वैश्विक आर्थिक मंदी में भारतीय राजनीतिक व वर्तमान व्यवस्था का शुद्धिकरण आवश्यक – ठा.जैनेन्द्र सिंह पंवार
भोपाल/देवास:-देश के अनेक राज्य जो आर्थिक दलदल में फंसते जा रहे हैं वित्तीय स्थति के कारण श्रीलंका जहां पर राष्ट्रपति के विरोध में जनक्रांति होकर जनमानस ने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा किया, जिसके कारण राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना पड़ा। स्थिति यह है कि मौजूदा राष्ट्रपति के विरोध में भी जनमानस खड़ा हुआ है। विश्व के बदलते परिवेश में भी अनेक देश जैसे पाकिस्तान, नेपाल में भी गहरा आर्थिक संकट का दौैर है। वैश्विक आर्थिक मंदी में भारतीय राजनीतिक वर्तमान व्यवस्था का शुद्धिकरण नितांत आवश्यक है इसी अंतर्गत भारत में बढ़ती हुई महंगाई, बेरोजगारी, कर्मचारियों की पेंशन में इजाफा न करते हुए बल्कि बंद जैसा निर्णय का विचाराधीन होना, सेनिक की पेंशन समाप्त करना। ये देश को किस ओर ले जा रहा है। जबकि सांसद, विधायकों का प्रति 5 वर्ष में वेतन बढ़ाया जाता है ओर उन्हें पेंंशन का भरपूर लाभ दिया जाता है और दिया जाता रहेगा। इसकी रोकथाम का कोई उपाय नहीं है। बड़ी योजनाओं में बहुत बड़े स्तर से छोटे छोटे स्तर तक भ्रष्टाचार भी बेइन्तहा बढ़ रहा है वह चाहे ऑनलाईन हो या ऑफ लाईन भ्रष्टाचार तो हो ही रहा है। इसको कोई नहीं रोक सकता। अनेक राज्यों में सत्ता परिवर्तन के लिए करोड़ों में खरीद फरोख्त का खेल चल रहा है जो कि समाचार पत्रों की सुर्खियां बना हुआ है। खरीद फरोक्त में चाहे कृषि बोर्ड, दुग्ध संघ बोर्ड गठित करने के लिए जो स्थिति बनती है वहां पर भी बड़े पैमाने पर खरीद फरोख्त होती है। इसके अलावा नगर निगम हो, प्राधिकरण हो, जिला जनपद में भी अपने व्यक्ति को उच्च पद पर बैठाने के लिए भी खरीद फरोख्त का मामला हमेशा सुर्खियोंं में रहता है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, चुनाव आयोग एवं समाज हित की सबसे बड़ी सुप्रीम कोर्ट को चाहिये कि बेरोगारी से पढ़ेे लिखे होनहार युवक युवतियों को जो सामान्य वर्ग से आते हैं उन्हें आरक्षण के नियमों पर पुनविचार कर शिथिल किया जाकर सामान्य वर्ग की सरकारी नौकरियों में उचित नौकरी दिलाएं। जो समाज के लिए अति आवश्यक है। सैनिक की पेंशन पर भी पुर्नविचार कर उन्हें प्रोत्साहित करें, हतोत्साहित न करें यह देश के सैनिकों के सम्मान के लिए उचित निर्णय होगा। लोकतंत्र के देेश में मतों का प्रयोग स्वेच्छा से लोकतांत्रित प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए होता है। परंतु जो इसके दुरूपयोग का खुला तांडव मचा है उसमें मतदाता मन मसोक कर रह जाता है। जो भी सरकार चुनी जाये उसको पांच वर्ष का पूरा समय दिया जाना चाहिये। खरीद फरोख्त को अब आचार संहिता की श्रेणी में लेना चाहिये। जिससे चुने हुए जनप्रतिनिधियों को पांच वर्ष के लिये अयोग्य घोषित किया जा सके। पक्ष एवं विपक्ष को चाहिये कि स्वच्छ राजनीति के लिये इसप्रकार की पहल काफी असरकारक होगी। विश्लेषण कता्रओं ने सरकारों की अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका पर पुर्नविचार कर लेना चाहिये, क्योंकि जहां सरकारों का हस्तक्षेप बढ़ता है वहां तकनीक से मिलने वाले बूस्ट पर असर पडने लगता है। आर्थिक प्रश्रों से भविष्य जुड़ा है क्योंकि आमदनी अठ्ठन्नी ओर खर्चा रूपैया। बल्कि आमदनी से कइ गुना खर्च बेलगाम खर्च राजनीतिक तत्कालिन राजनीतिक लाभ के लिये कुछ राज्यों में इस प्रकार की व्यवस्था की गई हे। जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ राज्यों ने श्रीलंका की राह पकड़ ली है। पाकिस्तान और नेपाल भी धीरे धीरे चपेट में आ रहे है। जबकि सामाजिक बदलाव एवं राजनीतिक क्रांतियों के मूल में माक्र्स ने माना है कि आर्थिक कारण ही होते हैं। एंग्लेस एक कदम आगे बढ़ा है इतिहास की सबसे निर्णायक व्यवस्था है। सरकारों को चाहिये कि मितव्ययिता की नीति एवं पारदर्शी नीति का सख्ती से पालन करने का ठोस निर्णय ले ताकि आर्थिक अनियमितताओं पर सख्ती से पालन किया जा सके। जैसा कि फ्रीब्रिज पर सुप्रीम कोर्ट बेहद सख्त हे। कोर्ट का चुनाव आयोग और केन्द्र सरकार को नोटिस जारी करके जानकारी चाही गई है। ऐसा माना जा रहा है कि फ्रीबिज कल्चर से बहुत से राज्य आर्थिक संकट में फंसते जा रहे हैं जिनको उबारना टेढ़ी खीर होगी। यदि केन्द्र सरकार गुजरात, हिमाचल से नई आर्थिक नीति जैसे मुफ्त वादे नहीं करेगी वह स्वागत योग्य कदम होगा। किंतु पालन कराया जाना भी आवश्यक है। राजनीति में सदैव यह देखा गया है कि बदले से की जाने वाली कार्यवाही समाज में गलत संदेश को जन्म देती है इन सभी मुद्दों पर पक्ष विपक्ष को एक जाजम पर बैठकर देश हित एवं समाज हित में आर्थिक पहलुओं को दृष्टिगत रखते हुए गंभीर समस्याओं का निदान किया जा सकता है जरूरत है कठोर निर्णय की । एक अहम औैर गंभीर मुद्दा ईवीएम मशीन का रहा है। जबसे इसका उपयोग चुनाव में हो रहा है तभी से इवीएम की विश्वसनीयता पर प्रश्रवाचक चिन्ह लगे है और आरोप प्रत्यारोप भी लगते आ रहे हैं क्योंकि बाहरी मुल्कों में इवीएम को नकारा है। बेलेट से ही चुनाव की प्रक्रिया संपन्न होती है। केन्द्र सरकार, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को चाहिये कि जनमानस में विश्वसनीयता कायम करने के लिए तुरंत बेलेट की प्रक्रिया पर निर्णय लेना चाहिये। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का बड़ा गंभीर मुद्दा है।

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