जनजाति विश्वविद्यालय अमरकंटक में जनजाति पर ही संकट

शहडोल:- भारत सरकार द्वारा अमरकंटक सहित आदिवासी अंचलों को सम्मानित एवं भारत के नक्शे में प्रतिष्ठित करने की मंशा से आदिवासी समुदाय को सम्मानित करते हुए भारत की पहली इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी स्थापित किया गया जिसका उद्देश्य भी आदिवासी समाज के बच्चों को नहीं पीढ़ी के नवीनतम पाठ्यक्रम से प्रशिक्षित एवं शिक्षित किया जाना रहा है वही विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद एवं सभी समितियों में अधिक से अधिक आदिवासी समाज के लोगों को सम्मिलित करने का प्रावधान भारत सरकार द्वारा पारित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अधिनियम 2007 के विभिन्न धाराओं में किया गया विश्वविद्यालय की स्थापना समय से ही विश्वविद्यालय किसी न किसी कारणों से अखबारों की सुर्खियां बटोरता रहा है लेकिन आज जो मामला सरकार और प्रशासन के सामने आया है उसे इस विश्वविद्यालय की स्थापना के उद्देश्य को ही हिला कर रख दिया है जब एक आदिवासी विश्वविद्यालय मैं एक आदिवासी सदस्य का ही अपमान किया जाए और उससे गलत कार्य कराने का दबाव डाला जाए तो आदिवासी बच्चों की हितों की रक्षा कैसे हो सकती है। क्या है मामला:-शहडोल संभाग के प्रतिष्ठित आदिवासी भाजपा नेता नरेंद्र सिंह मरावी द्वारा अमरकंटक स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय मैं आदिवासी समाज के प्रतिनिधि एवं शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों को लेकर विश्वविद्यालय कार्यपरिषद द्वारा किए जा रहे व्यवहार एवं गलत कार्य को दबाव देकर समर्थन करने के लिए मजबूर करने का दबाव बनाने को लेकर अनूपपुर जिले के कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक से लिखित शिकायत की है इस शिकायत में नरेंद्र मरावी द्वारा बताया गया है कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अधिनियम 2007 की धारा 24(2) के अनुसार कार्य परिषद जनजाति सदस्यों की संख्या पर्याप्त होनी चाहिए लेकिन कार्यपरिषद में इकलौता मैं ही जनजाति सदस्य हूं उसके बावजूद भी लगातार मेरा अपमान तथा जनजाति लोगों के अधिकारों का हनन जनजाति छात्रों को विश्वविद्यालय में प्रवेश से वंचित रखने का कार शासकीय पद का दुरुपयोग कूट रचित दस्तावेजों के आधार पर छात्रों को नुकसान एवं जनजातियों के अधिकार से उनको वंचित रखने का कार्य कुलपति एवं कार्य परिषद द्वारा किया जा रहा है विश्वविद्यालय अधिनियम 2007 की धारा 25 (2) मैं भी अकादमिक परिषद में अधिक से अधिक सदस्य जनजाति समुदाय से रखे जाने की बात है लेकिन ऐसा हुआ नहीं कॉलेज डेवलपमेंट काउंसिल में भी यही स्थिति है धारा 27 एवं 28 में वित्त समितियों में समुदाय की सदस्यता कम है ऐसा कार्य परिषद के अध्यक्ष श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी तथा सदस्य अवधेश कुमार शुक्ला अपने स्वयं के लाभ प्राप्त करने के लिए किए हैं जनजाति विश्वविद्यालय के अधिनियम 2007 की धारा 29 में कोई भी कमेटी या परिषद या अन्य प्रकार की प्राधिकृत समिति में जनजाति समुदाय की भागीदारी पर्याप्त संख्या में रखने का प्रावधान किया गया है किंतु विश्वविद्यालय के कुलपति तथा कार परिषद के अध्यक्ष शिव प्रकाश मणि त्रिपाठी तथा कार्य परिषद के सदस्य अवधेश कुमार शुक्ला द्वारा षड्यंत्र रच साजिश पूर्ण नियत से जनजाति समुदाय को अपमानित करने के लिए और उन्हें वित्त समिति बिल्डिंग समिति तथा अन्य प्रकार की सभी महत्वपूर्ण समितियों में जनजाति समुदाय की भागीदारी नगण्य कर दी गई है जो कि अधिनियम के विपरीत जाकर जनजाति पर अत्याचार करने जैसा अपराध है ऐसे ही कार्यपरिषद में विशेष आमंत्रित सदस्य को बुलाने का प्रावधान नहीं है लेकिन कुलपति द्वारा प्रोफेसर आलोक शोत्रिय, प्रोफ़ेसर मूर्ति ,जेना को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में परिषद की बैठक में बुलाया जाता है ताकि कार्य परिषद मैं गलत कार्यों को हावी होकर पारित करा लिया जाए।नरेंद्र मरावी के अनुसार इंदिरा गांधी जनजाति विश्वविद्यालय कार्य परिषद की 49 वी बैठक दिनांक 13 अक्टूबर 2021 को आयोजित की गई इसकी सूचना 1 दिन पहले 12 अक्टूबर 2021 को मुझे दी गई जानबूझकर 1 दिन पहले बैठक को फाइनल करना तथा आधा अधूरा एजेंडा के साथ यह परंपरा गैरकानूनी तथा नियम विरुद्ध है कम से कम 15 दिन पहले कार्य परिषद की रेगुलर बैठक की सूचना आनी चाहिए थी कार्य परिषद की कार्य सूची के बिंदु क्रमांक 1 में कार्य परिषद की पिछली 46 वी 43 वी तथा 48 वी संपन्न हो चुकी बैठक के मिनट्स को कंफर्म किया जाना है 48 वी कार्यपरिषद की बैठक 15 जुलाई 2021 को हुई थी उसमें मेरे द्वारा दिए गए एजेंडे को शामिल नहीं किया गया था इसी प्रकार व्यक्तिगत चिट्ठी लिखकर भी मेरे द्वारा श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी को कुछ एजेंडे आइटम को शामिल किए जाने के लिए लिखा गया था लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। नरेंद्र मरावी आगे बताते हुए लिखा की मेरा अपमान तथा मेरे साथ अत्याचार इस प्रकार हुआ की दिनांक 15/ 7/ 2021 को आयोजित की गई कार्यपरिषद की मिनट्स आज दिनांक तक मुझे नहीं भेजी गई है और ना ही मुझसे हस्ताक्षर कराया गया है और बिना मेरे अनुमोदन के बिना मेरे हस्ताक्षर के आज दिनांक 13/10/ 2021 में होने वाली कार्यपरिषद की बैठक मैं उसे अनुमोदित करने के लिए कार्य सूची एक में रखा गया है जो सीधे-सीधे शासकीय पद का दुरुपयोग भ्रष्टाचार तथा जनजाति कार्यपरिषद सदस्य का अपमान तथा उस पर अत्याचार करने का है इसके अलावा विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए मेरे द्वारा प्रस्तुत एजेंडे को शामिल नहीं किया और मध्य प्रदेश के हजारों जनजाति छात्रों के अधिकार से उन्हें वंचित करने का काम किया गया है नरेंद्र मोदी द्वारा इस अवैध तथा भर्रा शाही का उदाहरण मानते हुए कानूनी कार्यवाही करके दोषियों को गिरफ्तार किया जाने की गई है उपरोक्त शिकायत मे ओर भी विषय कई गंभीर एवं संवेदनशील विषयों को लेकर नरेंद्र मरावी ने जनजातीय विश्वविद्यालय के परत दर परत अनियमितताओं आदिवासी हितों की अनदेखी एवं भार्रा शाही खुलासा किया है मामला उच्च स्तरीय होने के साथ-साथ राजनैतिक भी है इसलिए इस पर वास्तविक निर्णय कुलाधिपति महामहिम राज्यपाल ही ले सकते है

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