शहडोल न्यूज:भारत की सांस्कृतिक पहचान आदिवासी संस्कृति- मंत्री श्री फग्गन सिंह कुलस्ते !

जनजातीय नायकों के बलिदान पर आयोजित हुई संगोष्ठी
शहडोल 19 सितम्बर 2022- केन्द्रीय ग्रामीण विकास एवं खनिज राज्य मंत्री श्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने कहा है कि भारत की सांस्कृतिक पहचान आदिवासियों के संस्कृति से है। उन्होंने कहा है कि आदिवासियों की संस्कृति उनके परंपरागत ज्ञान आदिवासी जन नायको के बलिदानों की गाथाओ का संरक्षण होना चाहिए तथा आदिवासी जननायकों की गाथाएं युवा पीढी तक पंहुचनी चाहिए। उन्होंने कहा है कि देश के स्वाधीनता संग्राम में आदिवासी जननायको का अविस्मरणीय योगदान रहा है। किन्ही कारणों से आदिवासी जननायकांे की गाथाएं जनमानस तक नही पंहुच पाई आदिवासी जननायकांे की गाथाएं विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत युवाओं के माध्यम से लोगों तक पहुंचना चाहिए। केन्द्रीय मंत्री श्री फग्गन सिंह कुलस्ते आज जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक में आयोजित स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय नायको का योगदान विषय पर आयोजित संगोष्ठी को सम्बोधित कर रहे थें। उन्होंने कहा कि भारत में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है यह सराहनीय पहल है इसके माध्यम से आजादी की लड़ाई में योगदान देने वाले महापुरूषों तथा जननायकों को याद किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा, वीरनारायण,रघुनाथ शाह शंकर शाह, रानी कमलापति के विषय मंे जन मानस को बहुत ज्यादा जानकारी नही थी। आदिवासी जननायकों की वीर गाथाआंे को जनमानस तक पहुंचाने के प्रयासों के कारण ही आज आदिवासी जननायकों के बारे में लोगो को जानकारी हो रही है। उन्होंने युवाओं से अपील करते हुए कहा कि वे स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाले जननायकों की गाथाओं को लोगों तक पहुंचाने का प्रयास करें। संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए मध्यप्रदेश के पूर्व जनजातीय आयोग के अध्यक्ष श्री नरेन्द्र मरावी ने कहा कि भारत की स्वतंत्रता में जनजातीय नायकों का गौरवशाली इतिहास रहा है। मुगलों के आक्रमण से लेकर भारत की स्वतंत्रता तक विभिन्न कालों में जनजातीय नायकों ने अपनी संस्कृति और देश की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष किये और कई कुर्बानियां दी। उन्होंने कहा कि हल्दी घाटी युद्व में देश की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप का हजारों आदिवासियों ने सहयोग किया और अपने प्राणों की आहूति दी। रानी दुर्गावती, तिलका माझी, विध्यांचल में पंका बैगा, गुजरात में रामजी गोंड आदि का गौरवशाली इतिहास रहा है, किन्तु इतिहास के पन्नों में इसका उल्लेख नगण्य है। इतिहासकारों ने जनजातीय समाज के वीरों के साथ भेदभाव किया है। उन्होंने कहा कि पढे़ लिखे आदिवासी युवा जनजातीय नायकों के इतिहास को खोजें तथा उनकी गाथाओं पर शोध करें तथा आदिवासी जननायकांे के इतिहास को जनमानस तक पहंुचाएं।
संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए संयोजक आजादी का अमृत महोत्सव श्री विजेन्द्र शुक्ल ने कहा कि देश की आजादी में जनजातीय नायकांे ने सशक्त संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय नायकों के संघर्ष के इतिहास में उल्लेख नही हुआ। तंट्ट्या भील, तारा भगत सिद्दू कानू, वीर नारायण सिंह जैसे आदिवासी जननायकों का बहुत ज्यादा उल्लेख नही मिलता। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम में अपना योगदान देने वाले आदिवासी नायकों की संघर्ष की कहानियां जनमानस तक पहंुचना चाहिए। संगोष्ठी को केन्द्रीय जनजातीय आयोग के सलाहकार श्री रविशंकर, जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक के कुलपति श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी ने भी सम्बोधित किया। इस अवसर पर कमिश्नर शहडोल संभाग श्री राजीव शर्मा, कलेक्टर सुश्री सोनिया मीणा, विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थी छात्र उपस्थित थें।

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