ग्रामीण जी अपने पुस्तकों में ऐसी बातें लिख गए है जिन्हें पीढ़ियां याद रखेंगी -डॉ सेवाराम त्रिपाठी

ग्रामीण जयंती पर नागौद में हुआ आयोजन
देशनामा गांवनामा” का विमोचन सम्पन्न “ग्रामीण सम्मान” से नवाजे गए पद्मश्री बाबूलाल दाहिया
सतना। मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की नागौद इकाई द्वारा स्मृति शेष देवीशरण ग्रामीण की 92वीं जन्म जयंती पर प्रदेश अध्यक्ष डॉ.सेवाराम त्रिपाठी के मुख्य आतिथ्य, डॉ.बहादुर सिंह परमार की अध्यक्षता,पद्मश्री बाबूलाल दाहिया,डॉ.कैलाश तिवारी,एड.संतोष खरे के विशिष्ट आतिथ्य में कार्यक्रम आयोजित कर ग्रामीण जी की चुनिंदा प्रकाशित,अप्रकाशित रचनाओं के हालिया प्रकाशित संग्रह “देशनामा गांवनामा”
का विमोचन करते हुए ग्रामीण परम्परा के पक्षधर वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री बाबूलाल दाहिया को प्रथम “ग्रामीण सम्मान” से नवाज़ा, कार्यक्रम का निर्वाध संचालन इकाई अध्यक्ष एड. रमाकान्त मिश्र एवं स्वागत इकाई महासचिव पुष्कर शरण ग्रामीण ने किया।
इसके उपरांत “वर्तमान चुनौतियों के आलोक में ग्रामीण जी का लेखन” विषय पर विचारोतेजक परिचर्चा का विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ट साहित्यकार रामलाल सिंह ने कहा कि ग्रामीण जी वास्तविकतावादी थे वे जैसे दिखते थे वैसा ही लिखते और बेबाकी के साथ अपनी बात रखते थे। एड.संतोष खरे ने ग्रामीण जी की रचनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि वो अपनी बातों में अडिग रहते और निडरता के साथ बातें करते थे। ग्रामीण परिवेश पर उनके लिखे आलेख लोग काफी पसंद करते थे।सतना इकाई के महासचिव वरिष्ट पत्रकार विजयशंकर चतुर्वेदी ने कहा कि उनके विचारों में पारदर्शिता थी वे तत्कालीन व्याप्त विसंगतियों से विचलित होकर भी लिखते थे। उनकी रचनाओं का पठन ,पाठन आवश्यक है। ग्रामीण जी के करीबी रहे पद्मश्री बाबूलाल दाहिया ने उनके साथ विभिन्न कार्यक्रमों में गुजारे अनुभव साझा करते हुए कहा कि वे धर्म,सांप्रदायिकता दलितों शोषितों पीड़ित वर्ग की व्यथाओं जीवन संघर्षों को भी लिखते थे।श्री दाहिया नें आगे कहा कि अगर संगीत के जैसे साहित्यकारों का भी कोई घराना होता तो मैं गर्व से कहता कि मैं नागौद घराने से आता हूं जहां ग्रामीण जी जैसे मार्गदर्शक रहे है । मुख्य आतिथ्य उद्बोधन में मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के प्रादेशिक अध्यक्ष डॉ.सेवाराम त्रिपाठी ने ग्रामीण जी की रचनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी पुस्तक में ऐसी बातें लिखी है कि पीढ़ियां याद रखेंगी । वे एक छोटे से किसान परिवार से थे और निर्भीक थे कोई चीज गलत होती तो वो टोकने में परहेज नहीं करते थे। अपने जीवन में उन्होंने जो किया उसे ही कहानी कविताओं के रूप में उतारते थे। वो दूसरों के लिए सदैव लिखते रहे हैं,उनकी कथनी और लेखनी में कोई अन्तर नहीं था आज के लेखकों में वह ईमानदारी नहीं रही आज बहुधा बड़े बन रहे लेखकों में दोगलापन देखने को मिलता है। सिद्धांत और विचारधारा ध्वस्त हो रही है , स्वार्थ के पीछे लोग भाग रहे हैं और सत्ता के पीछे दम हिलाते घूम रहे है यह स्थिति आने बाली पीढ़ी के लिए शुभ संकेत नहीं है। प्रो.बहादुर सिंह परमार ने कहा कि ग्रामीण जी सहज सरल और पवित्र आदमी थे। इसके साथ ही उनके साथ कार्यक्रमों में बिताए अनुभव साझा किए। उपरोक्त के अलावा डॉ.प्रवेश तिवारी,डॉ ब्रजेश त्रिपाठी,राजेंद्र सिंह परमार,डॉ.कैलाश तिवारी आदि ने विचार रखे जबकि सम्मान पत्र का वाचन बालेंदु प्रभाकर मिश्र ने किया अन्त में आभार इकाई के उपाध्यक्ष अजीत सिंह कुंवर ने किया। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से श्रीराम मिश्र, डॉ. उमाकांत गर्ग,डॉ.यज्ञदत्त त्रिपाठी,रामपाल मिश्र, एड.मनोज सिंह, सीताशरण पारासर,दादूराम बागरी,सरोज सिंह सूरज,एड.प्रगति सोनी,शंकर राज सिंह,अंशु सिंह,शैलेंद्र सिंह शैल,डॉ रामयश बागरी,हेतराम त्रिपाठी,वरिष्ट पत्रकार सुरेश दाहिया,कालिका प्रसाद त्रिपाठी,योगेश योगी,कल्लू दाहिया,अरुण शुक्ला,अनुपम दाहिया,पुष्पेंद्र पाठक,बालेंद्र सिंह सहित अन्य साहित्यकार एवं नगर के वरिष्ठ नागरिक भारी संख्या में उपस्थित रहे।

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