न्यायपालिका की बनाई कमेटी में अन्याय का अंधेरा…

क्यों निरर्थक साबित होती हैं न्यायपालिका की समिति….?
(विशेष संवाददाता)
शहडोल| किसान यूनियनों के नेता केंद्र सरकार द्वारा लागू कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून 2020, कृषक (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार कानून 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020 को वापस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद की कानूनी गारंटी देने की मांग कर रहे हैं. इस बीच सरकार किसानों की वार्ता लगभग असफल होने के बाद 11 जनवरी को पहले दिन की उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी से प्रतीत होता रहा कि अगर भारत की सर्वोच्च लोकतांत्रिक स्तंभ, उच्चतम न्यायालय एक व्यक्ति होता तो निश्चित तौर पर वह इसका रोना था और किसानों के प्रति जबरदस्त सहानुभूति भी किंतु दूसरे दिन जिस प्रकार से बनाई गई कमेटी में सरकार की मंशा के अनुरूप जो व्यक्ति शामिल किए गए वह सभी किसी न किसी पृष्ठभूमि से विवादित और एकपक्षी विचारों से प्रभावित होकर निर्णय लेने वाले थे।
जितना उच्चतम न्यायालय की निष्पक्षता पर संदेह की कोई कारण नजर नहीं आते किंतु कमेटी के मेंबर की कार्यप्रणाली पर उतने ही संदेह की अवसर है। क्योंकि वह खाना पूर्ति के लिए यह सरकारी मंशा में अंगूठा लगाने के लिए जैसे नियुक्त हुए हैं….. । और यह कोई नई बात नहीं है। भारत को हम शहडोल की नजर से देखें तो माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर में शहडोल के मोहन राम मंदिर ट्रस्ट के मामले में 2011 को विवादित पक्षकार ट्रस्टीओं को विवाद के लंबित रहते तक हटाकर शहडोल एसडीएम सोहागपुर को एक स्वतंत्र कमेटी बनाने का निर्देश दिया था ।जो मोहन मंदिर ट्रस्ट का प्रबंधन करती एक प्रकार से यह कमेटी उच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित समिति है।क्योंकि यह आदिवासी क्षेत्र है इसलिए कानून की धज्जियां यहां स्वाभाविक रूप से उड़ती रहती हैं ।तो तत्कालीन एसडीएम एल एल यादव ने भाजपा सरकार के स्थानीय और बाहरी नेताओं के दबाव में पहले तो उच्चन्यायालय के आदेश की परवाह ही नहीं की। करीब 3 महीने बाद जब न्यायालय ने कड़ा एक्शन लिया तब एक कमेटी आनन-फानन में बना दी गई, जिसमें दो जिला भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष तथा तीन निष्पक्ष तीन सरकारी तंत्र के तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और जिला संग्रहालय के उपसंचालक समिति बना दी। तो एसडीएम पर दबाव इतना था कि एक ट्रस्टी लव कुश पांडे को भी इस स्वतंत्र कमेटी में रख लिया गया, दूसरे दिन जब ज्ञान हुआ कि यह तो कोर्ट की अवमानना है तो उक्त ट्रस्टी लवकुश पांडे को हटाया गया। 2012 मे गठित इस स्वतंत्र कमेटी कि बीते 9 साल में शायद ही 9 बैठक भी की गई होंगी…?. जबकि हर माह बैठक करके स्वतंत्र कमेटी को अपने दायित्वों का निर्वहन करना था। बताते चलें कि मोहनराम मंदिर कोई सरकारी चल अचल संपत्ति से बनी हुई मंदिर नहीं है बल्कि यह स्वर्गीय मोहनराम पांडे की निजी संपत्ति के दान से बनाई गई उनकी अपनी समिति रही। जो सरकारी गलतियों के परिणाम स्वरूप लोक न्यास में कन्वर्ट हो गई । बात विषयआंतर हो जाएगी अतः मूल मुद्दे पर रहना जरूरी है ।तो उच्च न्यायालय के निर्देश पर स्वतंत्र कमेटी बनने की बजाय तत्कालीन स्थानीय नेताओं के दबाव में पक्षपातपूर्ण कमेटी बन गई जो नेताओं के चलते आज तक जैसा कि उच्च न्यायालय की मंशा थी विवादित ट्रस्टीयों से संपूर्ण प्रभार का प्रबंधन स्वतंत्र कमेटी करें, स्वतंत्र कमेटी 9 साल बाद भी प्रभार नहीं ले पाई है।वह तो बस षड्यंत्रकारी विवादित ट्रस्टीओ के इशारे पर उन्हें मंदिर ट्रस्ट की आराजी को खुलेआम लूटपाट करने, खुर्दबुर्द करने का अप्रत्यक्ष संरक्षण देते रहे।

प्रशासनिक अमला यह नहीं समझ पाया कि सरकारी आराजी की तरह इसे लूटने की छूट क्यों देना चाहिए…? जबकि यह निजी दानदाता की धन संपदा से निर्मित एक न्यास है। तो एक तरह से स्वर्गीय मोहनराम पांडे की संपदा पर स्वतंत्र कमेटी के संरक्षण में, या लापरवाही में, या अनदेखीपन में खुली लूट उच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित समिति के कार्यकाल में होता रहा है।पुष्ट सूत्रों की बात माने तो मोहनराम मंदिर ट्रस्ट शहडोल की आराजी खसरा नंबर 138 के 33 डिसमिल जमीन पर निर्मित प्राचीन भवनों को तोड़फोड़ करके षड्यंत्रकारी ट्रस्टी लवकुश पांडे अपने गिरोह के संरक्षण में दो मंजिला मकान बनवा लिया।पूरे निर्मित मकान की संपूर्ण सामग्री को जो प्राचीन थी उसे खुर्दबुर्द कर दिया और इसमें नगरपालिका शहडोल के हैंडपंप से मोटर लगा कर के वकायदे निर्माण कार्य हुआ।
इसके बदले नगर पालिका परिषद और उसमें बैठे हुए भारतीय जनतापार्टी के पदाधिकारी प्रकाश जगवानी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष प्रवीण शर्मा डोली के लिए मोहनराम मंदिर परिसर में करीब दो से तीन करोड़ रुपए का सरकारी धन का सौंदर्यीकरण के नाम पर मनमानी लूट कर बंटवारा हुआ।यह अलग बात है इस बंटवारे के चक्कर में कुछ तो एक तालाब में सुधार हुआ तो दोनों तालाबों की एक प्रकार से हत्या करने का काम हुआ। यह भी स्वतंत्र कमेटी के कार्यकाल में हुआ। क्योंकि वह प्रभार नहीं ली थी। या कहना चाहिए कि स्वतंत्र समिति दबाव में रहकर मोहनराम मंदिर को चुपचाप लूटते देखते रहे। यह भी अलग बात है किस स्वतंत्र कमेटी के मुंह, नाक, कान और नेत्रहीन बने रहने की कीमत पर मोहनराम मंदिर पर गैरकानूनी कब्जा बनाए रखते हुए हाई कोर्ट के निर्देश पर अपदस्थ किए गए ट्रस्टी लवकुश पांडे ने जमकर मंदिर में प्राचीन मूर्तियों के साथ तोड़फोड़ की, प्राचीन कीमती टाइल्स हटाकर हल्के किस्म के निर्माण कार्य किए और मंदिर की आराजी को मनमानी तरीके से खुर्द खुर्द किया।यह सब भी इसलिए होता रहा क्योंकि भारतीय जनता पार्टी की सरकार के स्थानीय नेता मंदिर ट्रस्ट को लूटपाट करने का संरक्षण देते रहे ।क्योंकि वह “हिंदुत्व” के पक्षधर थे और हिंदुत्व किसी भी हिंदू सनातन की मंदिर को अपना मानती है । किंतु अगर यह निजी दानदाता मोहनराम पांडे की आराजी से निर्मित है तो फिर वह इसे कैसे खुर्द बुर्द सकती थी….?अगर शहडोल कमिश्नर द्वारा पाए गए इसी स्वतंत्र कमेटी के कार्यकाल में मंदिर के दो से तीन करोड़ के घोटाले में दो तीन अधिकारियों के सस्पेंशन को आधार माने तो भी यह सब पुष्ट होता रहा है। कुल मिलाकर उच्चन्यायालय के निर्देश पर गठित स्वतंत्र समिति मे नेताओं का दबाव इस कदर रहा है की उच्च न्यायालय की मंशा के अनुरूप स्वतंत्र कमेटी कुछ भी हासिल नहीं कर पाई। नाम न्यायपालिका का काम किसी गिरोह का बल्कि वह बुरी तरह से मंदिर संस्था को भ्रष्टाचार का अड्डा होते देखती रहेगी।

क्योंकि तत्कालीन शासकीय प्रतिनिधियों ने भाजपा के दबाव में जानबूझकर मंदिर ट्रस्ट का प्रभार बीते 9 साल में भी नहीं लिया और उस बनाई गई स्वतंत्र समिति ने मंदिर ट्रस्ट को इतना बर्बाद होने दिया जितना बीते 100 साल में कभी बर्बाद नहीं हुआ। तो इस तरह लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ उच्चन्यायालय, न्यायपालिका के संरक्षण में घोर अन्याय होता रहा। क्यों कि बनाई गई समिति मैं सत्तापक्ष के लोगों ने पूरा काकस बनाए रखा, इस अनुभव से देखा जाए तो आंदोलन कर रहे किसानों कि यह शंका का जायज है कि यदि न्यायपालिका के सामने आंदोलित किसान पक्षकार होते हैं तो उन्हे कुछ हासिल नहीं होता। शहडोल मोहन राम मंदिर ट्रस्ट के मामले में जो अनुभव सिद्ध हुआ है कम से कम उच्चतम न्यायालय में गठित समिति के सभी सदस्य सत्ता के दबाव में रहकर उनके इशारे पर और स्वयं उनकी खुद भी तीन कृषि बिल के पक्ष में कॉर्पोरेट सिस्टम की चाटुकारिता के अलावा शायद ही कोई निष्कर्ष दे पाएगे और यदि धोखे से यह समिति सदस्य ठीक उसी प्रकार निकले जैसे कि शहडोल की स्वतंत्र समिति के सदस्य ने कार्य किया तब तो, यह किसान आंदोलन के साथ व भारतीय करोड़ों किसानों के साथ एक बड़ी धोखाधड़ी होगी। जो कानूनी दांवपेच में उसी तरह लूटपाट का हिस्सा बनकर रह जाएगी जिस प्रकार से उच्च न्यायालय के निर्देश में गठित स्वतंत्र समिति के कार्यकाल में मोहनराम मंदिर ट्रस्ट खुलेआम लुट रहा है…। और बार-बार आगाह करने के बावजूद कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है ।यहां तक की कमिश्नर शहडोल भी इस लूटपाट को प्रमाणित करते हुए कार्यवाही करते हैं तो भी उच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित समिति आंख नाक और कान बंद करके अपने मालिक के लिए पालतू बनकर सिर्फ धूम हिलाती नजर आ रही है। और भ्रष्टाचारी तबका अपनी मंशा के अनुरूप मंदिर ट्रस्ट को लूट रहा है। तो फिर यदि उच्चतम न्यायालय कि समिति के सदस्य इस अनुभव से काम करेंगे तो स्वतंत्र भारत में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे बड़ा किसान आंदोलन जो शायद दुनिया का इकलौता किसान आंदोलन है बुरी तरह से अपने लक्ष्य से असफल हो जाएगा। और शायद उच्चतम न्यायालय की यह मंशा कतई नहीं है।तो फिर किसानों के हित में और देश के हित में समिति का पुनर्गठन सर्वसम्मति से इसलिए भी होना चाहिए ताकि उच्चतम न्यायालय की पवित्रता पर कोई उंगली ना उठा सके। आखिर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था उच्चतम न्यायालय की गरिमा और देश की आजादी के लिए यह बहुत जरूरी भी है,
नहीं तो, यह काला इतिहास बन जाएगा राम राज्य में लूट है लूट सके……… तो लूट..।


Subscribe to my channel
Comments are closed.