शहडोल मेडिकल कॉलेज या ‘बीमारियों का घर’? समस्याओं का अंबार, जनप्रतिनिधि मौन और रेंग रही कछुआ व्यवस्था!

विशेष ग्राउंड रिपोर्ट – बेबाक शक्ति न्यूज़ शहडोल। कहने को तो यह बिरसा मुंडा शासकीय मेडिकल कॉलेज है, जहां संभाग भर के गरीब और लाचार मरीज इस उम्मीद के साथ आते हैं कि उन्हें नया जीवन मिलेगा। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। आज शहडोल मेडिकल कॉलेज खुद वेंटिलेटर पर है! न कोई देखने वाला है, न कोई सुनने वाला। बदइंतजामी का आलम यह है कि यहां इलाज कराने आए लोग ठीक होने की बजाय नई बीमारियां लेकर घर लौटने को मजबूर हैं।
दानदाताओं के भरोसे व्हीलचेयर, स्ट्रेचर की भारी किल्लत!
मेडिकल कॉलेज में बुनियादी सुविधाओं का अकाल पड़ा हुआ है। अस्पताल में स्ट्रेचर की भारी कमी है, जिससे गंभीर मरीजों को एक वार्ड से दूसरे वार्ड ले जाने में तीमारदारों के पसीने छूट रहे हैं। हद तो यह है कि व्हीलचेयर जैसी अत्यंत आवश्यक सुविधा के लिए भी यह सरकारी संस्थान दानदाताओं की मेहरबानी का इंतजार कर रहा है। क्या सरकार और प्रशासन के पास इतनी भी राशि नहीं है कि मरीजों के लिए व्हीलचेयर खरीदी जा सके?
सांसद की ‘दानवीरता’ पर सिस्टम का ग्रहण: खड़ी-खड़ी कबाड़ हो रही हैं एम्बुलेंस!
जनता की सहूलियत के लिए शहडोल सांसद हिमाद्री सिंह द्वारा मेडिकल कॉलेज को दो एम्बुलेंस दान में दी गई थीं। लेकिन अफ़सोस, ये एम्बुलेंस आज सिर्फ शो-पीस बनकर खड़ी हैं और धूल खा रही हैं। आम जनता को इस सुविधा का कोई लाभ नहीं मिल रहा है।
बड़ा सवाल: मानते हैं कि सांसद महोदया जनसेवा और राजनीतिक दौरों में व्यस्त रहती हैं, लेकिन उनके क्षेत्र में तैनात जनप्रतिनिधि और नुमाइंदे आखिर क्या कर रहे हैं? दान में मिली गाड़ियों का क्या उपयोग हो रहा है, इसकी सुध लेने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। यह लापरवाही बेहद चिंताजनक है।
शर्मनाक! फिजियोथेरेपी यूनिट में दो साल से टपक रहा शौचालय का पानी
बारिश का मौसम शुरू होते ही मेडिकल कॉलेज की पोल एक बार फिर खुल गई है। बिरसा मुंडा मेडिकल कॉलेज के फिजियोथेरेपी यूनिट की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे विचलित करने वाली हैं।
पिछले दो सालों से यहां छत से शौचालय (टॉयलेट) का गंदा पानी टपक रहा है।
पानी को रोकने के लिए नीचे डब्बे और बाल्टियां रखी गई हैं।
अस्पताल का स्टाफ इलाज करने के बजाय दिनभर उन डब्बों में भरे गंदे पानी को बाहर फेंकने में व्यस्त रहता है।
यह स्थिति न केवल मरीजों के लिए, बल्कि अपनी जान हथेली पर रखकर 24 घंटे सेवा देने वाले डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के लिए भी बेहद खतरनाक और जानलेवा है।
अंधा प्रशासन, बहरा सिस्टम: क्यों मौन हैं समाजसेवी और NGO?
स्थानीय समाचार पत्रों ने कई बार इस दुर्दशा को प्रमुखता से प्रकाशित किया है, लेकिन मेडिकल कॉलेज प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। प्रशासन पूरी तरह कुंभकर्णी नींद सो रहा है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल शहडोल के जनप्रतिनिधियों, समाजसेवी संगठनों और एनजीओ (NGO) पर भी उठता है। जनहित के बड़े-बड़े दावे करने वाले ये संगठन इस गंभीर मुद्दे पर मौन क्यों हैं? अगर स्थानीय प्रशासन इस अव्यवस्था को सुधारने में नाकाम है या किसी ‘बड़ी शक्ति’ के दबाव में काम कर रहा है, तो अब तक माननीय न्यायालय के समक्ष जनहित याचिका (PIL) क्यों नहीं दाखिल की गई?
बेबाक शक्ति न्यूज़ का सीधा सवाल:
क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे या महामारी फैलने का इंतजार कर रहा है? शहडोल की जनता को इस नारकीय स्थिति से कब निजात मिलेगी?
(बेबाक शक्ति न्यूज़ इस बदइंतजामी के खिलाफ जनता की आवाज को पुरजोर तरीके से उठाता रहेगा।)

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