मोहन सरकार में भी आबकारी के दुखनंदनो की कोई खैर-खबर लेने वाला नहीं!

वर्षों से तबादलों की प्रतिक्षा में एक ही जिले में सेवा देते-देते प्रदेशभर के आबकारी एडीओ और उपनिरीक्षकों की कमर झुकने लगी, सरकार से उम्मीद टूट रही*
*अफसरों का कहना एक ही जिले में मलाई खाते-खाते फिटनेस पर बिल्कुल नहीं दिया जा रहा ध्यान, सरकार हमारी मजबूरी समझे और हमें दूसरे जिले में फील्ड में काम करने का मौका देवे ताकि फिटनेस पूर्ववत हो सके।*
*दूसरी मजबूरी अफसरों ने यह भी बताई कि एक ही जिले में वर्षों से जमे होने के कारण शराब ठेकदार भी भाव नहीं दे रहे अब हमारी क्षमता को हल्के में ले रहे है!*
*वही दूसरी और वर्षों से अंग्रेजी शराब वेयरहाउस में अपना सिक्का जमाने वाले राजनीतिक कृपा पात्र अधिकारियों के मामले में इंदौर और जबलपुर सबसे आगे है!* *इन्हें प्रशासनिक शक्तियों से हटाना सरकार के लिए भी संभव नहीं*
*आबकारी की रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले उपनिरीक्षकों ने एक ही जिले में लंबे समय से पदस्थ रहते हुए अपने व्यवहार से सभी ठेकदारों और तस्करों माफियाओं का मन मोह लिया है ,सब अपने हो है इस ही मोह के चक्कर में अब वो कार्यवाही करने में कतराते है।*
*भोपाल,इंदौर ,जबलपुर, खरगोन ,रीवा के साथ ही प्रदेश के लगभग 90 प्रतिशत जिलों में पीड़ित अधिकारी 8 से 10 वर्षों की अवधि से ज्यादा समय से पदस्थ है!* *मगर कोई ध्यान लेने वाला नहीं*
*यही हाल आबकारी के राज्य स्तरीय उड़नदस्ता और अन्य सभी संभागों के आबकारी उड़नदस्ता कार्यालयों का है जहां अधिकारियों ने अपना एक सिंडिकेट ही बना रखा है और जिले में पदस्थापना ना मिलने के कारण यह प्रदेशभर की टोह लेने पर मजबूर होते है।*
*जिले में पदस्थ कई एसी/डीईओ के साथ भी यह समस्या आम हो गई उन्हें जिले में अवैध शराब पर रोकधाम के लिए इन्हीं व्यावहारिक अफसरों पर निर्भर होना पड़ता है तस्करों और ठेकदारों के साथ वर्षों की व्यावहारिक गतिविधि होने के कारण जिला रिजल्ट नहीं दे पाता और दोषी जिले के आबकारी मुखिया को बनाया जाता है!*
*सरकार को जल्द ही इस और कोई कदम उठाना चाहिए और आने वाली ट्रांसफर पॉलिसी में उक्त सभी अधिकारियों की पीड़ा को समझते हुए उन्हें तबादला सूची में स्थान देने में कतई संकोच नहीं करना चाहिए।*
*विस्तृत खबर ग्रेडेशन लिस्ट के बावजूद मेहरबानी से पदस्थ अफसरों के साथ……*

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