भारत में सबसे तेजी से उभरता हुआ वेब न्यूज़ चैनल

इत्रों का शहर कनौज जाने कैसे बना इत्र नगरी

608
Above News

बेबाक सक्ति न्यूज से संवाददाता ऋषि जैन की रिपोर्ट : कन्नौज शहर अपने इत्र की खूशबू के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां की मिट्टी भी इतनी खुशबूदार है कि उससे भी इत्र बनाया जाता है!
कैसे कन्नौज बना ‘इत्र नगरी’
: अपने इत्र के व्यापार के लिए कन्नौज शहर देशभर में जाना जाता है. कई दशकों से इस शहर में फूलों से बने शुद्ध इत्र का व्यापार होता आ रहा है. ऐसा कहा जाता है कि यहां का इत्र मुगल के कई सम्राटों को भी पहुंचाया जाता था. इत्र बनाने की परम्परा यहां सदियों से चली आ रही है, जिसके चलते ही इसे भारत की इत्र नगरी के नाम से भी जाना जाता है. इत्र के अलावा यहां आपको कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल भी देखने को मिलते हैं. आइए आज देश की इत्र नगरी कन्नौज के बारे में कुछ रोमांचक बातें जानते हैं. जानने के लिए पढ़ते रहिए इस आर्टिकल को…
देश सहित विदेशों में भी है डिमांड
कन्नौज शहर अपने इत्र की खूशबू के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. यहां की मिट्टी के हर एक कण में भी इत्र की ही महक बसी है. यहां बने इत्र की डिमांड देश-विदेशों तक है. खाड़ी देशों में इसकी मांग सबसे ज्यादा है. कन्नौज ने प्राचीन समय से ही इत्र नगरी के नाम से अपनी एक अलग पहचान बनाई है
आज भी पुरानी तकनीक से बनता है इत्र
लगभग 600 साल से यहां इत्र बनाने के लिए देसी तकनीक का ही इस्तेमाल किया जाता है. इतिहास के जानकर बताते हैं कि कन्नौज को इत्र बनाने का ये नुस्खा फारसी कारीगरों से मिला था. जिन्हें मुगल बेगम नूरजहां ने बुलाया था. इन फारसी कारीगरों को नूरजहां ने गुलाब के फूलों से बनने वाले एक विशेष प्रकार के इत्र के निर्माण के लिए बुलवाया था. तब से लेकर आज तक कन्नौज में उसी तरीके से इत्र का निर्माण होता आ रहा है.
प्राकृतिक गुणों से लबरेज है ये इत्र
जिस आज फ्रांस के ग्रास शहर का परफ्यूम लोगों की पहली पसंद बना हुआ है, उसी प्रकार कभी किसी दौर में कन्नौज का इत्र लोगों की पहली पसंद हुआ करता था. हालांकि, आज भी कन्नौज में बना अलीगढ़ के दश्मक गुलाबों वाला इत्र दुनियाभर में मशहूर है. कन्नौज का बना इत्र पूरी तरह प्राकृतिक गुणों वाला और एल्कोहल मुक्त होता है. इसी वजह से कुछ रोगों जैसे नींद न आना, एंग्जाइटी और स्ट्रेस आदि में यहां के इत्र की खुशबू रामबाण इलाज मानी जाती है. यहां का इत्र है लोगों की पहली पसंद
आज भी परंपरागत इत्र की महक जिसमें गुलाब, बेला, केवड़ा, केवड़ा, चमेली, मेहंदी, और गेंदा को पसंद करने वाले लोगों की कमी नहीं है. इसके अलावा कुछ खास किस्म के इत्र जैसे शमामा, शमाम-तूल-अंबर और मास्क-अंबर भी हैं. सबसे कीमती इत्र अदर ऊद है, जिसे असम की एक विशेष लकड़ी ‘आसामकीट’ से बनाते है. साथ ही यहां के जैसमिन, खस, कस्तूरी, चंदन और मिट्टी अत्तर बेहद मशहूर हैं. ऐसे तैयार किया जाता है इत्र
आज के इस आधुनिक दौर में भी यहां इत्र को भट्टियों में ही बनाते है. गुलाब, गेंदा, बेला या चमेली जिस भी फूल का इत्र तैयार करना होता है, उसकी पंखुड़ियों को तांबे के एक बड़े से बर्तन में डाला जाता है और पानी भरकर उसे भट्टी पर चढ़ाया जाता है. भट्ठी पर इस पानी को लगातार गर्म किया जाता है जिससे निकलने वाली भाप पात्र में रखी फूलों की पंखुड़ियों को गर्म करती है.पंखुड़ियों को गरम करके इनसे खुशबू या तेल निकाला जाता है. पात्र से निकला इत्र या तेल एक लकड़ी से पार होते हुए एक सुराही के आकार के बर्तन में इकट्ठा कर लिया जाता है. यह सारी क्रिया आसवन विधि या डिस्टिलेशन प्रोसेस के आधार पर की जाती है. तेल या इत्र इकट्ठा करने वाले पात्र को भभका कहते है. अब इस भभका में इकट्ठा हुए तेल को अलग करके, प्रोसेस करके पैकिंग की जाती है. यहां की तो मिट्टी भी महकती है
कहा जाता है कि कन्नौज की मिट्टी में एक अलग ही खुशबू बसी है. आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां मिट्टी से भी इत्र बनाया जाता है. जब बारिश की बूंदें इस मिट्टी पर पड़ती हैं तो इसमें से एक खास खुशबू आने लगती है. जिस मिट्टी से इत्र बनाते है उस मिट्टी को तांबे के बर्तनों में पकाया जाता है. इस मिट्टी से उठने वाली खुशबू को बेस ऑयल के साथ मिक्स करके इत्र बनाया जाता है.
विदेशों तक है इस इत्र का कारोबार
कन्नौज में इत्र बनाने की करीब 350 से ज्यादा फैक्ट्रियां हैं. यहां बना इत्र दुनियाभर के 60 से ज्यादा देशों में भेजा जाता है. इस कारोबार में फूलों की खेती से 50 हजार से ज्यादा किसान शामिल हैं. यह कारोबार 60 हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार दिए हुए है. ये इत्र यूएसए, यूके, दुबई, सऊदी अरब, फ्रांस, ओमान, सिंगापुर समेत कई देशों में भेजे जाते हैं.

खबरों के अपडेट पाने के लिए हमारा फेसबुक पेज लाइक करें| आप हमारा एंड्राइड ऐप भी डाउनलोड कर सकते है|

Comments are closed.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Privacy & Cookies Policy
E-Paper