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MP//Rewa// जिला प्रशासन की आंखों तले स्वच्छंद घूम रहा कराधान घोटाले का 420 आरोपी राजेश सोनी// जिला पंचायत में संजय सिंह के कक्ष में देखा जाता है अक्सर// सीसीटीवी कैमरे के बाबजूद भी नही हो रही है कार्यवाही// रीवा पुलिश ने घोषित कर रखा है 5 हज़ार का इनाम// हाई कोर्ट से खारिज हो चुकी है जमानत याचिका// कराधान घोटाले का रह चुका है सरगना// 420, 409, 130बी, 66 आईटी एक्ट सहित धाराओं में दर्ज है मामला।।

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मध्यप्रदेश में 1148 पंचायतों में लगभग 300 करोड रुपए का 14वें वित्त आयोग की परफॉर्मेंस ग्रांट को लेकर हुआ कराधान घोटाला अपने पूरे डेढ़ वर्ष से अधिक का समय व्यतीत कर चुका है। जहां घोटाले की जांच में वर्ष 2019 में अगस्त से दिसंबर के बीच में लगभग यह बात तय हो गई थी कि मामले में दोषी गंगेव जनपद बाबू राजेश सोनी और गंगेव की 38 पंचायतें साझेदार थी, इसके साथ ही शेष रीवा जिले की 75 पंचायतों में से 27 पंचायतें अन्य जनपदों से सम्मिलित थीं जिसमे दूसरे नंबर पर हनुमना जनपद की 18 पंचायतें थीं। परंतु इस जांच और खुलासे के बाद भी दोषियों पर अब तक मजबूती से कार्यवाही का न होना मध्य प्रदेश सरकार कि भ्रष्टाचारियों के प्रति कोमलता और संरक्षण को दर्शाता है। 

     एक तरफ जहां मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश को माफिया मुक्त घोषित करने का बयान देते रहते हैं वहीं दूसरी तरफ यदि पंचायतों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो मध्य प्रदेश की 23922 ग्राम पंचायतों में 14 वें एवं 15वें वित्त आयोग में जबरदस्त बंदरबांट और घोटाला हुआ है। मनरेगा की तो बात ही न करें क्योंकि यहां तो मरे हुए स्वर्गवासी मजदूरों के नाम पर ही पैसे निकल रहे हैं और उनकी आत्माएं काम कर रही है। यह सब बेहद चिंताजनक है और भारत के लगभग 73 वर्ष पूरे करने वाले इस लोकतंत्र पर एक प्रश्न चिन्ह भी लगाता है कि क्या यह वही भारत है जिसकी नोटों में महात्मा गांधी की फोटो चिपकाई होती है और उन्हें राष्ट्रपिता कहकर गांधी के ग्राम स्वराज के सपने को ठोकर मारी जा रही है। महात्मा गांधी ने अपनी हजारों पुस्तकों में से एक ग्राम स्वराज पर भी पुस्तक लिखी थी जिस पर किस प्रकार ग्रामों और ग्राम पंचायतों को स्वतंत्र और स्वाबलंबी बनाते हुए शहर की चकाचौंध और भागदौड़ से अलग समग्र विकास जिसमें पर्यावरण, जल संरक्षण, कृषि, लघु-कुटीर उद्योग के साथ बिजली पानी सड़क और मूलभूत मानवाधिकार की आवश्यकताएं जैसे स्वास्थ्य शिक्षा सम्मिलित हो और सभी लोग सुखी रहें इसकी अवधारणा की गई थी। लेकिन आज दुर्भाग्य है कि देश में समस्त राजनीति मजदूर और किसानों पर ही केंद्रित रहती है लेकिन आज तक मजदूर किसान और किसान के गांव का कुछ नहीं हो सका है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ग्रामीण परिवेश के प्रति सरकार और सरकार में बैठे हुए प्रशासनिक अधिकारियों का नजरअंदाज करने वाला रवैया है क्योंकि गांव को अभी भी पिछड़ा एवं निचले दर्जे का देखा जाता है।

  दम है तो पकड़ लो मैं हूँ कराधान मास्टर माइंड राजेश सोनी

     यदि हम रीवा जिले की जनपद की बात करें तो सबसे पहले कराधान घोटाला रीवा जिले की गंगेव जनपद की 38 पंचायतों से ही प्रारंभ हुआ था। जिसके विषय में विभिन्न माध्यमों से प्रियासॉफ्ट के माध्यम से प्राप्त जानकारी जिसमें एकमुश्त 14वें वित्त आयोग की परफॉर्मेंस ग्रांट की राशि को शिव शक्ति ट्रेडर्स एवं अन्य के खातों में अंतरित करने वाले गंगेव के जनपद बाबू राजेश सोनी का हांथ प्रमुख था। जांच में पता चला कि सभी सरपंचों-सचिवों को अपने चंगुल में फंसाकर भ्रष्टाचार करने और करवाने वाला राजेश सोनी किस प्रकार लॉगिन और पासवर्ड को अपने काबू में करते हुए रातों-रात ऐसे फर्जी करचोरी करने वाले वेंडर्स के नाम पर राशि जारी कर दिया था जबकि कोई भी कार्य का तकनीकी स्वीकृति भी नहीं हुआ था। वास्तव में देखा जाए तो राजेश सोनी एक निहायत ही शातिर किस्म का व्यक्ति था जिसने जनपद में दशकों अपनी पैठ जमाते हुए पूरे गंगेव जनपद की 88 पंचायतों को हाईजैक कर लिया था। सोनी बोलता था कि हम सबको भोपाल तक पैसे देता हूँ जाकर कर दो जहाँ शिकायत करनी है। जो सरपंच सचिव राजेश सोनी की बात नहीं मानते थे उनको इधर से उधर भटकाता रहता था और सचिवों को धमकियां देता और उनका ट्रांसफर करवाता रहता था। राजेश सोनी कराधान घोटाले में शिव शक्ति ट्रेडर्स के प्रोपराइटर नागेंद्र सिंह और उनकी बेटी प्रतिभा सिंह के साथ प्रमुख आरोपी बना जिसके ऊपर जांच उपरांत आइपीसी 409, 420, 120 बी, आईटी एक्ट आदि धाराओं के तहत गैरजमानती मामला दर्ज किया गया। जनपद बाबू सोनी अपनी अग्रिम जमानत के लिए हाई कोर्ट गया जहां से उसकी जमानत याचिका भी खारिज हो गई। इसके बाद डबल बेंच में जमानत की अर्जी लगाया फिर वहां से भी उसकी जमानत खारिज हुई।

    अपने आकाओं के संरक्षण में 420 का आरोपी राजेश सोनी बैठा रहता है जिला पंचायत में 

    यदि कभी रीवा जिला पंचायत कार्यालय में जाया जाए तो मौके पर कहीं न कहीं राजेश सोनी दिख ही जाता है। कभी वह बाबुओं के कार्यालय में बैठा मिलेगा तो ज्यादातर समय जिला कार्यक्रम अधिकारी संजय सिंह के चेंबर में ही बैठा मिलेगा। संजय सिंह प्रसिद्ध वाटर शेड योजना के रीवा के प्रभार थे। वाटर शेड, पौधारोपण और तालाब निर्माण आदि के नाम पर प्रारंभ में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा प्रारंभ की गई वाटर शेड योजना हरियाली प्रोजेक्ट के लिए करोड़ों अरबों की राशि आई थी जिसका जिम्मा रीवा जिले में वाटर शेड एवं जिला कार्यक्रम अधिकारी संजय सिंह को दिया गया था। लेकिन पूरी राशि में जबरदस्त बंदरबांट किया गया इसके विषय में कई शिकायतें भी हुई लेकिन कोई सार्थक जांच नहीं हो पाई इसके पीछे कोई जिम्मेदार अधिकारी होगा तो निश्चित तौर पर संजय सिंह।

सीईओ स्वप्निल वानखेड़े ने कलेक्टर रीवा डॉक्टर इलैयाराजा डी से की बात

     दिनांक 24 मार्च 2021 को जब एक बार फिर जनपद गंगेव का निलंबित बाबू कराधान घोटाले में भ्रष्टाचार और 420 का आरोपी राजेश सोनी जब जिला पंचायत कार्यालय में विनायक पांडे के पास बैठा मिला तो वहां पर उपस्थित अधिवक्ता संजय पांडे ने मामले की शिकायत जिला पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारी स्वप्निल वानखेड़े से कर दी। स्वप्निल वानखेड़े ने कहा की इस बात का सबूत लाएं कि उसकी जमानत याचिका खारिज हो गई है जिस पर वकील संजय पांडे ने एमसीआरसी क्रमांक – 32803/2020 सीईओ

स्वप्निल वानखेड़े के समक्ष पेश कर दिया जिसको देखने के बाद स्वप्निल वानखेड़े ने तत्काल जिला कलेक्टर रीवा डॉक्टर इलैयाराजा टी से मोबाइल फोन पर बात की और कहां कि आप के आदेश के बाद राजेश सोनी को जिला पंचायत कार्यालय पर अटैच कर दिया गया था लेकिन इसकी जमानत याचिका खारिज बताई जा रही है। जिस पर जिला कलेक्टर रीवा ने कार्यवाही करने के आश्वासन दिए।

 सरकारी कर्मचारी की जमानत याचिका खारिज की जानकारी क्या विभाग प्रमुख को नहीं?

    सूत्रों और जानकारों ने यह भी प्रश्न किया कि जहां तक सवाल उच्च न्यायालय में चल रहे प्रकरणों का है जिसमें किसी शासकीय कर्मचारी अथवा अधिकारी के ऊपर कोई आरोप लगे हो तो इसकी जानकारी संबंधित विभाग प्रमुख के पास निश्चित तौर पर होनी चाहिए। क्योंकि यदि जमानत याचिका खारिज हो गई है अथवा नहीं उन दोनों स्थितियों में निश्चित तौर पर यह जानकारी विभाग प्रमुख के साथ जिला प्रमुख के समक्ष भी होनी चाहिए। अब यदि कराधान जैसे महाघोटाले के मुख्य आरोपी जनपद गंगेव के निलंबित बाबू और मुख्य आरोपी राजेश सोनी की जमानत खारिज होने की जानकारी जिला पंचायत सीईओ एवं जिला कलेक्टर को नहीं है और 5000 इनाम घोषित हुआ आरोपी राजेश सोनी यदि जिला पंचायत कार्यालय में एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय एक कक्ष से दूसरे कक्ष स्वतंत्र बेरोकटोक घूम रहा है जहां स्वयं भी सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं तो यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। इससे तो सीधा यह स्पष्ट होता है कि इस पूरे मामले में सभी उच्च अधिकारियों की मिलीभगत है जो स्वयं भी 5000 रु के इनामी बदमाश को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।

  क्यों नहीं गिरफ्तार किया गया राजेश सोनी को? 

    यदि कराधान घोटाले से जुड़े हुए शिकायतकर्ताओं की सुनें तो जनपद गंगेव के पूर्व बाबू राजेश सोनी को इसलिए गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है क्योंकि यदि राजेश सोनी को गिरफ्तार कर लिया गया तो कराधान घोटाले से संबंधित फाइलों में जो लीपापोती का कार्य चल रहा है वह बंद हो जाएगा। यदि देखा जाए तो कराधान घोटाले में न केवल राजेश सोनी और गंगेव की 38 पंचायतों के सरपंच सचिव सम्मिलित हैं बल्कि तत्कालीन जनपद गंगेव के मुख्य कार्यपालन अधिकारी संजीव तिवारी सहित तत्कालीन जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी मयंक अग्रवाल एवं अर्पित वर्मा भी सम्मिलित हैं क्योंकि कराधान घोटाले से संबंधित राशि जारी करने के कोई भी पत्रक जो पंचायतराज संचालनालय भोपाल भेजे गए हैं वह सब इसी चैनल से होकर गुजरे हैं जिनमें इन सभी अधिकारियों के हस्ताक्षर सम्मिलित हैं। जहां तक सवाल करारोपण की पात्रता और पात्रता के बाद 14वें वित्त आयोग की परफॉर्मेंस ग्रांट प्राप्त होने की है तो वहां भी मामला बहुत स्पष्ट है क्योंकि अपात्र पंचायतों को फर्जी तरीके से पात्र बताकर और बिना लोकल फंड ऑडिट की ऑडिट करवाए हुए राशि जारी करवा देना महाभ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। और इसमें जनपद जिला के तत्कालीन सीईओ और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी सम्मिलित है। इसीलिए पूर्व गंगेव जनपद के बाबू राजेश सोनी को पुलिस ने औपचारिक तौर पर 5000 रुपये का इनाम तो घोषित कर दिया लेकिन अभी भी जमानत याचिका खारिज होने के बाद भी गिरफ्तार नहीं कर रही है और इन्हीं कारणों से राजेश सोनी बार-बार जिला पंचायत कार्यालय में घूमता रहता है और कराधान घोटाले से संबंधित जो भी दस्तावेज हैं उनको खुर्द बुर्द करने नष्ट करने बदलने का निरंतर कार्य कर रहा है जिसमें जिला पंचायत कार्यालय रीवा के वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर जहां जहां वह उठता बैठता है उनकी भूमिका पर भी सवाल पैदा करता है।

  वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम ने गंगेव जनपद में सरपंचों की सभा में कराधान घोटाला के पक्ष में किया था वकालत

  भले ही देवतालाब के विधायक गिरीश गौतम आज मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष बन गए हैं लेकिन एक समय था जब विधानसभा अध्यक्ष बनने के पूर्व गंगेव जनपद में सरपंचों ने एक मीटिंग बुलाई थी जिसमें मुख्य अतिथि के तौर पर देवतालाब विधानसभा के विधायक गिरीश गौतम और मनगवां के विधायक पंचूलाल प्रजापति को बुलाया गया था। तब मामला काफी गर्म था और जिला प्रशासन के द्वारा मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग की कार्यवाही के चलते दबाव के कारण कराधान घोटाले पर गंभीरता से कार्य किया जा रहा था। वही समय था जब तत्कालीन जनपद गंगेव के प्रभारी सीईओ अजीत तिवारी के द्वारा संबंधित मनगवां थाने में एफ आई आर दर्ज करवाई गई थी। जब कराधान घोटाले के घोटालेबाजों की वकालत और दलाली करने वालों के ऊपर भी घोटाले की आंच आना प्रारंभ हुई तब सब ने मिलकर गंगेव में घोटाले के घोटालेबाजों के पक्ष में बयान बाजी की। यह बात किसी से छुपी नहीं है बल्कि उस समय भी पेपर पत्रिकाओं में छपा था और साथ में उपस्थित सभी लोगों को इसकी जानकारी थी। अब यदि देखा जाए तो वर्तमान में जिस प्रकार 

  क्या आवश्यकता हैं प्रमोद ओझा को वापस गंगेव का सीईओ और केपी पांडेय को मनगवां एसडीएम बनाने की?

      कराधान घोटाले के सूत्रधार तत्कालीन सीईओ प्रमोद ओझा को वापस गंगेव जनपद में बुलाया जा रहा है और साथ में तत्कालीन एसडीएम मनगवां के पी पांडे को भी वापस मनगवां तहसील का अनुविभागीय अधिकारी बनाया गया है। इससे तो साफ जाहिर है कि सभी स्थानांतरण में राजनीतिक हस्तक्षेप होने के चलते और कराधान घोटाले पर पर्दा डालने के उद्देश्य से राजनेताओं के दबाव और सरकार की मंशा के अनुरूप ऐसा किया जा रहा है। क्योंकि यदि मामला ऐसा नहीं होता तो कराधान घोटाले की अब तक जांच पूर्ण हो गई होती एवं दोषी पाए गए कर्मचारियों अधिकारियों के ऊपर कार्यवाही हो गई होती। लेकिन कार्यवाही न करने के लिए ही ऐसे अधिकारियों की पदस्थापना वापस की जा रही है जो स्वयं भी कराधान घोटाले के दौरान पद में थे और जिनके कार्यप्रणाली पर निरंतर शिकायतें हुईं है और आरोप लगते रहे हैं। 

    आखिर सवाल यह है कि मनगवां और गंगेव से इन अधिकारियों को इतना प्रेम कैसे है जो बार बार वापस उसी विवादित जगह पर आना चाह रहे हैं? हो न हो एक आम व्यक्ति को भी इससे भली-भांति स्पष्ट हो जाता है कि दाल में बहुत काला है। एक बात और भी है की इससे मनगवां और रीवा क्षेत्र की जनता को यह बात और भी स्पष्ट हो जाएगी कि उनका वास्तविक हितैषी कौन है वह जो घोटालेबाजों के विरुद्ध लड़ाई ले रहा है अथवा यह राजनेता जो घोटालेबाजों को संरक्षण दे रहे हैं और घोटालेबाजों को संरक्षण देने वाले अधिकारियों की वापस पुनः पदस्थापना करवा रहे हैं।

  आरटीआई से उजागर हुआ था 300 करोड़ का 1148 पंचायतों का घोटाला

     ज्ञातव्य है कि कराधान घोटाला भले ही गंगेव जनपद की 38 पंचायतों से प्रारंभ हुआ लेकिन इस पर सूचना का अधिकार कानून के माध्यम से सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा आरटीआई लगाई गई थी जिसके बाद सुनवाई में राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह के द्वारा कार्यवाही करते हुए तत्काल जानकारी देने के आदेश दिए गए थे और 5 जनपद सीईओ एवं गंगेव जनपद एवं जिला पंचायत रीवा के दो बाबू के ऊपर जुर्माने की कार्यवाही करते हुए कुल लगभग डेढ़ लाख के आसपास जुर्माना लगाया गया था। यह अब तक का किसी भी मामले में लगाया गया सबसे अधिक जुर्माना था। इसके बाद ही रीवा जिले में पंचायत विभाग में ऐतिहासिक कार्यवाहियों का दौर भी चालू हुआ और सैकड़ों सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक के विरुद्ध निलंबन पद से पृथक करने और वसूली की कार्यवाही प्रारंभ हुई। 

     मध्यप्रदेश में सूचना के अधिकार अधिनियम के इतिहास में रीवा जिले के यह कुछ स्वर्णिम काल कहे जा सकते हैं। लेकिन अभी भी कार्यवाही और लड़ाई अधूरी है क्योंकि जब तक कराधान घोटाले पर समग्र कार्यवाही होकर सभी संबंधित सरपंच सचिवों और दोषियों को हटाया नहीं जाता और वसूली नहीं की जाती तब तक लड़ाई अधूरी ही है। 

     अब देखना यह होगा कि जिस प्रकार जमानत याचिका खारिज होने के बाद 5000 रुपये इनाम घोषित तत्कालीन जनपद बाबू राजेश सोनी के विषय में सीईओ जिला पंचायत स्वप्निल वानखेड़े और जिला कलेक्टर रीवा डॉक्टर इलैयाराजा टी को अवगत कराया गया है इसके बाद क्या कार्यवाही की जाती है?

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