MP//Rewa – कैथा में श्रीमद भागवत महायज्ञ का सातवाँ दिन // जीव अंश है और ईश्वर अंशी, अंश का अंशी से सम्बन्ध ही मोक्ष है – डॉक्टर गौरीशंकर शुक्ला // जो पूर्ण श्रद्धा भाव से मेरी शरण में आता है वह मायासागर से पार पा लेता है – श्रीकृष्ण
पावन पुनीत यज्ञस्थली हनुमान मंदिर प्रांगण कैथा में भागवत महायज्ञ का कार्यक्रम सतत चल रहा है. इस बीच व्यासपीठ पर विराजमान आचार्य डॉक्टर गौरीशंकर शुक्ला ने भगवान् श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का वर्णन किया. उन्होंने कुब्जा की कथा और अक्रूरजी का हस्तिनापुर जाना, कालयवन और मुचुकुन्द की कथा, कृष्ण रुक्मिणी विवाह, जरासंध वध, श्रीकृष्ण सुदामा चरित्र, वैराग्य का महत्व, वेदस्तुती, नवयोगेश्वर द्वारा माया से पार पाने के उपाय, दत्तात्रेय द्वारा किये गए 24 गुरुओं की कथा, श्रीकृष्ण द्वारा ऊधव को उपदेश, ऊधव जी द्वारा भगवन श्रीकृष्ण की चरण पादुका लेकर बद्रिकाश्रम जाना आदि कथा प्रसंगों का वर्णन किया.
जीव अंश है और ईश्वर अंशी, अंश का अंशी से सम्बन्ध ही मोक्ष है – डॉक्टर गौरीशंकर शुक्ला
व्यासपीठ पर विराजमान डॉक्टर गौरीशंकर शुक्ला ने बताया कि जीव और ईश्वर का सम्बन्ध ही शाश्वत है. जीव अंश है अर्थात वह ईश्वर से अलग नहीं है जबकि ईश्वर अंशी है अर्थात वह अंश उस सम्पूर्ण सर्वज्ञ सर्वव्याप्त का ही हिस्सा है और उसी से उत्पन्न हुआ है. अज्ञान का आरंभ कब और कैसे हुआ यह कैसे जाना जा सकता है? अज्ञान यही है की अंश अंशी से अलग है. जब जीव-अंश ईश्वर-अंशी में मिल जाता है तो ही सुख शांति की प्राप्ति हो सकती है. बताया गया की जबसे जीव परमात्मा से विभक्त हुआ है तभी से वह दुखी है. शरीर को तो ईश्वर से जोड़ा नहीं जा सकता क्योंकि वह भौतिक है इसलिए मन और आत्मा को ईश्वर से जोड़ने पर समस्त दुखों का नाश हो जाता है. सभी जीवों में सर्वत्र ईश्वर विद्यमान है ऐसा मानकर व्यवहार करने से सब भक्तिमय हो जाता है. जड़-चेतन सब ईश्वरमय है ऐसा मानने से पापों से बचा जाएगा और मन को शांति भी मिलेगी.
बिना सत्संग के ज्ञान की प्राप्ति करना कठिन
आचार्य ने बताया की ज्ञान प्राप्त करने के लिए संतों की संगति आवश्यक होती है. मानव मन विभिन्न प्रकार के मलिन संस्कारों से दूषित रहता है अतः जिस प्रकार गंदे वर्तन को धोने के लिए शुद्ध जल और डिटर्जेंट पाउडर की जरुरत होती है वैसे ही मानव के दूषित संस्कारों की सफाई के लिए भी संतों, बुद्धिजीवियों की संगति होना आवश्यक है. बताया गया की जब गरुड़ को नागफांस काटने के बाद स्वयं के मन में अहंकार उत्पन्न हो गया और उन्हें लगा की जिनको सब चराचर जगत में सर्वव्यापी परमात्मा मानकर पूजा करते हैं वही राम आज अपने भाई लक्ष्मण के नाग फांस में बंधे होने के कारण रो रहे थे और असहाय महसूस कर रहे थे तो कैसे भगवान् हो सकते हैं. ऐसा भ्रम में पड़कर जब वह भगवान् शिव के पास शंका समाधान के लिए जाते हैं तो शिव भी गरुड़ की स्थिति देखकर उन्हें कागभुसुंडी के पास जाकर सत्संग के लिए प्रेरित करते हैं, क्योंकि शिव जानते हैं की बिना सत्संग और निरंतर प्रभु गुणगान, स्मरण और महिमा सुने गरुड़ के मन का अहंकार नष्ट नहीं होगा. इस प्रकार कई ऐसे आख्यान देकर आचार्य ने बताया की सत्संग अत्यंत आवश्यक है. बिना सत्संग के ज्ञान की प्राप्ति करना अत्यंत कठिन कार्य है. संत हमेशा प्रभु का ही स्मरण चिंतन करते हैं. जो तीनो लोकों का राज्य मिलने के बाद भी प्रभु को न भूले वही संत है. संत वह है जो प्रेम डोर से ह्रदय के साथ प्रभु को पिरोये रखता है. अतः ऐसे ही संतों का संग करना चाहिए.
जो मेरी शरण में आता है वह मायासागर से पार पा लेता है – श्रीकृष्ण
आचार्य ने बताया की विवेक पूर्वक विचार करने से माया का मोह कम हो जाता है. माया से पार पाने के लिए कई साधन बताये गए हैं लेकिन भक्ति अनायास और सहज प्राप्त साधन है. श्रीकृष्ण भागवत में कहते हैं की जो मेरी शरण में आता है वह मायासागर से तर जाता है. कलियुग में श्रीकृष्ण का नाम जपने से सद्गति मिलती है. सेवा केवल क्रियात्मक नहीं, भावात्मक भी होनी चाहिए. कलियुगी मानव विलासी है और वह विलाशिता में जकड़ा हुआ है. शरीर की उत्पत्ति ही काम द्वारा होती है अतः इस कलियुग में योग और ज्ञानमार्ग द्वारा ईश्वर को प्राप्त करने की अपेक्षा हरिकीर्तन से पाना सरल होता है. नामजप सरल बताया गया है क्योंकि जीभ मानव के अधीन है. शास्त्र कहते हैं की जब ईश्वर का नाम इतना सर्वसुलभ है फिर भी अधिकांश जीव नरक गामी होते हैं यह आश्चर्य की बात है.


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