ग्रामीण अंचलों में हर्षोल्लास से मनाया गया कजलियां पर्व

ग्रामीणों ने एक दुसरे को दिया कजलियां, बच्चों ने अपने बड़े को दी कजलियां लिए आशिर्वाद खाई टाफी और मिठाईयां
शहडोल। खैरहा ग्रामीण अंचल में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी कजलियां पर्व खैरहा सहित आसपास के ग्रामों में बड़े हर्ष उल्लास के साथ मनाया गया खैरहा वार्ड पंच मंडल कोल पूर्व पंच गोकुल नापित, पिछड़ा वर्ग मोर्चा मंत्री कोमल पटेल, अरुण त्रिपाठी एवं आचार्य रूपेंद्र चतुर्वेदी पत्रकार अखिलेश कुमार शर्मा ने कजलिया पर्व पर जिला पंचायत निर्माण समिति अध्यक्ष जगन्नाथ शर्मा को काजलिया दिया एवं वही छोटे-छोटे बच्चों के द्वारा भी जिला पंचायत निर्माण समिति अध्यक्ष जगन्नाथ शर्मा को कजलिया दिया और वहीं श्री शर्मा ने छोटे बच्चों को आशीर्वाद स्वरुप टाफी,और मिठाईयां खिलाई। काजलिया कार्यक्रम में एक दूसरे को कजलिया देकर आपसी सौहार्द को बढ़ाने के उद्देश्य से एक दूसरे को कजलिया देकर उज्जवल भविष्य की कामना ग्रामीणों ने की इस पर्व में बच्चों में अधिक खुशी की लहर देखी गई छोटे-छोटे बच्चे हाथों में कजलिया लेकर अपने से बड़ों को काजलिया देकर खुशी का इजहार किया।कजलियां पर्व राखी यानी रक्षा बंधन पर्व के दूसरे दिन मनाया जाता है। इसे कई स्थानों पर भुजरियां/भुजलिया एव कजलियां नाम से भी जाना जाता है। यह त्योहार प्रकृति प्रेम और खुशहाली से जुड़ा पर्व है। इसका प्रचलन सदियों से चला आ रहा है।
कैसे और क्यों
कजलियां पर्व के लिए श्रावण मास की अष्टमी और नवमीं तिथि को बांस की छोटी-छोटी टोकरियों में मिट्टी की तह बिछाकर गेहूं या जौं के दाने बोएं जाते हैं। बुजुर्गों के मुताबिक ये भुजरिया नई फसल का प्रतीक है।
बुंदेलखंड का पर्व
कजलियां मुख्य रूप से बुंदेलखंड में राखी के दूसरे दिन की जाने वाली एक परंपरा है, जिसमें नाग पंचमी के दूसरे दिन खेतों से लाई गई मिट्टी को बर्तनों में भरकर उसमें गेहूं बोएं जाते हैं और उन गेंहू के बीजों में रक्षा बंधन के दिन तक गोबर की खाद और पानी दिया जाता है और देखभाल की जाती है।
पर्व की मान्यता
मान्यतानुसार इसका प्रचलन राजा आल्हा ऊदल के समय से है। यह पर्व अच्छी बारिश, अच्छी फसल और जीवन में सुख -समृद्धि की कामना से किया जाता है। तकरीबन एक सप्ताह में गेहूं के पौधे उग आते हैं, जिन्हें भुजरियां कहा जाता है। फिर रक्षा बंधन के दूसरे दिन महिलाओं द्वारा इनकी पूजा-अर्चना करके इन टोकरियों को जल स्त्रोतों में विसर्जित किया जाता है।
शुभकामना का पर्व
इस पर्व में रक्षा बंधन के दूसरे दिन एक-दूसरे को देकर शुभकामनाएं दी जाती है और घर के बुजुर्गों से आशीर्वाद लिया जाता हैं। श्रावण मास की पूर्णिमा तक ये भुजरिया चार से छह इंच की हो जाती हैं। कजलियां (भुजरियां) के दिन महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए और गाजे-बाजे के साथ तट या सरोवरों में कजलियां विसर्जन के लिए ले जाती हैं।

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