इति आदिवासी क्षेत्रे..वरिष्ठता का अपमान कर खरीद लिया बीईओ और पी ओ का पद..उच्च निर्देश, तत्काल निरस्त करें….

- ( विशेष संवाददाता)
भोपाल से जारी शैक्षणिक कार्यों के संबंध में जितने भी आदेश हुए हैं वह आदिवासी संभाग शहडोल में आकर अपनी ताकत खत्म कर चुके होते हैं। यही कारण है की शहडोल मे भोपाल के उन्हीं आदेशों पर अमल होता है जो आदेश उनके हित को प्रभावित नहीं करते। उसे इस प्रकार से भी कहा जा सकता है कि आदिवासी क्षेत्र में चाहे नेता हो या फिर अफसर भोपाल के शैक्षणिक आदेशों को भ्रष्टाचारियों की पैसे की ताकत से तोलने का काम करते हैं। और यह भी भ्रष्टाचारी संपूर्ण व्यवस्था को अपनी ऊपरी आमदनी से नियंत्रित करने की क्षमता या योग्यता रखता है। तो उसके लिए सभी प्रकार की छूट तय कर जाते हैं। और उपरी आदेशों को रद्दी की टोकरी में डाल कर के नए आदेश जारी कर दिए जाते हैं।
शहडोल क्षेत्र का आदिवासी विभाग जैसे इन्हीं सब कार्यों के लिए गठित किया गया है। आदिवासी विभाग भ्रष्टाचार की ऑटोमेटिक जेनरेटिंग मशीन के रूप में काम कर रही है इसका ग्लैमर अनूपपुर के आदिवासी विभाग में उस वक्त प्रमाणित हो चुका है जब दो सहायक आयुक्तों के आपसी झगड़े इस गुंडागर्दी तक बढ़ गए थे कि कलेक्टर अनूपपुर को हस्तक्षेप करके आदिवासी विभाग में ताला लगवाना पड़ा था।
शहडोल आदिवासी विभाग मे इस प्रकार की घटनाओं की जरूरत इसलिए नहीं पड़ती क्योंकि यहां भ्रष्टाचारियों से समन्वय इस तरह का बना होता है की कोई भी मंडल संयोजक जैसे अंसारी नाम का कर्मचारी जिले में क्षेत्र संयोजक के पद पर अपना आरक्षण घोषित कर चुका है। क्योंकि आदिवासी विभाग को नियंत्रित करने वाला यह क्षेत्र संयोजक शहडोल जिले के पूरे आदिवासी हॉस्टल्स में पूरा नियंत्रण बनाए हुए हैं। गैर कानूनी तरीके से बैठाए गए हॉस्टल अधीक्षक प्रति माह एक नियंत्रित भ्रष्ट आरक्षित अवैध धन राशि नियमित रूप से उच्चाधिकारियों के नाम पर उगाया जाता है। क्षेत्र संयोजक अंसारी के अलावा छात्रावासों को नियंत्रित करने वाले एक आदिवासी कर्मचारी मरावी का भी वर्षों से एक ही पद पर सफलतापूर्वक बैठे रहना भी भ्रष्टाचार की सफलता की एक गाथा है।
यही कारण है कि आदिवासी संभाग में गुणवत्ता पर, सुचिता पर प्रतियोगिता कम होती दिखाई देती है बल्कि प्रतियोगिता इस बात पर ज्यादा दिखती है कि कौन अपने पैसे के बलबूते, कितने बड़े अधिकारी से कैसा आदेश पारित करा लेता है। इसके लिए मंत्री से लेकर संतरी तक जिसकी जो औकात होती है उसके हिसाब से भ्रष्टाचारी उसे तौल देता है।
इसे इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि देखा गया है कि कांग्रेस की सत्ता पर जब एक वरिष्ठ प्राचार्य को शहडोल के सहायक आयुक्त का प्रभार दिया गया तो मानो भ्रष्टाचारियों पर कोविड-19 का असर पड़ गया हो इतनी तेजी से परिवर्तन हुआ कि 1 माह में रणजीत सिंह धुर्वे को उस पद से हटना पड़ा था। जबकि कथित रूप से वे क्लास वन कर्मचारी वरिष्ठ प्राचार्य पद पर और उनकी पात्रता भी बनती थी। क्योंकि भोपाल से जारी हुए तमाम आदेशों में वरिष्ठता क्रम के आधार पर प्रभार दिए जाने का निर्देश हुआ था ।आदेश तो और भी हुए थे इसी में एक आदेश शैक्षणिक कार्यों के संबंध में भी हुआ था। स्पष्ट निर्देश है कि शैक्षणिक कार्यों में लगे हुए किसी भी व्याख्याता को गैर शैक्षणिक कार्यों का कार्य न कराया जाए
आदेश….
यदि वे कर रहे हैं तो उनकी नियुक्ति तत्काल वापस की जाए किंतु आदिवासी विभाग आदिवासी विकास का भर विभाग नहीं है यहां तमाम बौद्धिक वर्ग के शैक्षणिक कार्य करने वाला अमला भी काम करता है। हालांकि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बौद्धिक जैसा नहीं है किंतु जितना भी है उसे यह बात नहीं पचती कि अगर भ्रष्टाचार अवैध धन का सदुपयोग ही विकास का रास्ता है तो उन लोगों का विकास क्यों नहीं होना चाहिए जिनके पास यह क्षमता है …? क्योंकि आदिवासी विभाग के अंदर अंसारी या मरावी जैसे लोग यही करते चले आ रहे हैं और सफलता पूर्वक “अंगद की पैर” की तरह जमे हुए हैं। हालांकि गैर शैक्षणिक क्षेत्र का मंडल संयोजक अंसारी अगर स्वयं अपनी भ्रष्टाचार की ताकत से विभागीय अधिकारियों को नचाता तो बात कुछ और थी, उसने अपनी पत्नी अंसारी को गैर कानूनी तरीके से तमाम निर्देशों को “अपने जूते के तले दबाकर” प्राइमरी की टीचर को हाई स्कूल में वर्षों से उर्दू पढ़ाने के लिए नियुक्त करवा रखा है….? भ्रष्टाचार का यह “पति-पत्नी” का आइकॉन बन सकता है।
ऐसी ही कई घटनाएं हैं जिनकी बदौलत किसी भी व्याख्याता को भ्रष्टाचार की योग्यता और ताकत पर विश्वास हो जाता है और वह कुपात्र व्याख्याता जैसीहनगर में शासन के निर्देशानुसार पात्र वरिष्ठता क्रम में स्थापित टिहकि की प्राचार्य श्रीमती नीलम सिंह प्रभारी खंड शिक्षा अधिकारी को पद से हटाकर एक व्याख्याता अशोक शर्मा खंड शिक्षा अधिकारी का आदेश ऊपर से पारित करवा कर लिए आता है। और यदि बी ई ओ का पद खरीदा जा सकता है तो परियोजना अधिकारी क्लास वन पद को खरीदने की क्या कीमत होगी….? कुछ इसी अंदाज में कुछ ही महीने के अंतराल में अशोक शर्मा क्लास वन परियोजना अधिकारी का पद भी खरीद कर ले आता है। जिसे प्रशासकीय भाषा में “आदेश” कहते हैं ।अब किसी दूसरे व्याख्याता में यह योग्यता अगर नहीं है तो अशोक शर्मा का क्या दोष है.. वह भ्रष्टाचार के निलंबन से दोषमुक्त भी होता है.., बी ई ओ भी बन जाता है और परियोजना अधिकारी भी।
हो सकता है संभाग आयुक्त कार्यालय को समझने में या मंत्रियों के दबाव में भ्रम का जो धुआं बना हो उसमें ना दिखता रहा हो कि भोपाल के निर्देश क्या कहते हैं ..? किंतु अब जब सब बातें आईने की तरह साफ हो रही हैं तब क्या अपनी गलतियां ठीक करने के लिए जिम्मेदार प्रशासन कोई तात्कालिक कदम उठाएगा अथवा नहीं यह भी देखने की बात होगी.. की मंत्री की अवैध निर्देशों का ताकत बड़ा है या फिर आईएएस अधिकारियों की कानूनी हैसियत और कानूनी निर्देश…?
बहरहाल यह तो आदिवासी विभाग में “बटुआ का भात” है ऐसे कई दाने आदिवासी विभाग में पकते ही रहते हैं और इसी से आदिवासी विभाग का चारागाह मे गैर कानूनी पशुधन पल्लवित होता रहता है। किंतु अगर आदिवासी समाज के पूर्व आदिवासी मंत्री बिसाहूलाल सिंह और वर्तमान आदिवासी मंत्री मीना सिंह आदिवासी विभाग को इस प्रकार से लूटने के लिए छोड़ देते हैं तब संविधान में आदिवासी विकास की व्यवस्था के साथ यह भी एक गद्दारी है। और इस गद्दारी के लिए मंत्री से लेकर संत्रीओ तक को अपने घर के आईने में अपना चेहरा देखना ही चाहिए कि वह धोखा अपने समाज से कर रहे हैं या देश से अथवा अपने संभाग के जिले से। किंतु अगर प्रायश्चित के अवसर हैं तो तत्काल भ्रष्टाचारियों की इन मूर्तियों को भगवान बना कर पूजने की बजाए हटा देना चाहिए।
इन्हो ने कहा:- संभाग आयुक्त ने अपने क्षेत्र अधिकार के तहत यह आदेश दिया है
जे.पी सरवटे* *संभागीय उपायुक्त आदिम जाती कल्याण विभाग संभाग शहडोल(म.प्र.)
स्वास्थ्य खराब होने के कारण जवाब देने में सक्षम नहीं है
*अशोक शर्मा* आदिवासी विकास परियोजना अधिकारी जयसिंह नगर शहडोल(म.प्र.)

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