MP//Rewa// RTI महाकुंभ में 32 वें राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन // आरटीआई एक्ट की धारा 19(8)(ए) कानून का रामबाण – सूचना आयुक्त राहुल सिंह // सुप्रीम कोर्ट के निर्णय आरटीआई कानून की मंशा के विपरीत – शैलेश गांधी // आयोग धारा 4 के तहत जानकारी करवाये सार्वजनिक – भास्कर प्रभु // आरटीआई पब्लिक इंटरेस्ट को लेकर लगाया जाए – सूचना आयुक्त राहुल सिंह // यदि जानकारी 3 साल बाद मिले तो आरटीआई कानून का कोई मतलब नहीं – शैलेश गांधी

👉 आरिटीआई एक्ट की धारा 19(8)(ए) कानून का रामबाण – सूचना आयुक्त राहुल सिंह 👉 32 वें वेबिनार का हुआ आयोजन, देश के विभिन्न कोनों से सैकड़ों की संख्या में जुड़े सहभागी
👉 सुप्रीम कोर्ट के निर्णय आरटीआई कानून की मंशा के विपरीत – पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी
👉 आयोग धारा 4 के तहत जानकारी करवाये सार्वजनिक – आरटीआई एक्टिविस्ट भास्कर प्रभु
👉 आरटीआई पब्लिक इंटरेस्ट को लेकर लगाया जाए – सूचना आयुक्त राहुल सिंह
👉 यदि जानकारी 3 साल बाद मिले तो आरटीआई कानून का कोई मतलब नहीं – पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी
👉 आवेदक के साथ दुर्व्यवहार पर पीआईओ के ऊपर होगी कार्यवाही – राहुल सिंह
सूचना के अधिकार कानून को आमजन तक पहुंचाने के लिए नित नए प्रयोग किए जा रहे हैं। देश के नामी-गिरामी सूचना आयुक्त और साथ में आरटीआई एक्टिविस्ट मिलकर नित नए प्रयोग कर रहे हैं जिससे सूचना का अधिकार कानून जन-जन तक पहुंचे और निचले स्तर के व्यक्ति को भी आरटीआई कानून का लाभ मिले और प्रशासनिक ढांचे में पारदर्शिता आए। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कोरोना लॉकडाउन के समय आरटीआई कानून के विभिन्न मुद्दों पर जूम मीटिंग वेबीनार का आयोजन प्रारंभ किया गया जो अब वर्तमान में अपने 32 वें पड़ाव पर पहुंचा है। इस उपलक्ष्य पर कार्यक्रम को लेकर एक विशेष आयोजन किया गया जिसे आरटीआई महाकुंभ का नाम दिया गया जिसमें रविवार 31 जनवरी 2021 को सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 18 जिसमें शिकायत का प्रावधान होता है विषय पर वेबिनार का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में देश भर से विशेषज्ञ जुड़े और अपने अनुभवों को साझा किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पहले की भांति मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने किया जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी एवं माहिती अधिकार मंच के संयोजक एवं वरिष्ठ आरटीआई एक्टिविस्ट भास्कर प्रभु सम्मिलित हुए।
यह कार्यक्रम आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप इंडिया एवं नेशनल आरटीआई ग्रुप के संयुक्त तत्वाधान में किया गया जिसका संयोजन एवं संचालन का कार्य आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी एवं देवेंद्र अग्रवाल और अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा ने किया। कार्यक्रम में पूरे देश के विभिन्न राज्यों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से वरिष्ठ आरटीआई एक्टिविस्ट, सामाजिक कार्यकर्ता, सिविल राइट्स के लिए कार्य करने वाले गणमान्य नागरिक सम्मिलित हुए।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय आरटीआई कानून की मंशा के विरुद्ध – शैलेश गांधी
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर पधारे पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के निर्णय लगातार आरटीआई कानून को कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने धारा 18 को लेकर मणिपुर हाईकोर्ट के निर्णय और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को लेकर अपना यह बयान दिया है। शैलेश गांधी ने कहा की धारा 18 को लेकर कुछ ज्यादा ही विश्लेषण किए जा रहे हैं जिसके कारण पेचीदगियां बढ़ती जा रही है। शैलेश गांधी ने कहा कि गलत इंटरप्रिटेशन और गलत व्याख्या करने से कानून कमजोर हो रहा है। श्री गांधी ने कहा कि यह कहते हुए उन्हें काफी दुख होता है कि सुप्रीम कोर्ट ने आरटीआई को कमजोर किया है। उन्होंने आगे जोड़ा की आरटीआई की धारा 18(1)(एफ) के तहत शिकायत की जानी चाहिए जिसमें धारा 4 की पालना आयोग करें और विभागों से करवाए। धारा 18 में शिकायत करने के लिए हमें आरटीआई लगाने की आवश्यकता नहीं है बल्कि सीधे ही शिकायत कर सकते हैं और धारा 4 की पालना के विषय में आयोग के संज्ञान में ला सकते हैं।
यदि जानकारी 3 साल बाद मिले तो आरटीआई कानून का कोई मतलब नहीं – शैलेश गांधी
आरटीआई कानून के वर्तमान परिदृश्य पर बात करते हुए पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ने कहा की सूचना आयोग अपीलों पर समय पर निराकरण नहीं करते हैं जिसकी वजह से पेंडेंसी बढ़ती जा रही है। एक तरफ सरकार लोक सूचना अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं कर रही है और दूसरी तरफ अपीलीय प्रकरण भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं जिसकी वजह से आवेदकों को समय पर निराकरण नहीं मिल पा रहा है। मामले पर प्रकाश डालते हुए श्री गांधी ने कहा कि ऐसे कानून का क्या औचित्य है जब आवेदक को 3 या 4 साल बाद जानकारी मिले? यदि हमें 1 माह के भीतर जानकारी चाहिए और वही जानकारी हमें 3 साल बाद मिले तो उस जानकारी का कोई मतलब नहीं रह जाता और न ही ऐसे कोई कानून का मतलब रह जाता है। सुप्रीम कोर्ट पर अपनी बात रखते हुए श्री गांधी ने कहा कि आरटीआई कानून के इंप्लीमेंटेशन से आज 16 वर्ष से अधिक का समय व्यतीत हो गया है और अब जाकर सुप्रीम कोर्ट आरटीआई के दायरे में आ रहा है जबकि यह कार्य एक दशक पूर्व किया जाना चाहिए था। इस बात से अपेक्स कोर्ट की आरटीआई कानून के प्रति मंशा पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाता है।
आयुक्त के गलत निर्णय पर हल्ला होता है लेकिन कोर्ट के गलत निर्णय पर कोई नहीं बोलता
न्यायालयों द्वारा आरटीआई कानून के विरुद्ध निरंतर निर्णय दिए जा रहे हैं जिसकी वजह से आरटीआई कानून कमजोर हो रहा है। इस विषय पर अपने विचार रखते हुए पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने कहा कि जब भी आयोग गलत निर्णय देता है तो हर कोई प्रश्न उठाता है लेकिन जब कोर्ट आरटीआई कानून की मंशा के विरुद्ध निर्णय देता है तो कोई कुछ नहीं बोलता है। श्री गांधी ने कहा कि जिस प्रकार आयोग के निर्णय के विरुद्ध हम अपील करते हैं और खड़े हो जाते हैं वैसे ही कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध भी हमें अपनी आवाज उठानी पड़ेगी और पब्लिक ओपिनियन बनाना पड़ेगा अन्यथा वह समय दूर नहीं जब आरटीआई कानून पूरी तरह से खत्म हो जाएगा और उपभोक्ता संरक्षण कंजूमर एक्ट की तरह ही मात्र एक कानून की किताब में ही सिमट कर रह जाएगा।
आरटीआई की धारा 19(8)(ए) पूरे एक्ट की रामबाण है – सूचना आयुक्त राहुल सिंह
आरटीआई कानून की धारा 19(8)(ए) की शक्ति के बारे में बताते हुए मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा की सूचना के अधिकार कानून की धारा 19(8)(ए) पूरे कानून की रामबाण है। इसकी शक्तियों के बारे में चर्चा करते हुए सूचना आयुक्त ने कहा कि न केवल आवेदक को जानकारी उपलब्ध करवा सकता है एवं गलती पाए जाने पर लोक सूचना अधिकारी के ऊपर जुर्माने एवं अनुशासनात्मक कार्यवाही कर सकता है बल्कि इस एक्ट को बेहतर ढंग से इम्प्लीमेंट करने के लिए वह समस्त प्रयास कर सकता है जिससे कानून अपनी मंशा के अनुरूप काम करें। यदि किसी कार्यालय में विशेष दस्तावेजों को प्रकाशित करवाना है तो भी आयोग करवा सकता है और धारा 4 के तहत विभागों की एनुअल रिपोर्ट भी आयोग मंगवा सकता है। धारा 4 के तहत अधिक से अधिक जानकारी पब्लिक पोर्टल पर आए यह सब प्रयास आयोग कर सकता है।
आवेदक के साथ दुर्व्यवहार पर पीआईओ के ऊपर होगी कार्यवाही
वेबीनार में पार्टिसिपेंट्स के रुप में सम्मिलित हुए सचिन मालवीय ने कहा कि उन्होंने आरटीआई लगाकर एक सरकारी कार्यालय से जानकारी मांगी थी परंतु लोक सूचना अधिकारी ने शासकीय कार्य में बाधा उत्पन्न होना बताया और एफ आई आर दर्ज करवा दी। इस पर राहुल सिंह ने कहा कि यह गलत है और इसकी शिकायत सूचना आयोग में की जानी चाहिए। इस विषय पर ज्यादा प्रकाश डालते हुए राहुल सिंह ने कहा कि की बिहार सामान्य प्रशासन विभाग ने एक दिशा निर्देश जारी किया था इसमें यदि लोक सूचना अधिकारी दुर्व्यवहार करता है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी। राहुल सिंह ने कुछ उदाहरण दिए जिनमें लोक सूचना अधिकारी और अपीलार्थी के बीच फिक्सिंग का भी मामला सामने आया था। इस पर सूचना आयुक्त ने कहा कि ऐसे मामलों पर उन्होंने कार्यवाही भी की है
आरटीआई पब्लिक इंटरेस्ट को लेकर लगाया जाए – सूचना आयुक्त राहुल सिंह
आरटीआई आवेदकों को सलाह देते हुए सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि हमेशा आरटीआई व्यक्तिगत हितों से हटकर बड़े पब्लिक हितों के लिए ही लगाई जानी चाहिए। राहुल सिंह ने रीवा संभाग और मध्य प्रदेश में एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी का उदाहरण देते हुए बताया कि उनके द्वारा हमेशा बड़े पब्लिक इंटरेस्ट को लेकर आरटीआई लगाई जाती है जिसमें न केवल रीवा जिले बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के नागरिकों को लाभ प्राप्त होता है। पंचायत की धारा 40-92 की सूची सार्वजनिक करने, नलकूपों की जानकारी सार्वजनिक करने, मप्र के सेल्समैन के पेमेंट के विषय में पूरे मध्यप्रदेश की जानकारी सार्वजनिक करने और ग्राम पंचायतों के सरपंचों की चुनाव लड़ते समय चल अचल संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करने संबंधी ऐसे कई मामलों का उदाहरण देते हुए सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि इस प्रकार आरटीआई लगाने से स्पष्ट तौर पर सभी को फायदा होता है और सूचना के अधिकार कानून की मंशा के अनुरूप पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है।
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