रेल्वे के कंस्ट्रक्शन वर्कर को परेशान कर रहा तथाकथित पत्रकार
बिना रिकार्ड एवं बिना साक्ष्य के ही लिखकर शासकीय कार्य में बाधा

ब्य़ोहारी :- यह भली-भांति सभी को ज्ञात है कि रेल्वे मंत्रालय के कार्यों में पारदर्शिता होती है ,कोई भी अधोसंरचना एवं निर्माण कार्य की पहले रूपरेखा तय होती है उसके उपरान्त ही कार्य को प्रारंभ किया जाता है एवं इस समय अधोसंरचना एवं निर्माण कार्य ब्योहारी रेल्वे में चल रहा है और स्पष्ट है कि केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाले रेल्वे जैसे विशेष विभाग का हर कार्य वैधानिक और ठोस होता है क्योंकि रेल्वे का निर्माण कार्य कोई छोटा या तुच्छ कार्य नहीं होता है कि कोई ब्लैकमेलर आकर अनावश्यक टीका टिप्पणी करे और बिना किसी मूलभूत जानकारी को एकत्रित किए बगैर जो मन आये पेपर के हेड आफिस भेज दे बाद में उसका दण्ड बेचारे निर्दोषों को भुगतना पड़े।
यही कार्य यहां के पेपर बांटने वाले पत्रकार सतीश तिवारी द्वारा किया गया जिसके कारण कुछ समस्याएं उत्पन्न हो गई और कंस्ट्रक्टर एवं सप्लायर को मानसिक रूप से प्रताड़ना का सामना करना पड़ा , पत्रकारिता माना प्रेस की स्वतंत्रता है परंतु इसका अभिप्राय यह भी नही है कि आपके मन में जो भी आए उसे बिना बेसिक जानकारी के आप छपवाकर समाचार पत्र ग्रुप के लिए बड़ी समस्या खड़ी कर दें परंतु ऐसे में शासकीय कार्य में बाधा डालना तथा कार्य करवाने वालों को इसलिए ब्लैकमेल करना कि शायद डरकर वो सतीश तिवारी को हफ्ता देना शुरू कर दें यह कोई हाउसिंग बोर्ड का कार्य नहीं है जहां मनमानी और दादागिरी चलती हो यह रेल्वे मंत्रालय के गजट नोटिफिकेशन के बाद सर्वसम्मति से पास किया गया प्रस्ताव ह़ोता है तब कहीं जाकर हर पहलू का बारीकी से निरीक्षण करने के उपरांत ही संरचना और निर्माण कार्यों को अनुमति मिलती है इसमें तो भ्रष्टाचार या मिलावट की कोई संभावना ही नहीं रह जाती है , रेल की पटरी के निर्माण में यदि मिलावट कर घटिया स्तर का कार्य करवा दिया जाय तब तो करोड़ों जानें चली जायेंगी , इसी प्रकार से रेल्वे के किसी भी कार्य की एक ठोस रूपरेखा बनती है लैब टेस्टिंग होती है अभियंताओं द्वारा उसकी मजबूती का अवलोकन किया जाता है।
सतीश तिवारी द्वारा बिना प्रेस की गरिमा को ध्यान में रखे जो मन आया छाप दिया गया जो कि गलत भी है और नीतिसंगत भी नहीं है, कोई भी समाचार पहले साक्ष्यो के आधार पर रूपरेखा की सीमा में लिया जाता है एवं उन साक्ष्यो के बारीक निरीक्षण के उपरांत ही समाचार को प्रकाशित किया जा सकता है बिना प्रमाण बिना साक्ष्य समाचार प्रकाशित करना अपराध की श्रेणी में आता है।
अब जो निर्माण कार्य चल रहा है उसे भी पास ही किया गया होगा तभी तो कार्य प्रारंभ हुआ होगा, उसकी जांच हुई होगी, गुणवत्ता परखी गई ह़ोगी वो भी विशेषज्ञों के अनुसार ही कार्य को हरी झंडी दिखाई गई होगी ऐसा तो नहीं है कि कोई भी आकर निर्माण कार्य शुरू कर दे ।
सतीश तिवारी द्वारा लिखा गया कि सीमेंट की ईंटों में गुणवत्ता नहीं है रेल्वे के किसी इंजीनियर से क्या इन्होंने कोई लिखित कागज लिया और यदि नहीं लिया तो इस प्रकार से अनावश्यक,बेसलेस बातों को छापकर इन महोदय ने स्वयं ही मुसीबत स्वयं के लिए खड़ी कर ली है।
रेल्वे का नियम होता है जब तक टेस्ट में उसे पास कर दिया जाता है तो जाईए उस लैब में जहां टेस्ट हुआ हो ,पास करने वाले तकनीशियनों एवं इंजीनियर को सिद्ध करके दिखलाते उसके बाद उसकी सूचना आवश्यक विभागों को देते तभी छाप सकते थे अन्यथा नहीं।
इसी प्रकार से प्रयुक्त निर्माण सामग्रियों की भी जांच होती है कोई भी मनमानी तौर पर रेत वो भी केंद्र सरकार के कार्यो में कोई प्रयोग करने की सोच भी नहीं सकता है , चोरी की गई सामग्री आम आदमी तक नहीं खरीदता है फिर तो यह रेलवे का राष्ट्रीयकरण का कार्य है ।
ऐसे में शासकीय कार्यों को बदनाम करने की साज़िश कहें या ब्लैकमेलिंग करें यदि कोई भी करता है तो भारतीय दण्ड संहिता ,कांट्रैक्ट लेबर एक्ट की ओर से मानहानि और क्षतिपूर्ति का दावा भी ठोका जा सकता है ।

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