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60वें आरटीआई वेबिनार का हुआ आयोजन // सूचना आयोग के विरुद्ध पीआईओ द्वारा रिट पेटीशन गैर-संवैधानिक -शैलेश गाँधी // हाई कोर्ट को सूचना आयुक्तों के आदेशों को पढ़कर स्टे देना चाहिए बिना पढ़े नहीं – राहुल सिंह

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सूचना के अधिकार कानून को जन जन तक पहुचाने के उद्येश्य से प्रत्येक रविवार सुबह 11 बजे से दोपहर 01 बजे तक स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त रविवार को ज़ूम मीटिंग वेबिनार का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता मप्र राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह करते हैं जबकि विशिष्ट अतिथि के तौर पर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गाँधी, पूर्व मप्र राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप, माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक भास्कर प्रभु जी सम्मिलित होते हैं. कार्यक्रम में भारत के विभिन्न राज्यों मप्र, उप्र, राजस्थान, गुजरात, विहार, आन्ध्र प्रदेश, असम, नई दिल्ली, जम्मू कश्मीर, तमिलनाडु, झारखण्ड, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से सहभागी सम्मिलित होते हैं जो अपनी बातें रखते हैं और प्रश्नों के जबाब पाते हैं.

  60वें ज़ूम मीटिंग कार्यक्रम के सफल आयोजन में मुख्य रूप से कार्यक्रम का संयोजन एवं प्रबंधन का कार्य अधिवक्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट नित्यानंद मिश्रा, अम्बुज पाण्डेय, शिवानन्द द्विवेदी, देवेन्द्र अग्रवाल, पत्रिका समूह से वरिष्ठ पत्रकार मृगेंद्र सिंह ने किया.

 

सूचना आयोग के विरुद्ध रिट पेटीशन गैर-संवैधानिक -शैलेश गाँधी

 

  पूर्व केन्द्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गाँधी ने बताया की सूचना आयोग के आदेशों के विरुद्ध हाई कोर्ट में रिट पेटीशन दायर करना पूरी तरह से गैर कानूनी और गैर संवैधानिक है. उन्होंने बताया की संविधान के आर्टिकल 226 के तहत रिट स्वीकारना हाई कोर्ट के कार्यक्षेत्र में नहीं आता. आर्टिकल 226 के तहत रिट के माध्यम से कुछ विशेष परिस्थितियों में ही सूचना आयोग के आदेशों को चैलेंज किया जा सकता है. यह स्पष्ट है की जब सूचना आयुक्त अपने आदेश में कोई विशेष गलती करे और अपने कार्यक्षेत्र से आगे जाकर कोई आदेश जारी करे उन स्थितियों में ही हाई कोर्ट में रिट पेटीशन दायर की जा सकती है. उन्होंने कहा की यदि यह मान लिया जाय की कुछ विशेष परिस्थितियों में रिट स्वीकार की जानी चाहिए तब भी जिस प्रकार से हाई-कोर्ट लगभग 100 प्रतिशत मामलों में सूचना आयोग के आदेश के विरुद्ध दनादन स्टे दे रहा है ऐसे में कोर्ट की मंशा स्पष्ट हो जाती है और कोर्ट आरटीआई कानून के विरुद्ध जा रहे हैं. हम सभी आरटीआई कानून के शुभचिंतकों और एक्टिविस्ट को चाहिए की इसका विरोध करें और सरकार और कोर्ट को लिखें. उन्होंने सूर्य देव राय बनाम राम चन्द्र राय वर्ष 2003 सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया और बताया की कैसे आर्टिकल 226 का प्रयोग आयोग के विरुद्ध स्टे प्राप्त करने में उपयोग नहीं किया जा सकता.

    उन्होंने स्किल इन्फ्रास्ट्रक्चर का भी एक प्रकरण का हवाला दिया और बताया की कैसे 226 आर्टिकल के तहत स्टे प्राप्त करना गैर कानूनी है.

 

  आर्टिकल 226(3) का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया की कैसे दूसरे पक्ष को बिना सुनवाई का अवसर दिए हुए स्टे नहीं दिया जा सकता. शैलेश गांधी ने बताया की वैकेटिंग स्टे लगाने के बाद 15 दिन के भीतर ऐसे समस्त स्टे स्वयं ही खारिज हो जाते हैं. आगे उन्होंने बताया की आर्टिकल 226 के तहत फंडामेंटल राइट्स मात्र आम जनता को प्राप्त है न की पब्लिक अथॉरिटी को. सुप्रीम कोर्ट के हरिविष्णु कामत के मामले को देखा जाय तो पब्लिक अथॉरिटी स्टे के लिए रिट नहीं लगा सकती. उन्होंने कहा की स्टे तब दिया जाता है जब स्टे न देने से कोई बड़ा नुक्सान हो जाय जो ठीक न किया जा सके. लेकिन जहां तक सवाल सूचना आयोग के आदेशों के विरुद्ध लोक प्राधिकारियों द्वारा स्टे लिया जाना वह ऐसा नुकसान होने जैसा कुछ भी नहीं है. कोर्ट यदि प्रभावी नुक्सान नहीं बताता तो उनके पास स्टे देंने का कोई प्रावधान और शक्ति नहीं है.

 

हाई कोर्ट को आयुक्त के आदेशों को पढ़कर स्टे देना चाहिए बिना पढ़े नहीं – राहुल सिंह

 

    मप्र राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा की ऐसा प्रतीत होता है की हाई कोर्ट में जज न तो सूचना आयोगों के आदेशों को पढ़ते है और न ही देखते हैं. जैसे ही कोई लोक प्राधिकारी सूचना आयुक्त के जुर्माने के विरुद्ध कोर्ट जाता है वैसे ही तत्काल स्टे दे दिया जाता है. जिस प्रकार 100 प्रतिशत मामलों में कोर्ट द्वारा स्टे दे दिया जाता है उससे लगता है की कोर्ट हमारे आदेशों को पढ़ता ही नहीं है. ज्यादातर हमारे आदेश स्पीकिंग आर्डर होते है लेकिन लगभग सभी में यदि कोई लोक प्राधिकारी हाई कोर्ट में रिट दायर करता है और स्टे मागता है तो उसे तत्काल दे दिया जता है इससे साफ़ जाहिर है की कोर्ट में जज सूचना आयोग के आदेशों को देख तक नहीं रहे हैं. यह माना जा सकता है की जो आदेश स्पीकिंग आर्डर नहीं हैं उस स्थिति में तो स्टे देना ठीक है लेकिन स्पीकिंग आर्डर में ऐसा करना नेचुरल जस्टिस के विरुद्ध है. उन्होंने कहा की हाई कोर्ट में काफी मामले पेंडिंग हो रहे हैं जिसकी वजह से लोड भी बढ़ रहा है. कोई भी केस उठा लें और सभी में स्टे दिया जा रहा है. हमे लगता है हमे चीफ जस्टिस एंड जजों को संवेदनशील बनाने की जरुरत है. ऐसा भी नहीं होना चाहिए 100 प्रतिशत मामलों में स्टे दे दिया जाय ऐसे में तो फिर सूचना आयोगों का महत्त्व ही समाप्त हो जाएगा. इसके लिए मुख्य न्यायाधीश को लिखा जाना चाहिए.

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