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MP breaking – 75 पंचायतों के कराधान महाघोटाले की फाइल दबाकर बैठे रीवा के अफसरान, आरोपियों को मिल रहा संरक्षण // जांच के नाम चल रही हीलाहवाली, मात्र पत्राचार और कागजी घोड़ागिरी तक सीमित रह गयी कराधान महाघोटाले की जांच// सीईओ-कलेक्टर, एपीओ राजेश शुक्ला और अतिरिक्त सीईओ एबी खरे की टेबल के इर्द-गिर्द घूम रही कराधान महाघोटाले की फाइल// EOW और लोकायुक्त को तथ्यात्मक प्रतिवेदन भेजना भूला पंचायत विभाग//

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मप्र की 1148 पंचायतों में हुए कराधान घोटाले की परतें खुलने के बाद भी अधिकारी फाइल को दबाने का कार्य कर रहे हैं. नेताओं, अधिकारियों और पंचायत माफियाओं का संगठन शासकीय नियमों पर भारी है. हालात यह हैं की 2 वर्ष पहले हुआ घोटाला आज तक दबा पड़ा है और अधिकारी फाइल को इस कार्यालय से उस कार्यालय घुमा रहे हैं.

   इन 1148 पंचायतों में लगभग 300 करोड़ रूपये का घोटाला सामने आया था जिसके बाद शिकायतें हुईं और जांच की मांग की गयी. रीवा जिले के परिपेक्ष्य में 75 ग्राम पंचायतों में करारोपण की पात्रता में घोटाला हुआ फिर इसके बाद फर्जी दस्तावेजीकरण करके प्राप्त की गयी करोड़ों की राशि का भी गलत तरीके से उपयोग किया गया. यहाँ तक की गंगेव की 38 पचायतों के मामले में तो एक शिवशक्ति ट्रेडर्स के खाते में ही पूरी 12 करोड़ की राशि अंतरित कर दी गयी और फिर क्या हुआ सब जानते हैं. शिवशक्ति ट्रेडर्स और बाबू राजेश सोनी की जांच हुई और प्रकरण दर्ज कर जेल तक हुई. जब शिकायतें हुईं तो जिसकी जांच हुई और जांच में पता चला की लोकल फण्ड ऑडिट रिपोर्ट में करारोपण ही इन 75 पंचायतों द्वारा नहीं किया गया और फर्जी तरीके से मामले को रफा-दफा करने का प्रयास हुआ. बिना 10 प्रतिशत प्रतिवर्ष वृद्धि के ही राशि प्राप्त कर ली गयी जबकि नियम यह था की लगातार 3 वर्षों तक 10 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से पंचायती करारोपण में वृद्धि होनी थी. शिकायतें लोकायुक्त, ईओडब्लू, पंचायत एवं ग्रामीण विकाश विभाग से लेकर सभी उच्चस्तर के कार्यालयों में हुई लेकिन हुआ कुछ नहीं मात्र सरकारी कागज़ी घोड़ा ही दौड़ता रहा.

 

जाँच टीम का कहना की सरपंच-सचिवों ने उपलब्ध नहीं कराये जांच दस्तावेज

 

  चोरी और सीनाजोरी किसे कहते हैं यह सरपंच-सचिवों की कार्यप्रणाली से पता चलता है. जब कराधान घोटाले की शिकायतें लोकायुक्त और ईओडब्लू में की गयी तो जांच के लिए पंचायत विभाग को भेजा गया. ईओडब्लू द्वारा तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी गयी तो पंचायत विभाग ने सीईओ जिला पंचायत और जिला कलेक्टर के माध्यम से जांच टीम गठित कर जांच कराने के लिए पत्र जारी किये. जब जांच टीम दस्तावेज के लिए सभी आरोपी पचायतों के सरपंच-सचिवों को लिखा तो सरपंच-सचिवों ने जाँच के लिए दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं कराये. कई बार पत्राचार हुआ लेकिन कोई दस्तावेज नहीं दिए गए. इस प्रकार अभी भी सभी जांचें लंबित पड़ी हुई हैं.

 

सरपंच-सचिव दस्तावेज दें कहाँ से जब कुछ मौके पर बना ही नहीं

 

  सवाल यह भी है की दस्तावेज तो उन कार्यों का दिया जाता है जो कार्य मौके पर हुए होते हैं. यहाँ स्थितियां यह हैं की करारोपण की पात्रत्रा बताकर प्राप्त की गयी कराधान और 14 वें वित्त आयोग की परफॉरमेंस ग्रांट की राशि से फर्जी कार्य कराये गए. कई कार्यों में तो पुराने टीएस को ही नया बताकर कार्य होना बताया गया और कुछ कार्य जो कराये गए वह पूरी तरह से गुणवताविहीन हैं. सहायक यंत्री आरपी मिश्रा और संतोष तिवारी जैसे महाभ्रष्टाचार के आरोपी इंजिनियर के द्वारा मूल्यांकन और सत्यापन किया गया और उसी कार्य को आधार मान लिया गया. दस्तावेज उपलब्ध कराये जाने के लिए जिला सीईओ श्री स्वप्निल वानखेड़े के निर्देशन में कई बार अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रीवा एबी खरे द्वारा भी सम्बंधित अधिकारियों को लिखा गया है लेकिन अब तक कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं हुए हैं जिससे कोई जांच आगे नहीं बढ़ पायी है.

 

गंगेव का मास्टरमाइंड बाबू और 420 का फरार आरोपी राजेश सोनी लगा रहता है मामलों को दबाने में 

  उधर गंगेव जनपद की 38 पंचायतों में जो घोटाला हुआ था उसका मास्टरमाइंड और फरार आरोपी राजेश सोनी जिला पंचायत कार्यालय में कभी संजय सिंह वाटर शेड अधिकारी के कक्ष में तो कभी सहायक परियोजना अधिकारी राजेश शुक्ला के कक्ष में चक्कर लगता रहता है. यह दोनों ही अधिकारी संजय सिंह और राजेश शुक्ला महाभ्रष्टाचारी बर्खास्त बाबू राजेश सोनी को सह दे रहे हैं. इन दोनों के कक्षों सेवीडियो रिकॉर्डिंग भी की जा चुकी है जिसमें बाबू राजेश सोनी को इनके पास बैठकर चाय पानी करते हुए और गपशप हांकते हुए पाया गया है. राजेश सोनी के ऊपर कई गंभीर धाराओं में मामले पंजीबद्ध हैं जिसमे आईटी एक्ट एवं इंडियन पेनल कोड की धारा 409, और 420 भी सम्मिलित हैं. राजेश सोनी ने हाईकोर्ट जबलपुर में अग्रिम जमानत के लिए याचिका लगाई हुई थी लेकिन उसकी जमानत याचिका हाई कोर्ट द्वारा ख़ारिज कर दी गयी है.

 

विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम के संरक्षण में पल रहे ज्यादातर कराधान घोटाले के आरोपी

 

   यह कोई अकस्मात नहीं कहा जा सकता की किसी एक कार्यक्रम में कराधान घोटाले के सरपंच-सचिव विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम के कार्यक्रम में पाए जाएँ. बल्कि देखा जाय तो ज्यादातर कार्यक्रमों में यह आरोपी सरपंच-सचिवों की गैंग इनके कार्यक्रम में उपस्थित रहती है. अभी हाल ही में लालगांव और हिनौती-सेदहा में भी कुछ कार्यक्रम हुए थे जिसमे कराधान घोटालेबाजों में ज्यादातर सरपंच-सचिव इनके कार्यक्रम में पाए गए थे.

 

गंगेव में खुलेआम गिरीश गौतम और पांचूलाल प्रजापति ने कराधान घोटालेबाजों के पक्ष में किया था बैटिंग

  बता दें की विधानसभा अध्यक्ष बनने के पूर्व विधायक गिरीश गौतम गंगेव में आरोपी सरपंचों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में मनगवां विधायक पांचूलाल प्रजापति के साथ उपस्थित हुए थे जिसमें उन्होंने खुले तौर पैर कराधान घोटाले के घोटालेबाजों के पक्ष में बैटिंग की थी और कहा था की हम कराधान घोटालेबाजों को कुछ नहीं होने देंगे. इसकी विडियो रिकॉर्डिंग भी गयी थी जो पूर्व जनपद उपाध्यक्ष संजय पाण्डेय के पास उपलब्ध थी. इसी बात से आकलन किया जा सकता है जिन जनप्रतिनिधियों को जनता चुनकर देश और समाज की सेवा और रक्षा के लिए भेजती है वही जनप्रतिनिधि जनता को ठेंगा दिखाकर भ्रष्टाचारियों का दामन थाम लेते हैं. गिरीश गौतम और पांचूलाल प्रजापति जैसे विधायकों का नाम कुछ ऐसे ही लोगों में शुमार हैं. हालाँकि यह भी उल्लेखनीय है की विधायक और सांसद निधियों की जो जानकारी आरटीआई से प्राप्त हुई थी उसमें यह देखा गया की जो यात्री प्रतीक्षालय इन निधियों से बनाए गए हैं उनकी गुणवता निम्न दर्जे की है. जो कार्य पौने तीन लाख रूपये में होना बताया गया है वह बमुश्किल 75 हज़ार रूपये की श्रेणी में भी नहीं आता है. कई ग्राम पंचायतों में रपटा, पुल और ग्रेवल सड़क निर्माण, भवन निर्माण, नलकूप उत्खनन के लिए भी राशि इन निधियों से वितरित की गयी हैं लेकिन मौके पर देखा जाय तो जहाँ नलकूप रसूखदारों के घर आँगन और खेतों में हुए हैं वहीँ ग्रेवल सड़क के नाम पर तो पूरी राशि हजम कर दी गयी हैं और मुट्ठी भर भी मोरम नहीं पड़ा है. यदि देखा जाय तो विधायक-सांसद निधियों की राशियों में जमकर कमीशनखोरी और बंदरवाट हुआ है. अब सवाल यह है जनता को भी पता होना चाहिए की ऐसे विधायक-सांसद जो स्वयं भी कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार में संलिप्त हैं वह क्या जनता का भला करेंगे. ऐसे विधायक तो कराधान के घोटालेबाजों के साथ मिलकर देश और समाज का और भी अधिक बंटाढार ही करेंगे.

 

  कराधान की फाइल जिला सीईओ, एपीओ राजेश शुक्ला, संजय सिंह और एसीईओ एबी खरे के इर्दगिर्द

   पिछले 2 साल से कराधान घोटाले की जांच चल रही है लेकिन होते हुए कुछ दिख नहीं रहा है. उसका सबसे बड़ा कारण यह है की जो जांच कर रहे हैं वही चाहे दबाब बस हो अथवा अपनी स्वेक्षा से इन भ्रष्टाचारियों को बचाने का कार्य कर रहे हैं. यह मामला जिला रीवा कलेक्टर डॉक्टर इलैयाराजा टी के संज्ञान में भी है क्योंकि गंगेव जनपद की 38 पंचायतों से सम्बंधित फाइल्स उनके ही कोर्ट में चल रही हैं. शेष 27 पंचायतों के मामले कई बार सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा जिला कलेक्टर और जिला सीईओ को कई बार दिया गया है जिस पर कार्यवाही की मांग की गयी है. हनुमना जनपद से सम्बंधित 25 पंचायतों की कार्यवाही के लिए जिला सीईओ स्वप्निल वानखेड़े ने वाटर शेड के अधिकारी संजय सिंह, हनुमना जनपद के सीईओ मूगाराम मेहरा और सहायक यंत्री आर पी मिश्रा हनुमना की टीम गठित कर जांच कर जांच रिपोर्ट सौपने के लिए लेख किया था लेकिन कोरोना लॉक डाउन के पहले के इस मामले में अब तक न तो जांच पूरी हुई और न ही आरोपियों ने दस्तावेज ही उपलब्ध कराये. इस शिकायत में करारोपण की पात्रता, कराधान योजना 14 वें वित्त आयोग की प्राप्त राशि के दुरुपयोग और गुणवत्ता विहीन कार्यों की जांच की मांग की गयी थी.

 

कराधान घोटाले की जांच में चल रही हीलाहवाली से उच्चाधिकारियों की निष्ठा भी संदेह के दायरे में

   हनुमना जनपद की 25 पंचायतों सहित गंगेव जनपद की 38 पंचायतों और रायपुर करचुलियान जनपद और सिरमौर रीवा जनपद की कुछ पंचायतों में कराधान योजना की जांच की कार्यवाही जिला पंचायत सीईओ स्वप्निल वानखेड़े, एडिशनल सीईओ एबी खरे, और एपीओ राजेश शुक्ला, वाटर शेड अधिकारी संजय सिंह के डेस्क के आजू-बाजू घूम रही है. इससे क्या साबित होता है? इससे दो बातें साबित होती हैं- पहली यह की इनमें से सभी अधिकारियों की कराधान घोटाले में संलिप्तता है और यह मामले में कोई रूचि नहीं लेना चाहते. और दूसरा यह की राजनेताओं और पंचायती माफिया के दबाब के आगे आईएएस अमला ठंडा पड़ गया है. जो आईएएस अधिकारी नौकरी ज्वाईन करते समय देश सेवा और जनता के प्रति जबाबदेही और ईमानदारी की कसम खाकर शपथ लेकर नौकरी ज्वाईन किये थे आज वह भ्रष्ट नेताओं और माफिया के सामने नतमस्तक हो चुके हैं. धिक्कार है ऐसे अधिकारियों पर जो खा तो जनता के टैक्स का रहे हैं और निष्ठा भ्रष्टों के प्रति दिखा रहे हैं. इस पूरे मामले में एक आस के तौर पर जिला कलेक्टर डॉक्टर इलैयाराजा टी हैं लेकिन कई बार मामले को संज्ञान में लाने के बाबजूद भी कलेक्टर कराधान जैसे महाघोटाले को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. आखिर 1148 पंचायतों में से रीवा की 75 पंचायतों में हुआ यह कराधान का व्यापक महाघोटाला क्या गंभीर मामला नहीं है? आखिर छोटी-छोटी मछलियाँ पकड़ कर जिला कलेक्टर और जिला सीईओ क्या साबित करना चाह रहे हैं जबकि बड़े मगरमच्छ पानी के ऊपर तैर रहे हैं और खुलेआम चैलेंज कर रहे हैं. बहादुरी तो तब कही जायेगी जब इन बड़े मगरमच्छों पर कार्यवाही की जाए. क्या भरष्ट नेतागिरी के आगे आईएएस अधिकारी नतमस्तक हो चुके हैं? क्या इन अधिकारियों के जमीर में यह बात नहीं है की इतने बड़े महाघोटाले जिसमें लोकल फण्ड ऑडिट, कमिश्नर की जांच, सूचना आयोग की बड़ी कार्यवाही में दर्जनों अधिकारियों के ऊपर जुर्माना के बावजूद भी आज कराधान महाघोटाले की फाइल को क्यों दबाने का प्रयास किया जा रहा है? क्या सरपंच-सचिव इतने मजबूत हो गए की वह जाँच टीमों को दस्तावेज ही उपलब्ध न करवाएं और जिला सीईओ और जिला कलेक्टर चुपचाप बैठकर देखते रहें और मात्र यह कहें की आगे कुछ नहीं हो पा रहा है? यह सब शर्मनाक है.

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