RTI की धारा 2(जे)(1) के तहत होता निरीक्षण तो गेहूँ खरीदी की स्थिति होती पारदर्शी- शिवानन्द द्विवेदी// सोसल डिस्टेंसिंग का पालन कर हो सकता था आधिकारिक निरीक्षण// निरीक्षण न होने से अंधेरे में रखा गया जनता को, कोविड के दौर में न कोई देखने वाला न कोई सुनने वाला// जागरूक नागरिकों को जनहित के मामलों से विभाग रखते हैं दूर क्योंकि खुलेगी पोल//

गेहूं खरीदी केंद्रों में व्यापक अनियमितता का दौर जारी है। कोविड-19 के चलते जहां सब अपने घरों में कैद हैं और कुछ देख और बोल नहीं पा रहे हैं ऐसे में विभागों को खुली छूट मिली हुई है। जिन्हें जनता के टैक्स के पैसे से पैमेंट दी जा रही है कि चाहे सामान्य स्थिति हो अथवा महामारी का दौर सब में ड्यूटी करना है और जनता के प्रति जवाबदेह बने रहना है वह अपनी जवाबदेही और जनता के प्रति कर्तव्य से नाता तोड़ते नजर आ रहे हैं।
मानाकि समय विपरीत है और कोविड-19 महामारी का दौर है और सभी का जीवन संकट में बना हुआ है लेकिन सवाल यह है सरकारी कर्मचारियों को आम जनता के टैक्स के पैसे से पेमेंट और सुविधाएं इसलिए दी जाती है कि वह इन्हीं विपरीत परिस्थितियों में जनता के प्रति खड़े रहे और पूरे तन्मयता और जवाबदेही के साथ जनता की सेवा करें। लेकिन विभाग यह मान लें कि चलो हमें तो कोई देखने वाला है नहीं न कोई मीडिया, न किसी की आवाज क्योंकि सब सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए कोरोना के दौर में अपने घरों में कैद हैं तो कोई क्या देखेगा कि कहां कितना गेहूं पड़ा है उसका उठाव हुआ कि नहीं हुआ और फिर विपरीत प्राकृतिक परिस्थितियों बरसात तूफान की स्थिति में उस खरीदे गए फसल का क्या होगा फिर तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता कि किसी प्रकार के सुधार की उम्मीद की जा सकती है।
🔴 *बारिश और तूफान ने प्रदेश के खरीदी केंद्रों की अव्यवस्था की खोल दी पोल*
यहां हुआ भी वही क्योंकि तेज तूफान और भारी बारिश ने तबाही का आलम खड़ा कर दिया जिसकी जानकारी मौसम विभाग ने पहले ही दे दी लेकिन इसके बावजूद भी समिति प्रबंधकों, खरीदी केंद्र प्रबंधक, खाद्य नागरिक आपूर्ति विभाग और नागरिक आपूर्ति निगम की मनमानी के चलते न तो समय पर उस गेहूं का कोई उठाव हो पाया और न ही कोई समुचित व्यवस्था की गई जिससे तिरपाल छाया और सुविधा के अनुरूप उस गेहूं की सुरक्षा की जा सकती। हुआ वही जो दिख रहा है जिसमें पूरे जिले में 2 लाख क्विंटल से अधिक गेहूं कई दिनों तक खुली बारिश में बर्बाद होता गया। अब क्या होगा? जाहिर है गेहूं को भीगा और सड़ा बता कर उसकी नीलामी कर दी जाएगी जिसकी एक चौथाई से भी कम रेट में नीलामी होगी। समिति प्रबंधक घाटा दर्शा देंगे। अंत में तूफान वारिस के नाम पर समितियां घाटे में चली जाएंगी। इस घाटे की भरपाई कहां से होगी? इस घाटे की भरपाई जनता के टैक्स के पैसे से सरकार करेगी क्योंकि वह समितियों को फंड उपलब्ध करवाएगी जिससे समितियां फिर पुनर्जीवित होगी। यदि मात्र गंगेव जनपद की बांस समिति की बात की जाए तो यह समिति 2 करोड़ से अधिक घाटे में चल रही है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए यह मात्र एक समिति का हाल है और यदि सहकारिता विभाग से संबंधित जिले भर की सहकारी समितियों और अथवा प्रदेश की समस्त सहकारी समितियों की बात की जाए तो जहां किसान हमेशा ही खाद बीज का पैसा देते हैं और समितियां खरीदी भी करवाती है उन्हें कमीशन भी मिलता है तब आखिर इतना अधिक घाटा समितियों को कैसे हो रहा है? सीधा जवाब है क्योंकि सब मिलकर माल खा रहे हैं। कोई देख ने वाला नहीं है क्योंकि समितियों में तो आरटीआई कानून भी लागू नहीं होता है। जबकि देखा जाए तो आरटीआई कानून में जो मध्य प्रदेश का अधिनियम बना है उसके अंतर्गत यदि परोक्ष अथवा परोक्ष तौर पर समितियों को 50 हज़ार अथवा उनके टर्नओवर का 50 प्रतिशत जो भी कम हो यदि यह राशि सरकार से इन समितियों को प्राप्त होती है तो यह सही समितियां आरटीआई कानून के दायरे में आती है और इनकी जवाबदेही बढ़ जाती है। सभी को पता है की समितियों में धान और गेहूं की खरीदी से लेकर सरकार की ऋणमाफी योजना और यहां तक कि खाद-बीज वितरण सभी कुछ सरकार के द्वारा करवाया जाता है। शायद कोई ऐसी सहकारी समिति नहीं होगी जो सरकारी राशन की दुकानों में खाद्य विभाग के द्वारा अपने सेल्समैन के माध्यम से गरीबों के लिए पीडीएस सिस्टम का खाद्यान्न वितरण न करवाती हो। यह कमीशन और पैसा भी सरकार के द्वारा ही दिया जाता है जो स्वयं ही यदि कम से कम 6 हज़ार प्रति माह के हिसाब से देखा जाए तो सेल्समैन की पेमेंट 1 वर्ष में 72 हज़ार रु के आसपास हो जाती है जिससे यह समितियां स्वयं ही आरटीआई के दायरे में आ जाती है। लेकिन इसके बावजूद भी आरटीआई कानून से बचना, गरीबों के खाद्यान्न वितरण में धांधली करवाना, गेहूं और धान खरीदी में धांधली करवाना, खाद और बीज वितरण में धांधली करवाना यह इन समितियों की फितरत बन चुकी है और इसके बावजूद भी यह ज्यादातर समितियां करोड़ों के घाटे में चल रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस सब के बावजूद यह समितियां घाटे में क्यों है? कहां जाता है इतना सरकारी पैसा? यह सब सवाल अब आम जनता को खुले तौर पर सरकार से पूछना चाहिए।
🔴 *गेहूं खरीदी केंद्रों में अव्यवस्था के निरीक्षण संबंधी आरटीआई का नहीं दिया कोई जवाब*
इस बीच आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी ने बताया कि उन्होंने गेहूं खरीदी के कुछ सप्ताह पूर्व जिला खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग रीवा में लोक सूचना अधिकारी कार्यालय में दो आरटीआई लगाई थी जिसमें आरटीआई की धारा 2(जे)(1) के तहत गेहूं खरीदी केंद्रों के निरीक्षण की आधिकारिक अनुमति मांगी थी जो कि सक्षम अधिकारी की उपस्थिति में किया जाना था साथ ही एक अन्य आरटीआई जिले के सरकारी राशन की दुकानों के निरीक्षण के विषय में भी लगाई थी। एक्टिविस्ट के द्वारा बताया गया कि इस विषय में जिला खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति नियंत्रक एम एन एच खान के द्वारा कोई भी जानकारी समय सीमा में उपलब्ध नहीं करवाई गई। इसके उपरांत आरटीआई की प्रथम अपील कलेक्टर कार्यालय में एडीएम इला तिवारी के समक्ष की गई है लेकिन उस पर भी कोई जवाब नहीं मिला है।
इस प्रकार देखा जाए तो जहां पिछले कुछ सालों से मध्य प्रदेश के रीवा संभाग में आरटीआई कानून के उल्लंघन को लेकर मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह के द्वारा जमकर जुर्माने और अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई है लेकिन इसके बावजूद भी जनता के प्रति जवाबदेही के लिए बने कानून आरटीआई का किस प्रकार माखौल उड़ाया जा रहा है इस बात से भलीभांति स्पष्ट हो जाता है। अभी भी इन सक्षम अधिकारियों को कानून के प्रति कोई भय नहीं है।
🔴 *निरीक्षण में खरीदी अव्यवस्था की खुलती है इसलिए निरीक्षण संबंधी आरटीआई का नहीं देते कोई जवाब*
वहीं आरटीआई कानून को लेकर सरकारी अफसरों में नकारात्मक और उदासीन रवैए को आड़े हाथों लेते हुए सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने बताया कि सामान्य तौर पर आरटीआई आवेदन लगाकर कागजों की प्रमाणित प्रति चाही जाती है जिसके बाद संबंधित विभाग को अनियमितता मिलने पर कार्यवाही के लिए शिकायत की जाती है तब जाकर कार्यवाही होती है लेकिन जहां तक सवाल आरटीआई की धारा 2(जे)(1) के तहत निरीक्षण को लेकर है वहां सब कुछ तत्काल दिख जाता है। मसलन यदि खरीदी केंद्रों में अनियमितता है अथवा सरकारी राशन की दुकान में हितग्राहियों का राशन नहीं दिया जा रहा है अथवा अन्य किसी कार्यालय में किसी भी प्रकार की अनियमितता मौके पर पाई जाती है तो निरीक्षण में तत्काल दिख जाती है और निरीक्षण में सारी कमियां उजागर हो जाती है। उदाहरण के लिए यदि देखा जाए तो रीवा संभाग में धारा 2(जे)(1) के तहत कुछ ऐसे विशेष मामले आए हैं जिसमें कमिश्नर कार्यालय का निरीक्षण, कलेक्टर कार्यालय का निरीक्षण और इसके पहले खाद्य विभाग से संबंधित खरीदी केंद्रों में धान खरीदी केंद्रों के निरीक्षण में काफी अनियमितता सामने आई थी जिस पर संबंधित अधिकारियों को मौके पर तत्काल कार्यवाही भी करनी पड़ी थी जिससे व्यवस्था में सुधार भी तेजी से हो रहा था परंतु क्योंकि तत्काल कार्यवाही कर दोषियों के विरुद्ध मामला पंजीबद्ध करना होता है जिसमें कुछ इन अधिकारियों की भी मिलीभगत हुआ करती है इसलिए इस बार खाद्य विभाग ने गेहूं खरीदी केंद्र एवं सरकारी राशन की दुकानों में हो रही धांधली और अनियमितता का निरीक्षण मौके पर नहीं करवाया क्योंकि यदि ऐसा करवाते तो उनकी कमियां मौके पर उजागर होती और उन्हें मौके पर ही मीडिया के समक्ष कार्यवाही करनी पड़ती और उसकी प्रमाणित जानकारी भी देनी होती।
🔴 *धारा 2(जे)(1) से डरते हैं विभाग क्योंकि मौके पर ही होते हैं बेनकाब*
इस प्रकार देखा जा सकता है की आरटीआई की धारा 2(जे)(1) एक अत्यंत पावरफुल धारा है जिसके तहत यदि देखा जाए तो मौके पर ही सब निर्णय हो जाते हैं और देश में हो रहे भ्रष्टाचार और अनियमितता पर काफी हद तक अंकुश लग सकता है। लेकिन क्योंकि विभागों की फितरत भ्रष्टाचार को बढ़ाना होता है और कमीशनखोरी में संलिप्त क्यों ऐसा करेंगे जिससे उन्हीं के व्यक्तियों के ऊपर कार्यवाही हो? सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी की मानें तो निरीक्षण संबंधी आरटीआई पर खाद्य विभाग द्वारा सार्थक कार्यवाही न किया जाना इस बात का पर्याप्त सबूत है कि गड़बड़ियां हुई हैं जिन्हें छुपाने के लिए ऐसा किया जाता है। एक्टिविस्ट ने बताया कि वह मामले की द्वितीय और अंतिम अपील मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग के समक्ष करेंगे और इस पर कार्यवाही की मांग करेंगे।

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