री ने विधायक ने उसमें सिफारिश लगाई है उस पर सुनिश्चित होता है कि आदेश कितना टिकाऊ है…। इस प्रकार सरकारी आदेश एक मजाक बनकर रह गए हैं। कानून एक मुखौटा मात्र बना हुआ है वास्तविक कार्यप्रणाली किसी और आचार संहिता के तहत संचालित होती हैं । हालांकि यह बात जब गोविंदाचार्य ने अपने पार्टी के हित में कही थी तो उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी थी क्योंकि यही वर्तमान राजनीतिक दलों का संस्कारी-चरित्र बन चुका है।और अब यह संस्कारी चरित्र राजनीतिक दलों का प्रशासन के नसों में आ गया है, कम से कम आदेशों की विरोधाभासी कार्य यही प्रमाणित करते हैं।तो देखिए जब झगरहा के सहायक शिक्षक रघुवीर सिंह मंडल संयोजक बुढार बनाए गए थे उस वक्त भी कुछ ऐसा ही हुआ था जैसे कि के 19दिसम्बर 18 को जब एक शिक्षक बृजेश्वरधर द्विवेदी को

सुहागपुर में मंडल संयोजक के रूप में नियुक्त किया गया तो लगा की उपायुक्त आदिवासी विभाग शहडोल में कोई गाज गिरने वाली है। और नतीजतन जारी आदेश को यह कह कर के निरस्त कर दिया गया कि किसी शिक्षक को गैरशिक्षक के कार्य करने पर प्रतिबंध है। और क्योंकि खंड शिक्षा सुहागपुर में मंडल संयोजक का काम कार्यपालिक है इसलिए वह गैर शैक्षणिक है। अब पीछे या परदे के पीछे एक शिक्षक अमित सिंह कैसे पवित्र होकर कार्यपालिक पद के लिए मंडल संयोजक के रूप में कमिश्नर शहडोल द्वारा नियुक्त हो जाते हैं यह आश्चर्यजनक है.? यह बिल्कुल आश्चर्यजनक नहीं है यदि पर्दे के पीछे का संस्कार और चरित्र प्रशासन को आचार संहिता का पालन करने का जवाब देता है यह कोई नई बात नहीं है इसके पहले भी कई ऐसे क्षेत्र में काम करने वाले शिक्षक अपनी हैसियत योग्यता और अधिकारी की स्तर के हिसाब से पदों को खरीद लेते देखे गये और वह भी थोक के भाव में। यदि कोई दाग लगे भी हैं तो दाग अच्छे हैं…. उन्हें यह कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। बहुचर्चित सुहागपुर बी ई ओ एसपी सिंह चंदेल और बुढार बी ई ओ अशोक शर्मा की नियुक्ति पर कुछ ऐसे ही प्रश्न खड़े हो गए थे जो आज भी निरुत्तर हैं। यह भी एक अलग बात है किताब कांग्रेश शासन मे थी।तो प्रसासन की कार्यप्रणाली में ऐसे आदेश प्रशासन की मंशा और कार्यप्रणाली की घोषणा भी करते हैं ।यही कारण है कि आदिवासी विभाग के अंदर बड़े भ्रष्टाचार करने वाले संरक्षित होते हैं उन्हें सिर्फ डराया और धमकाया जाता है। अन्यथा पूरी छूट होती है कि वह हॉस्टल के अंदर दारू-मुर्गा पार्टी करते रहे… यही कारण है कि कोई मंडल संयोजक अंसारी नाम का व्यक्ति कई दशकों से शहडोल आदिवासी विभाग का अघोषित मुखिया बन जाता है। जिसे हटाने की हैसियत किसी में नहीं होती,56 इंच वाले हिंदुत्व की भी। यही कारण है कि किसी मंडल संयोजक की पत्नी गैर कानूनी तरीके से लंबे समय से गलत पदों पर कार्यों काम करती है क्योंकि वह उस संस्कार और चरित्र से पल्लवित होती है जिससे भ्रष्टाचार की गंगा लोगों को पवित्र रखती है।ऐसे में जब कोई नेता अपनी नियत को गंगा और नर्मदा की तरह पवित्र बताता है तो लगता है भ्रष्टाचार की गंगा की और नर्मदा के पवित्रता की कसम खा रहा है।

बहरहाल हालिया जारी आदेश में अमित सिंह गोहपारू के मंडल संयोजक के रूप में गैरशैक्षणिक कार्यों का पूरी कर्तव्य निष्ठा के साथ प्रदर्शन करेंगे इससे ज्यादा भ्रष्टपद के लिए शायद ही कोई हीरा मिल पाता..? आखिर अमित सिंह ने कथित तौर पर इसी गोहपारू ब्लॉक में आदिवासियों बच्चों की फर्जी शिष्यवृत्ती के आरोप में निलंबित हुए थे बहाल होना यह व्यवस्था पड़ता है होता है जैसे कई लोग बहाल हो कर क्लास वन अधिकारी भी बन गए हैं इस तरह योग्यता भी एक पैमाना होता है यह पद इसलिए भ्रष्ट के रूप में आदिवासी विभाग में सुशोभित है कि कोई मंडल संयोजक की अघोषित मुखिया आदिवासी विभाग का हो सकता है यदि उसमें क्षमता हो तो…।

तो अघोषित आचार संहिता के तहत अमित सिंह नामक व्यक्ति का चयन हुआ है कि वे गोहपारू की शिक्षा में गुणवत्ता और चार चांद लगाएंगे। और यह इसलिए महत्वपूर्ण खबर है क्योंकि शहडोल जैसे आदिवासी संभाग में एक वर्तमान आदिवासी कल्याण मंत्री मीना सिंह है और एक पूर्व आदिवासी कल्याण मंत्री बिसाहूलाल कैबिनेट मिनिस्टर के रूप में आदिवासी क्षेत्र की जागरूकता के गौरवशाली पदों पर सुशोभित हैं।एक खबर यह भी है कि सहायक आयुक्त राजेंद्र श्रोति ने बुडार खंड शिक्षा विभाग में कड़ी कसावट कर दी है। यह अलग बात है कसावट भी कहीं उच्च अधिकारियों के आदेश की तरह लचीली होकर दम न तोड़ दे…?

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