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क्या कागजी फाइलों और नौकरशाही की उदासीनता की भेंट चढ़ जाएगा प्रधानमंत्री का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ नमामि गंगे?

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139 जिलों में ‘नमामि गंगे’ का बोझ उठाने वाले DPOs खुद बेसहारा; जिला गंगा समितियों का क्रियान्वयन पंगु होने से स्वच्छ गंगा मिशन हो रहा कमजोर
विशेष रिपोर्ट — बेबाक शक्ति न्यूज़ टीम

नई दिल्ली / लखनऊ : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे महत्वाकांक्षी और प्राथमिक अभियानों में से एक ‘नमामि गंगे’ आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां वैश्विक स्तर पर मिली पहचान और बड़े बजटीय आवंटन के बावजूद जमीनी स्तर पर इसके क्रियान्वयन तंत्र को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा दुनिया की शीर्ष 10 पारिस्थितिकी तंत्र पुनरुद्धार पहलों में शामिल किए गए इस राष्ट्रीय मिशन के सामने चुनौती केवल धन की उपलब्धता की नहीं है। प्रशासनिक शिथिलता, जिला स्तर पर संस्थागत ढांचे की कमजोरी, संसाधनों की कमी और स्पष्ट उत्तरदायित्व के अभाव जैसे सवाल भी लगातार सामने आ रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गंगा संरक्षण कोई अल्पकालिक कार्य नहीं है। नदी की स्वच्छता, प्रदूषण नियंत्रण, सहायक नदियों का पुनरुद्धार, नालों का प्रबंधन, वेटलैंड संरक्षण, नदी तटों की सुरक्षा और अतिक्रमण की रोकथाम ऐसे कार्य हैं, जिन्हें वर्षों नहीं बल्कि लगातार जारी रखना होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नमामि गंगे को केवल परियोजना/मिशन आधारित कार्यक्रम के रूप में चलाना दीर्घकाल में पर्याप्त होगा?

जमीनी रीढ़ ही जब पंगु हो, तो कैसे सफल होगा राष्ट्रीय मिशन?
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के 139 गंगा जनपदों में तैनात District Project Officers (DPOs) जिला स्तर पर नमामि गंगे एवं District Ganga Committees के क्रियान्वयन की महत्वपूर्ण कड़ी रहे हैं।

07 अक्टूबर 2016 के गजट नोटिफिकेशन की धारा-54 के तहत गठित District Ganga Committees में जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली व्यवस्था के अंतर्गत इनकी भूमिका निर्धारित की गई। DPOs ने जिला स्तर पर नमामि गंगे से संबंधित गतिविधियों के समन्वय में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

NGT के मामलों के लिए डेटा एवं रिपोर्ट तैयार करने, DGC की बैठकों के आयोजन, नदियों एवं तटीय क्षेत्रों के निरीक्षण, जन-जागरूकता कार्यक्रमों, विभागीय समन्वय तथा District Ganga Plan (DGP) जैसी गतिविधियों को आगे बढ़ाने में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

लेकिन विडंबना यह है कि जिस जमीनी तंत्र से राष्ट्रीय मिशन के क्रियान्वयन की अपेक्षा की जा रही है, उसी तंत्र को आवश्यक संस्थागत सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध कराने के सवाल पर गंभीर कमी दिखाई देती है।

कागजों में सिमटा सचिवालय और ‘घुमक्कड़’ अधिकारी
वर्ष 2019 में NMCG द्वारा प्रति जिले ₹5 लाख के बजट प्रावधान की बात सामने आने के बावजूद कई जिलों में समर्पित एवं पूर्ण रूप से कार्यशील DGC कार्यालय/सचिवालय की व्यवस्था प्रभावी रूप से विकसित नहीं हो सकी। कई स्थानों पर DPOs को नियमित कार्यालय, मेज-कुर्सी, कंप्यूटर, प्रिंटर, रिकॉर्ड व्यवस्था और अन्य आवश्यक संसाधनों के अभाव में काम करना पड़ता है।

ऐसे में सवाल यह है कि यदि जिला गंगा समिति का अपना वास्तविक कार्यालय और सचिवालय ही प्रभावी रूप से संचालित नहीं होगा, तो जिला स्तर पर नदी संरक्षण की गतिविधियों की नियमित निगरानी और क्रियान्वयन कैसे सुनिश्चित होगा?

काम का पहाड़, लेकिन अधिकार सीमित
DPOs द्वारा NGT, DGC, SMCG और NMCG से संबंधित विभिन्न रिपोर्ट एवं कार्यवाहियां तैयार की जाती हैं। उन्हें विभागों से जानकारी जुटाने, बैठकें आयोजित करने, निरीक्षण रिपोर्ट तैयार करने तथा अनुपालन संबंधी कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ती है।

लेकिन दूसरी ओर, सीमित प्रशासनिक अधिकार और संसाधनों के कारण अनेक मामलों में उन्हें विभिन्न विभागों एवं अधिकारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे एक ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जिसमें जिम्मेदारी तो जमीनी स्तर पर है, लेकिन निर्णय लेने और क्रियान्वयन को प्रभावित करने वाले प्रशासनिक अधिकार पर्याप्त नहीं हैं।

समर्पित मानव संसाधन की उपेक्षा क्यों?
IIPA जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से Capacity Building प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके DPOs ने वर्षों तक नदी संरक्षण, पर्यावरणीय गतिविधियों, जिला स्तरीय समन्वय और जन-जागरूकता के क्षेत्र में अनुभव अर्जित किया है। इसके बावजूद यदि प्रशिक्षित मानव संसाधन को पर्याप्त कार्यालय, संसाधन, यात्रा सुविधा, स्पष्ट भूमिका और संस्थागत पहचान उपलब्ध नहीं कराई जाती है, तो इसका नुकसान केवल संबंधित कर्मचारियों को नहीं बल्कि पूरे नदी संरक्षण तंत्र को होता है।

जिले के विस्तृत क्षेत्र में निरीक्षण एवं निगरानी जैसे कार्यों के लिए उपलब्ध यात्रा संसाधनों की पर्याप्तता पर भी सवाल उठते रहे हैं। यदि किसी अधिकारी को अपने कार्यों के लिए निजी संसाधनों पर निर्भर होना पड़े, तो यह किसी भी प्रभावी सरकारी पर्यावरणीय निगरानी व्यवस्था के लिए उचित स्थिति नहीं मानी जा सकती।

ठंडे बस्ते में जिला गंगा प्लान और Dedicated Support Cell
नदी संरक्षण के लिए जिला स्तर पर तैयार किए जाने वाले District Ganga Plan (DGP) का उद्देश्य स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप कार्ययोजना तैयार करना है। लेकिन किसी भी योजना की सफलता केवल उसके तैयार हो जाने से नहीं होती। उसके लिए स्थायी मानव संसाधन, कार्यालय, बजट, तकनीकी विशेषज्ञता और निरंतर निगरानी की आवश्यकता होती है।

इसी प्रकार District Ganga Committees में Dedicated Support Cells की व्यवस्था को लेकर निर्धारित लक्ष्यों के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी सवाल उठते रहे हैं। यदि योजना और समिति दोनों मौजूद हों, लेकिन उनके पीछे स्थायी क्रियान्वयन तंत्र न हो, तो योजनाएं कागजी दस्तावेजों तक सीमित होने का खतरा बना रहता है।

समस्या केवल DPOs की नहीं, पूरे संस्थागत ढांचे की है
District Ganga Committee को जिला स्तर पर गंगा एवं उसकी सहायक नदियों के संरक्षण के लिए विभिन्न विभागों को एक मंच पर लाने वाली महत्वपूर्ण व्यवस्था के रूप में देखा गया। लेकिन एक समिति की बैठकें कराना और नदी संरक्षण का निरंतर प्रशासनिक प्रबंधन — दोनों अलग-अलग बातें हैं।

गंगा संरक्षण में प्रतिदिन सामने आने वाले प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं:

सीवेज प्रबंधन एवं नालों का शोधन

औद्योगिक प्रदूषण पर रोक

नदी तटों पर अतिक्रमण की रोकथाम

वेटलैंड संरक्षण एवं जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण

छोटी एवं सहायक नदियों का पुनरुद्धार

निरंतर जन-जागरूकता अभियान

इन सभी व्यापक कार्यों के लिए स्थायी जिला स्तरीय संस्थागत व्यवस्था की सख्त आवश्यकता है।

क्या अब ‘नमामि गंगे’ को परियोजना से स्थायी विभाग में बदलने का समय आ गया है?
यही वह सबसे बड़ा सवाल है, जिस पर अब केंद्र और राज्य सरकार को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। नमामि गंगे की उपलब्धियों और सीमाओं का मूल्यांकन केवल परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालीन नदी संरक्षण व्यवस्था के रूप में किया जाना चाहिए।

यदि गंगा संरक्षण एक निरंतर चलने वाला दायित्व है, तो इसे केवल परियोजना की अवधि, बजट अथवा मिशन संरचना से बांधना दीर्घकाल में पर्याप्त नहीं हो सकता।

इसलिए एक महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि नमामि गंगे के अंतर्गत जिला स्तर पर वर्तमान District Ganga Committees को मजबूत करते हुए स्थायी “District Ganga Department” अथवा “District Ganga Secretariat” की स्थापना की जाए।

DGC + District Ganga Department : एक स्थायी मॉडल
District Ganga Committee: नीति, निगरानी, अंतर-विभागीय समन्वय एवं उच्च स्तरीय समीक्षा का मंच हो।

District Ganga Department/Secretariat: दैनिक क्रियान्वयन, तकनीकी सहयोग, निरीक्षण, डेटा प्रबंधन, शिकायत निवारण, रिपोर्टिंग और DGC के निर्णयों के अनुपालन की जिम्मेदारी संभाले।

DPO एवं प्रशिक्षित मानव संसाधन: इस स्थायी जिला गंगा प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण कार्यकारी अंग बनें।

जिला गंगा विभाग क्यों आवश्यक है?
एक स्थायी District Ganga Department की स्थापना से:

जिला स्तर पर गंगा संरक्षण के लिए स्थायी प्रशासनिक जिम्मेदारी तय होगी।

DGC के निर्णयों के अनुपालन की नियमित निगरानी हो सकेगी।

DPOs को स्पष्ट भूमिका और संस्थागत आधार मिलेगा।

नदी, सहायक नदियों, नालों और वेटलैंड से संबंधित डेटा का स्थायी रिकॉर्ड तैयार होगा।

अतिक्रमण एवं पर्यावरणीय उल्लंघनों की निगरानी अधिक प्रभावी हो सकेगी।

NGT एवं उच्च स्तरीय पर्यावरणीय निर्देशों के अनुपालन की जिला स्तर पर निगरानी की जा सकेगी।

District Ganga Plan को कागज़ से जमीन तक ले जाने के लिए स्थायी तंत्र उपलब्ध होगा।

विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को नियमित और जवाबदेह बनाया जा सकेगा।

वर्तमान DGC कार्यालयों का वास्तविक निर्माण और संचालन भी जरूरी
District Ganga Department की स्थापना की दीर्घकालीन मांग के साथ-साथ वर्तमान District Ganga Committees के कार्यालयों का वास्तविक रूप से निर्माण एवं संचालन सुनिश्चित करना तत्काल आवश्यकता है। सिर्फ कागज पर DGC कार्यालय का उल्लेख कर देना पर्याप्त नहीं है।

प्रत्येक संबंधित जिले में कम से कम:

स्थायी कार्यालय+प्रशिक्षित मानव संसाधन+डिजिटल सुविधा+रिकॉर्ड रूम+निरीक्षण संसाधन+नियमित बजट+तकनीकी सहायता+शिकायत तंत्र
उपलब्ध कराया जाना चाहिए। तभी District Ganga Committee वास्तव में एक कार्यशील जिला स्तरीय पर्यावरणीय संस्था के रूप में कार्य कर सकेगी।

NGT के हस्तक्षेप की आवश्यकता क्यों?
यह विषय केवल कर्मचारियों की सेवा संबंधी समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। स्थायी District Ganga Department की स्थापना तथा DGC कार्यालयों के वास्तविक संचालन की मांग का सीधा संबंध नदी संरक्षण, पर्यावरणीय प्रशासन और पर्यावरणीय दायित्वों के प्रभावी क्रियान्वयन से है।

इसी कारण इस विषय पर National Green Tribunal (NGT) के समक्ष भी संस्थागत व्यवस्था और जमीनी क्रियान्वयन की समीक्षा की मांग रखी जा सकती है। NGT के समक्ष यह प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि किसी विशेष परियोजना में कितना पैसा खर्च हुआ, बल्कि यह भी होना चाहिए कि:

क्या जिला स्तर पर गंगा संरक्षण के लिए बनाया गया संस्थागत ढांचा वास्तव में जमीन पर कार्य कर रहा है? और यदि नहीं, तो उसके प्रभावी संचालन के लिए आवश्यक प्रशासनिक एवं पर्यावरणीय उपाय क्या हैं?

सरकार और NGT के सामने अब बड़े सवाल
क्या केवल बजट आवंटित कर देने से गंगा स्वच्छ हो जाएगी?

क्या केवल बैठकें आयोजित कर देने से सहायक नदियों का पुनरुद्धार हो जाएगा?

क्या केवल रिपोर्ट तैयार कर देने से नदी तटों और वेटलैंड का संरक्षण सुनिश्चित हो जाएगा?

और सबसे बड़ा सवाल—
जब राष्ट्रीय स्तर के मिशन की जिला स्तरीय कार्यकारी व्यवस्था ही पर्याप्त कार्यालय, संसाधन और प्रभावी संस्थागत अधिकारों के अभाव में संघर्ष कर रही हो, तो केवल कागजी रिपोर्टों और औपचारिक बैठकों के भरोसे गंगा और उसकी सहायक नदियों को दीर्घकालीन रूप से कैसे पुनर्जीवित किया जा सकता है?

अब समय है संस्थागत बदलाव का!
‘नमामि गंगे’ ने देश में गंगा संरक्षण को एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया है। लेकिन अब अगला चरण केवल नई परियोजनाएं शुरू करने का नहीं, बल्कि एक स्थायी और जवाबदेह नदी संरक्षण प्रशासन विकसित करने का होना चाहिए।

नमामि गंगे की परियोजना की अवधि समाप्त हो सकती है, लेकिन गंगा संरक्षण का दायित्व समाप्त नहीं हो सकता।

इसलिए बेबाक शक्ति न्यूज़ के माध्यम से जनहित में यह प्रमुख मांग उठाई जाती है:

“नमामि गंगे को परियोजना से स्थायी नदी संरक्षण व्यवस्था की ओर ले जाया जाए।”

“District Ganga Committee को मजबूत करते हुए जिला स्तर पर स्थायी District Ganga Department/Secretariat की स्थापना की जाए।”

प्रत्येक संबंधित जिले में वर्तमान DGC के लिए वास्तविक, पूर्णतः कार्यशील और संसाधनयुक्त कार्यालय स्थापित करना तुरंत सुनिश्चित किया जाए।

क्योंकि—

“गंगा संरक्षण अस्थायी परियोजना नहीं, स्थायी राष्ट्रीय दायित्व है!”
और यदि यह राष्ट्रीय दायित्व है, तो इसके लिए स्थायी जिला स्तरीय विभागीय व्यवस्था भी अनिवार्य है।

(बेबाक शक्ति न्यूज़ — निष्पक्ष पत्रकारिता, जन-सरोकार और राष्ट्रीय हित की बुलंद आवाज़)

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