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MP//Rewa// सरकारी वकील हाईकोर्ट में सरकार का पक्ष रखने में असफल – अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा // सरकारी अधिवक्ताओं की अरुचि के चलते सूचना आयोग के आदेशों के विरुद्ध मिल रहे स्थगन // छत्तीसगढ़ सूचना आयोग में बाबूगिरी हावी, छत्तीसगढ़ सूचना आयुक्त ने कई मामलों में दिया गलत निर्णय – विनोद दास // जुर्माने के बाद रिव्यू का कोई विकल्प नही, जाएं हाई कोर्ट – आत्मदीप ।।

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आरटीआई कानून को जन जन तक पहुंचाने की दृष्टि से प्रत्येक रविवार सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक राष्ट्रीय जूम मीटिंग वेबीनार का आयोजन किया जा रहा है। इस रविवार दिनांक 24 जनवरी 2021 को कार्यक्रम का 31 वां एपिसोड संपन्न हुआ। कार्यक्रम में अध्यक्षता मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने किया जबकि कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी, पूर्व राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप एवं माहिती अधिकार मंच के संयोजक भास्कर प्रभु सम्मिलित हुए। कार्यक्रम का संचालन, प्रबंधन एवं समन्वयन का कार्य सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, शिवेंद्र मिश्रा के द्वारा किया गया।

   प्रतिभागियों ने पूछें आरटीआई से जुड़े हुए प्रश्न एक्सपर्ट्स ने दिया जवाब

     इस बीच रीवा जिले के हनुमना तहसील अंतर्गत ढाबा तिबरियान ग्राम पंचायत के निवासी रोहित तिवारी ने आरटीआई दायर किया था जिस पर पंचायत सचिव ने जवाब नहीं दिया तो अपील की। प्रथम अपीलीय अधिकारी ने लोक सूचना अधिकारी के ऊपर 7 दिवस के भीतर जानकारी देने का आदेश दिया और जानकारी न देने की स्थिति में 2 हज़ार रुपये का जुर्माना लगा दिया है। इस विषय पर जब बात पूर्व राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप के समक्ष पहुंची तो उन्होंने बताया की लीगल तौर पर यह अनुचित है क्योंकि प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास लोक सूचना अधिकारी के ऊपर जुर्माना लगाए जाने की कोई शक्ति नहीं होती है। प्रथम अपीलीय अधिकारी लोक सूचना अधिकारी के ऊपर अनुशासनात्मक कार्यवाही किए जाने हेतु लिख सकता है।

   सरकारी वकील हाईकोर्ट में पक्ष रखने में असफल – अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा

   इस बीच जब मामला सूचना आयोग के किये जा रहे निर्णय पर हाई कोर्ट द्वारा दिए जा रहे स्थगन आदेश पर आया तो इस पर अपना विचार रखते हुए आरटीआई एक्टिविस्ट एवं हाई कोर्ट जबलपुर के अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा ने बताया कि उन्होंने कुछ प्रकरणों में अपीलार्थियों की तरफ से कैविएट दायर की हुई है जिस पर विपक्ष को स्थगन आदेश नहीं मिला है। जबकि जिन मामलों में कैविएट दायर नहीं की जाती उनमें आयोग सीधे स्थगन आदेश दे देता है। ऐसे कुछ मामलों में अपना अनुभव साझा करते हुए नित्यानंद मिश्रा ने बताया कि सरकारी वकील आयोग की तरफ से केस लड़ने में कोई रुचि नहीं रखते हैं जिससे आयोग का पक्ष हाईकोर्ट के समक्ष सही तरीके से रिप्रजेंट नहीं किया जाता है जो की समस्या का विषय है और ऐसे में आयोग के निर्णय पर स्थगन मिलने से सूचना के अधिकार कानून को कमजोर किया जा रहा है। आज जुर्माना और अनुशासनात्मक कार्यवाही होने के बावजूद भी लोक सूचना अधिकारियों को यह लगता है कि उन्हें हाईकोर्ट से स्थगन मिल जाएगा और कुछ नहीं होगा।

पूर्व सूचना आयुक्त आत्मदीप ने प्रतिभागियों की समस्याओं का किया समाधान

  इस बीच कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रुप में पधारे पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने प्रतिभागियों के प्रश्नों का जवाब दिया। अधिवक्ता अमित तिवारी ने बताया कि रीवा में मॉडल स्कूल परिसर में एक बिल्डिंग को नियम विरुद्ध तरीके से तोड़ा जा रहा है तो इसके विषय में उन्होंने आरटीआई दायर की हुई है और अब आगे इसमें क्या किया जाए। इस बात पर सूचना आयुक्त आत्मदीप ने कहा कि आरटीआई से जानकारी निकालने में कुछ समय लग सकता है इसलिए इस विषय पर जिला कलेक्टर संभाग आयुक्त और उच्च शिक्षा विभाग के सचिव को शिकायत की जा सकती है और कार्यवाही की मांग की जा सकती है। गुना से सोनू अहिरवार ने वर्ष 2017 से उनकी पत्नी की नियुक्ति और अटेंडेंस के विषय में जानकारी चाही तो धारा 11 का हवाला देकर जानकारी नहीं दी गई जबकि उनका मामला न्यायालय में था। इस पर आत्मदीप ने कहा की आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय स्वयं ही जानकारी बुलवा सकती है। यद्यपि अटेंडेंस के विषय में आत्मदीप ने कहा कि अवकाश के मामलों को छोड़कर उपस्थिति से संबंधित जानकारी विशेष तौर पर संख्यात्मक दृष्टि से माग की जा सकती है।

   छत्तीसगढ़ सूचना आयुक्त ने दिया गलत निर्णय – विनोद दास

  छत्तीसगढ़ से सम्मिलित हुए आरटीआई एक्टिविस्ट विनोद दास ने कहा कि उन्होंने एक मामला छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग में अपील किया था जिस पर लोक सूचना अधिकारी के द्वारा 4 माह तक जानकारी उपलब्ध नहीं करवाई गई। इसके बाद जब मामला छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग में पहुंचा तो वहां के सूचना आयुक्त एमके राउत ने लोक सूचना अधिकारी को क्लीन चिट दे दी जबकि लोक सूचना अधिकारी ने कहा कि उसने आवेदक को जानकारी दी है लेकिन पावती नहीं ली। जबकि आवेदक का कहना था कि उन्हें कोई जानकारी भेजी ही नहीं गई और मात्र लोक सूचना अधिकारी द्वारा मौखिक तौर पर झूठ बोला गया।

   देश के विभिन्न कोनों से आवेदकों ने उठाए सवाल

    इस बीच झारखंड से मोहम्मद कादरी ने बताया कि उन्होंने झारखंड सूचना आयोग में अपील की थी जिसके बाद सुनवाई हुई और दो बार कारण बताओ नोटिस जारी करने के बाद तीसरी बार सूचना आयोग ने लोक सूचना अधिकारी के ऊपर 25 हज़ार रुपये जुर्माना लगा दिया और जानकारी देने के लिए एक तिथि निर्धारित कर दी। जुर्माने के बाद लोक सूचना अधिकारी ने जानकारी आवेदक अपीलार्थी को भेज दी तो क्या ऐसे में लोक सूचना अधिकारी के ऊपर जुर्माना नहीं लगाया जाएगा? इस पर जवाब देते हुए आत्मदीप ने कहा कि एक बार जुर्माना लगने के बाद वापस नहीं किया जाता है। और न ही ऐसे मामलों का कोई रिव्यू किया जाता है।

  क्या एक आरटीआई में एक से अधिक सर्टिफाइड दस्तावेज की प्रतियां मांगी जा सकती हैं? 

     भोपाल से गोविंद देसवारी ने कहा कि वह कई बार आरटीआई लगाते हैं लेकिन मामले को कोर्ट में ले जाने के लिए सर्टिसाइड कॉपी की जरूरत पड़ती है तो क्या ऐसे में उनके द्वारा लगाई गई आरटीआई भी वह लोक सूचना अधिकारी से एक से अधिक सर्टिफाइड कॉपी शुल्क जमा कर प्राप्त कर सकते हैं? इस बात का जवाब देते हुए आत्मदीप, नित्यानंद मिश्रा एवं शिवानंद द्विवेदी ने बताया कि नियमानुसार एक आरटीआई आवेदन में एक ही सर्टिफाइड कॉपी प्राप्त करने का अधिकार होता है। एक ऐसे ही मामले में उत्तराखंड से वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने बताया कि उन्होंने लोक सूचना अधिकारी के तौर पर कार्य करते हुए एक बार दस्तावेज की एक से अधिक प्रमाणित प्रति दे दी लेकिन जब मामला सूचना आयोग में पहुंचा तो उत्तराखंड सूचना आयुक्त प्रभात डबराल ने उन्हें डांटते हुए कहा कि क्या आपने फोटोकॉपी की दुकान खोल कर रखी है। इस प्रकार समझा जा सकता है कि एक से अधिक प्रमाणित प्रति देने का कोई प्रावधान नहीं होता है।

     इसी बात पर अधिवक्ता शिवेंद्र मिश्रा ने बताया कि यदि किसी आवेदक को कोर्ट में प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने की आवश्यकता है तो आरटीआई से प्राप्त दस्तावेज को नोटराइज्ड कर प्रस्तुत किया जा सकता है जो कि प्रमाणित होता है।

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