कानून की जीत: जबलपुर हाई कोर्ट में एडवोकेट योगेश सिंह बघेल की दमदार बहस, खारिज हुई संगीन धाराओं वाली FIR

जबलपुर: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में न्याय की एक बड़ी जीत देखने को मिली है। प्रसिद्ध अधिवक्ता योगेश सिंह बघेल की तीखी और तार्किक बहस के आगे अभियोजन पक्ष के दावे टिक न सके। माननीय न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी की अदालत ने धारा 482 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध दर्ज FIR को पूरी तरह निरस्त कर दिया है।
क्या था पूरा मामला?
मामला बालाघाट जिले के पुलिस स्टेशन बालाघाट का है, जहाँ याचिकाकर्ताओं के खिलाफ FIR No. 400/2021 दर्ज की गई थी। इसमें IPC की धारा 413, 419, 420, 467, 468 सहित IT Act की धारा 66B और 66D जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई थीं। पुलिस का आरोप था कि आरोपियों के पास से 19 मोबाइल फोन और ₹1,74,000 नकद बरामद हुए थे, जिन्हें वे ऑनलाइन खरीदकर ऊंचे दामों पर बेच रहे थे।
एडवोकेट योगेश सिंह बघेल की ‘विजयरथ’ वाली दलीलें
बहस के दौरान अधिवक्ता योगेश सिंह बघेल ने कोर्ट के सामने बड़े ही प्रभावशाली ढंग से यह पक्ष रखा कि:
व्यापार अपराध नहीं: ऑनलाइन मोबाइल खरीदना और उसे लाभ के लिए बेचना कोई अपराध नहीं है।
पहचान का अभाव: मोबाइल खरीदते समय किसी की पहचान पत्र जमा करने की कानूनी बाध्यता नहीं है, और न ही इसे बेचने पर खरीदार का नाम गुप्त रखना अपराध की श्रेणी में आता है।
साक्ष्यों की कमी: अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि उन मोबाइल फोन का उपयोग किसी अवैध गतिविधि या अपराध में किया गया था।
कोर्ट का फैसला: FIR हुई “Quashed”
माननीय न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘भजन लाल बनाम हरियाणा राज्य’ मामले में निर्धारित सिद्धांतों का हवाला देते हुए माना कि यदि FIR के आरोपों को उनके अंकित मूल्य (face value) पर भी स्वीकार किया जाए, तब भी कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि बिना किसी अवैध गतिविधि के साक्ष्य के, केवल व्यापारिक लेन-देन को अपराध नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही याचिका स्वीकार कर ली गई और सभी आरोपियों को राहत मिल गई।

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