दिल्ली जंतर मंतर पर अंबाह के व्यापारी ने खुद को गोली मारी – अनुकंपा नियुक्ति की पीड़ा बनी आत्महत्या की वजह!

अंबाह।नगर के प्रसिद्ध कोल्डिंग व्यापारी लोकेंद्र सक्सेना ने रविवार को दिल्ली के जंतर मंतर पर खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। दोपहर में दिल्ली पुलिस ने जब परिजनों को यह दर्दनाक खबर दी तो पूरे अंबाह में सनसनी फैल गई। सूचना मिलते ही मृतक के चाचा राजेंद्र सक्सेना एम्बुलेंस लेकर दिल्ली के लिए रवाना हो गए।
परिजनों के अनुसार लोकेंद्र पिछले कुछ समय से अपनी बहन रश्मि सक्सेना की अनुकंपा नियुक्ति को लेकर गहरे तनाव में था। बहन के पति, स्वर्गीय आदित्य सक्सेना, जो कि मुरैना जिले के पहाड़गढ़ ब्लॉक के सरकारी सरसेनी स्कूल में शिक्षक थे, वर्ष 2019 में हार्ट अटैक से निधन हो गया था।
लोकेंद्र ने अपनी बहन को सरकारी नौकरी दिलाने के लिए दिल्ली तक गुहार लगाई थी। बताया जा रहा है कि उसने करीब दो महीने पहले गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री कार्यालय को आवेदन भेजा था, जिस पर गृह विभाग ने 41 दिन में निराकरण का आश्वासन दिया था — लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई।
“अनुकंपा नियुक्ति की उम्मीद में जंतर मंतर पहुंचा था”
चाचा राजेंद्र सक्सेना का कहना है कि लोकेंद्र कई दिनों से कह रहा था कि वह बहन की नौकरी के लिए आखिरी बार दिल्ली जाकर धरना देगा। शायद इसी मानसिक दबाव में उसने जंतर मंतर पर यह दर्दनाक कदम उठा लिया।
बहन रश्मि सक्सेना का दर्द — “भाई मुझे न्याय दिलाने निकला था, खुद ही न्याय मांगते चला गया”
रश्मि सक्सेना ने बताया कि वह भी आज जंतर मंतर पर धरने में शामिल होने वाली थीं, लेकिन तबियत खराब होने की वजह से नहीं जा सकीं। सुबह करीब 7:30 बजे भाई से आखिरी बार बात हुई थी — उसने कहा था कि वह धरना स्थल पर पहुंच गया है।
अनुकंपा नियुक्ति में उलझा था पूरा परिवार
रश्मि सक्सेना ने बताया कि उन्होंने सरसेनी स्कूल, बीओ कार्यालय, डीईओ कार्यालय मुरैना, और कलेक्टर कार्यालय तक आवेदन दिए, पर हर जगह से सिर्फ कोर्ट जाने की सलाह मिली।
शिक्षा विभाग ने उनका दावा यह कहकर खारिज कर दिया कि “सेवा अभिलेख में पत्नी का नाम दर्ज नहीं है।” जबकि उन्होंने कोर्ट मैरिज सर्टिफिकेट, आर्य समाज विवाह प्रमाणपत्र और अन्य सभी दस्तावेज विभाग को सौंप दिए थे।
सादगी में जीने वाला, ज़िम्मेदारी में झुलस गया लोकेंद्र
मित्र राकेश परमार ने बताया कि लोकेंद्र कम बोलने वाला, मेहनती और ज़िम्मेदार व्यक्ति था। उसने खुद शादी नहीं की, बल्कि अपने छोटे भाई की शादी कराई और परिवार की पूरी जिम्मेदारी उठाई।
अब यह सवाल उठता है —
क्या व्यवस्था की बेरुख़ी और फाइलों की धीमी रफ्तार ने एक व्यापारी की जान ले ली?
क्या एक बहन की अनुकंपा नियुक्ति के लिए इतना लंबा संघर्ष करना पड़ेगा कि भाई को अपनी जान गंवानी पड़े?

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