धूमधाम से मनाया गया गुरु पूर्णिमा महोत्सव
गुरु वह तत्व है जो हमारी दिशा और दशा बदल कर परमतत्व से मिला दे :: स्वामी श्री प्रपन्नाचार्य जी,पुरानी लंका ( चित्रकूट धाम )पीठाधीश्वर स्वामी जीकेभक्तों का लगा तांता
शहडोल । आध्यात्मिक जगत में गुरु पूर्णिमा का महत्व है इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। उनके सम्मान में ही हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है। कहा जाता है कि इसी दिन व्यास जी ने शिष्यों एवं मुनियों को सर्वप्रथम श्री भागवतपुराण एवं सभी वेदों का ज्ञान दिया था तभी से गुरु पूर्णिमा मनाने की प्रथा प्रारंभ हुई।
आध्यात्मिक जगत के सभी धर्मावलंबी अपने अपने गुरु महाराज को श्रद्धा सुमन अर्पित करने एवं दर्शन लाभ कर चरण पूजन हेतु अपने-अपने गुरुद्वारों पर पहुंच कर गुरु भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ।
पुरानी लंका चित्रकूट धाम के पीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामी श्री प्रपन्नाचार्य जी महाराज मोहन राम जानकी मंदिर पहुंच कर अपने भक्तों को दर्शन दिए एवं आशीर्वाद रूप में बताया कि आज गुरु पूर्णिमा है। कृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्मदिवस है, इसलिए इस तिथि को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। आज हमारे पास सनातन के नाम से जो भी शास्त्र धरोहर के रूप में वेद पुराण आदि हैं, वे सब वेद व्यास जी की ही कृपा से हैं, जिनके अध्ययन मनन अनुशीलन परशीलन से आज के आचार्य गुरु पद की गरिमा को बनाए हुए हैं।
गुरु वह तत्त्व है जो हमारी दिशा और दशा बदलकर परमतत्त्व से साक्षात्कार का साधन उपलब्ध कराते है। गुरु पद का अर्थ ही है अन्धकार दूर कर जीव को प्रकाशित कर दे।
हम सबकी प्रथम गुरु माता है, जो पिता सहित संसार से हमारा परिचय कराती है। भगवान शिव आदि गुरु हैं, श्री कृष्ण जगत गुरु हैं ‘कृष्णं वन्दे जगत गुरुम’ और श्री हनुमान जी गुरु की पदवी तो नहीं पसंद करते किन्तु वे कृपा में गुरु ही हैं।
“जै जै हनुमान गुसाईं कृपा करहु गुरुदेव की नाई।”
दत्तात्रेय भगवान् ने तो 24 गुरु माने हांथी से लेकर मधुमक्खी तक। हम भी जिनसे सीखते हैं, वह गुरु ही होते हैं।
आज के युग में योग्य गुरुओं की नहीं योग्य शिष्यों की कमी है। योग्य शिष्य को गुरु स्वयं खोजते हैं। जैसे विश्वामित्र जी ने राम- लक्ष्मण को खोजा, महावतार बाबा ने लाहिड़ी महाशय को, स्वामी राम कृष्ण परमहंस ने नरेन्द्र को। गुरु शिष्य की अमरता के लिए द्रोणाचार्य बनकर कलंक भी अपने शिर ले लेते हैं तभी तो उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश से भी बढ़कर परब्रह्म का पद मिला हुआ है।
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुदेवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात्त परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।।”
आप सभी के जीवन में भी गुरु तत्व का प्रवेश हो इन्ही शुभकामनाओं के साथ इस पावन पर्व सभी का कल्याण हो सभी मानव जाति में शक्ति का संचार हो एवं अपने अपने माता-पिता तथा गुरुजनों का सम्मान बना रहे ।
शहडोल के पुरातन मंदिरों में मोहन राम जानकी मंदिर दिव्य रामलला के दरबार की झांकी एवं गुरुदेव भगवान की झांकी बनाई गई जिसमें कोरोना महामारी को देखते हुए सामाजिक दूरी का विशेष ध्यान रखा गया उसके बाद सभी भक्तों ने अपने गुरुदेव की चरण पादुका पूजन किए । मंदिर ट्रस्ट द्वारा मंदिर पर आए सभी श्रद्धालुओं के लिए विशाल भंडारे प्रसाद का आयोजन किया गया।




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