लेक्चरर बन गया, क्लास वन अधिकारी… ,तो…आदेश बिकता है बोलो खरीदोगे…

—मामला आदिवासी विभाग में मनमानी का–
(विशेष संवाददाता)
शहडोल संभाग के प्रभारी मंत्री मीना सिंह पर लगे कथित आरोपों के कारण उमरिया जिले के मुन्ना सिंह द्वारा राष्ट्रपति से आत्महत्या करने का अनुमति मांगे जाने की घटना कम से कम यह तो प्रदर्शित ही करती है की आदिम जाति मंत्री मीना सिंह का दबदबा इतना तो है कि प्रशासन उस के दबाव में किसी को आत्महत्या के लिए प्रेरित करवा सकता है।
ऐसे हालत में अगर दबाव इस स्तर का है तो क्या मायने रखता है कि किसी “लेक्चरर” को “क्लास वन अधिकारी” के रूप में जैसींहनगर एकीकृत परियोजना कार्यालय परियोजना अधिकारी का प्रभार दे दिया जाए। जैसा कि मूलत: लेक्चरर के पद पर पदस्थ प्रभारी बी ई ओ के रूप में कार्य कर चुके अशोक शर्मा को सत्ता परिवर्तन के साथ ही गंगा में पवित्र होने का जैसे घोषणा कर दी गई है। अभी कुछ ही दिन पहले अशोक शर्मा तत्कालीन कमिश्नर आरबी प्रजापति के आरोपों से मुक्त होने का प्रमाण पत्र वर्तमान कमिश्नर नरेश पाल के आदेश से सिद्ध हुए थे।
किंतु सत्ता के निकट का दबाव ही है की उन्हें याने लेक्चरर को अब क्लास वन अधिकारी परियोजना अधिकारी रुप में कार्य करने का आदेश भी मिल गया है। इसका विरोध विभाग के हितग्राही पक्ष इसलिए भी नहीं करते हैं क्योंकि एक अधिकारी जब अशोक शर्मा पर लगे आरोपों की जांच के लिए उनके पूर्व कार्यस्थल बुढार कार्यालय में गए तो वहां पर कई सबूत ही नहीं रखे मिले। जिनसे उन्हें आरोपित सिद्ध किया जा सके। याने तमाम प्रकार के तथाकथित भ्रष्टाचार को जमकर प्रयोगशाला की तरह भ्रष्ट धन एकत्र करने का साधन बनाओ और इसके बाद संबंधित आवश्यक कार्यालयीन दस्तावेज के साक्ष्य साथ में भी विलुप्त करो दो और जैसे ही सत्ता परिवर्तन हो मंत्री गणों की कृपा से पवित्र हो जाओ।
रही बात नियम और कानून तथा एक लोक सेवक के मर्यादाओं की वह तो कुछ लाख रुपए में खरीदा और बेचा जा सकता है। कुछ इसी प्रकार का घटनाक्रम इन दिनों कथित तौर पर मंत्री जी के दबाव में अधिकारीगण क्रियान्वित कर रहे हैं..? सहायक आयुक्त कार्यालय से संबंधित एक सूत्र बतलाता है की विभाग की समस्या यह है कि भ्रष्टाचारी जमकर भ्रष्टाचार करता है और उसका कुछ अंश सत्ताधीशों के समर्पित कर देता है। किंतु उससे जो नियम और कायदे टूटते हैं उससे नवीन भ्रष्टाचार की बड़ी संभावना बन जाती है, जिसे रोक पाना अधिकारियों के लिए चुनौती बन गई है।
अब तो शहडोल में 2-2 मंत्री हो गए हैं एक पूर्व आदिम जाति कल्याण मंत्री और एक वर्तमान आदिम जाति कल्याण मंत्री इसलिए दो मंत्रियों के दबाव में शहडोल संभाग का प्रशासन चलाना एक टेढ़ी खीर हो गया है। क्योंकि नियम विरुद्ध आदेशों को करने में दूरगामी जिन घटनाओं का संभावना होती है वह कार्य की गुणवत्ता और शुचिता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर जाती है …?
हाल में जिस तौर तरीके से आदिम जाति कल्याण विभाग मैं घटनाएं घट रही हैं उससे भ्रष्ट कर्मचारियों का मनोबल नवीन भ्रष्टाचारि को स्वाभाविक रूप से जन्म देता है। एक तरफ जब कोरोनावायरस के कारण प्रशासन परेशान है तो दूसरी तरफ इसी कार्यकाल में महत्वपूर्ण निलंबन संबंधी कार्यों पर आश्चर्यजनक आदेश पारित हो रहे हैं। जिन्हें देखकर विश्वास करना मुश्किल होता है कि वास्तव में यह आदेश सही भी हैं अथवा फर्जी आदेश जारी हो रहे हैं….? क्योंकि वास्तविक आदेशों मैं कम से कम पद की गरिमा का ख्याल अवश्य रखा जाएगा चाहे दबाव किसी भी प्रकार का किसी भी स्तर का कितना भी क्यों ना हो….?
वर्तमान आदिम जाति मंत्री मीना सिंह के गृह जिले विधानसभा क्षेत्र मे उमरिया जिले के पाली खंड शिक्षा अधिकारी राणा प्रताप सिंह का निलंबन की बहाली आंख से काजल चुरा लेना जैसी घटना को प्रदर्शित करता है। तो अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ मैं पदस्थ ललित पांडे को नियम विरुद्ध तरीके से शहडोल जिले के गोहपारू में बीईओ के रूप में स्थानांतरित करना स्थानांतरण के संशोधन आदेशों की धज्जियां उड़ाता नजर आता है। जो निलंबित ललित पांडे के संबंध में कमिश्नर आरबी प्रजापति के 15 नवंबर 2019 के बहाली आदेश में पुष्पराजगढ़ पदस्थ किए गए थे और वहां पर शासकीय हाई स्कूल जा रहा के प्राचार्य पद पर वेतन आहरण भी कर रहे थे, उनके इस आदेश को संशोधित कर 10 जुलाई 2020 को खंड शिक्षा अधिकारी गोहपारू के रूप में शहडोल जिले में पदस्थ कर दिया गया इससे यह प्रश्न खड़ा ही हो गया कि किसी बहाली आदेश की संशोधन की सीमा 10 माह बाद भी इच्छा अनुसार कभी भी खरीदी जा सकती है । पूर्व आदिम जाति कल्याण मंत्री बिसाहूलाल सिंह के जिले में इस प्रकार का स्थानांतरण मंत्री जी की कर्तव्यनिष्ठा पर प्रश्न खड़ा करता है…?
किंतु उमरिया और अनूपपुर जिले में घट रही इन गैर कानूनी गतिविधियों से हटकर शहडोल जिले में तत्कालीन कमिश्नर आरबी प्रजापति द्वारा प्रमाणित पाये गये बड़े भ्रष्टाचार में निलंबित सुहागपुर के बी ई ओ एसपी सिंह चंदेल और बुढार के बी ओ अशोक शर्मा को क्लीन चिट देना तथा उन पर लगे आरोपों को सिरे से खारिज कर देना शहडोल की प्रभारी मंत्री मीना सिंह के रुतबे को प्रशासन में आंख मूंदकर मान लेने जैसा घटना प्रदर्शित करता है। और अब जबकि किसी लेक्चरर को क्लास वन अधिकारी के सभी अधिकार प्रभार के रूप में परियोजना अधिकारी जैसिंहनगर का प्रभार देना कानूनी अराजकता को प्रमाणित करता है। साथ ही यह भी प्रमाणित करता है कि जितना हो सके जमकर भ्रष्टाचार करो और उसका कुछ टुकड़ा राजनीतिज्ञों पर फेंक दो, आप चपरासी हो…, क्या फर्क पड़ता है आपको कलेक्टर बनाया जा सकता है…?
बात भ्रष्टाचार के उस ताकत की है जो आपके योग्यता में करने की सीमा को तय करता हो, बहरहाल इस प्रकार के नियम विरुद्ध आदेशों से भलाई गलत संदेश जाता हो किंतु नकाब ओढ़ कर अरमान जगाने वाले वर्तमान और पूर्व मंत्री गण के लिए यह चुनौती इसलिए भी है क्योंकि इन आदेशों के पीछे उनकी भूमिका प्रचारित की जाती है, और वह चाह कर भी इसलिए नजरअंदाज नहीं कर सकते क्योंकि दबदबा प्रशासन में इस कदर है कि मुन्ना सिंह कहता है “मैं आत्महत्या कर लूंगा, मीना सिंह के कारण…!”
तो आशा करनी चाहिए कि इन आदेशों में भी संशोधन हो, ताकि “आदेश बिकता है बोलो खरीदोगे…” की भाषा को लगाम लग सके।

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