MP breaking -रेस्क्यू आपरेशन: रेहवा घाटी में रेस्क्यू ऑपरेशन का पहला दिन, नही निकाले जा सके एक भी गोवंश// मात्र औपचारिकता तक ही सीमित रहा रेस्क्यू ऑपरेशन, अधिकारी कोसते रहे अपनी किस्मत// कठिन रास्ता होने के चलते तलाशा जा रहा अन्य विकल्प// कलेक्टर और SDM के आदेश के बाद होना था रेस्क्यू ऑपरेशन, पहुचाया जाना था गोशाला//
रीवा जिले के थाना गढ़ अंतर्गत लालगांव चौकी की रेहवा घाटी में 27-28 सितम्बर 2021 के दरम्यान कारित की गयी भीषण पशु क्रूरता जिसमें लगभग 150 गोवंशों को घाटी के नीचे धकेल दिया गया था उन्हें बचाने और सुरक्षित बाहर निकालकर गोशाला में पहुंचाने की कवायद चलती रही है.
07 अक्टूबर का रेस्क्यू ऑपरेशन मात्र औपचारिकताओं तक रहा सीमित
इस बीच दिनांक 07 अक्टूबर 2021 का रेस्क्यू ऑपरेशन मात्र औपचारिकताओं तक ही सीमित रहा. कलेक्टर रीवा डॉक्टर इलैयाराजा टी के निर्देशानुसार दिनांक 05 अक्टूबर 2021 को अनुविभागीय और दंडाधिकारी तहसील सिरमौर नीलमणि अग्निहोत्री द्वारा पत्र क्रमांक 1212/स्टेनो/2021 के आधार पर गठित जांच के कुछ ही जाँच अधिकारी मौके पर उपस्थित हुए जबकि प्रमुख लोग नदारद रहकर अपने कनिष्ठ को भेज दिया. उनके स्थान पर उनके कनिष्ठ अधिकारी जैसे पीसीओ, पटवारी, चौकी प्रभारी, और आरआई-पटवारी उपस्थित हुए. हालाँकि मौके पर बहुत कम जांच अधिकारी ही घटना स्थल 1000 फीट गहरी घाटी के नीचे उतर पाए. ज्यादातर जांचकर्ता वहीँ घाट के ऊपर ही आराम फरमाते रहे और कभी गोवंशों को तो कभी वरिष्ठ अधिकारियों को तो कभी अपनी किस्मत को कोसते रहे की कहाँ फंसा दिया उन्हें.
यह यह जाँच अधिकारी रहे उपस्थित
रेहवा घाटी में उपस्थित जाँच अधिकारियों में सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी के साथ ब्लाक कोऑर्डिनेटर गंगेव अजय शुक्ला, पीसीओ केके मिश्रा, चौकी प्रभारी लालगांव यूबी सिंह, आरआई परमानन्द तिवारी, पटवारी रामगरीब कोल, सरपंच रामलखन यादव, सचिव राम उजागर पाण्डेय, वनपाल यादव बाबूलाल यादव, वन रक्षक संजय वर्मा, वन सुरक्षा कर्मी बाबूलाल यादव और संतोष तिवारी, पशु चिकित्सक रत्नेश सिंह एवं ग्रामवासी लेबर – राकेश बहेलिया, भैयालाल बहेलिया, राजू कोल, बुद्धि कोल, संतोष कोल, शेषमणि कोल, लक्ष्मण साकेत सहित अन्य ग्रामवासी उपस्थित रहे.
क्यों नहीं हो पाया घायल पशुओं का इलाज?
रेहवा घाटी में घायल पड़े गोवंशों का इलाज ठीक तरीके से नहीं हो पाया. जांच टीम में नियुक्त किये गए पशु चिकित्सक रत्नेश सिंह द्वारा दर्जनों बहाने बताये गए. कभी उनके पास मेडिकल फैसिलिटी का अभाव बताया गया तो कभी उनका स्वास्थ्य खराब होना बताया गया. रत्नेश सिंह ने कहा की वह घाटी के नीचे नहीं उतर पायेंगे क्योंकि उनका पैर फिसल रहा है. हालाँकि अन्य कई लोग पाँव में जूते चप्पल पहनकर भी उतर पा रहे थे. बाद में जब मामले को एसडीएम सिरमौर नीलमणि अग्निहोत्री को बताया गया तो उनके आदेश के बाद एक अन्य सहायक चिकित्सक गर्ग को बुलाया गया जहां उन्होंने 50 फीट नीचे जाकर मात्र एक घायल का इलाज कर 2 इंजेक्शन और घाव में मलहम किया. बताया गया की घाव में कीड़े पड़ गये थे. इस प्रकार पशु चिकित्सा से जुड़े डॉक्टर का रवैया मवेशियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण न रहकर बोझ जैसे लगा.
घाटी के नीचे घायल गोवंशों के लिए क्या क्या की गयी व्यवस्था?
घाटी के नीचे 2 बोरी भूषा ले जाया गया जहां घाटी में फंसे कुछ गोवंशों को खिलाया गया. हालाँकि भूंखे प्यासे दर्जनों गोवंशों के लिए यह भूषा अपर्याप्त था. मवेशियों को झरने के महीन स्रोतों से बहुत कम पानी मिल रहा है लेकिन वह अभी जीवित हैं. यह मवेशी महीन झरने के स्रोत के पास ही आसपास चक्कर लगाते रहते हैं. क्योंकि रास्ता काफी कठिन है इसलिए उनका ऊपर चढ़ पाना मुश्किल पड़ जाता है. आने वाले समय में और भी अधिक पोषण आहार और दवा लेकर मवेशियों का रेस्क्यू करने जाना पडेगा.
मात्र दो गायें ही चढ़ पायीं कुछ दूर तक
घाट के ऊपर से करीब 500 फीट की प्रारंभिक गहराई में फंसे हुए कुल 4 गोवंशों को वहां से सुरक्षित बाहर निकालने के प्रयास किये गए जिसमें उनके लिए उपस्थित मजदूरों द्वारा रास्ता बनाने का प्रयास हुआ. कुल मिलाकर दो स्थानों पर पत्थर डालकर रास्ता बनाने का प्रयास हुआ. हालाँकि यह रास्ता बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता लेकिन वहां पर उपस्थित अनुभवी ग्रामीणों द्वारा आकलन किया गया की इससे मवेशी ऊपर चढ़ सकते हैं. इसके बाद रस्से की सहायता से बांधकर एक गाय और एक छोटी बछिया को बहार निकालने का प्रयास हुआ लेकिन घाट के ऊपर नहीं लाया जा सका और वहीं घाटी में ही छोड़ दिया गया. एक अन्य गाय को निकालने के प्रयास में उसका पैर फिसल गया जिससे वह घाट के नीचे गिरते गिरते बची.
वन विभाग की नाकामी का खामियाजा भुगत रहे बेजुबान गोवंश
दिनांक 07 अक्टूबर 2021 को रेहवा घाटी में उस्पथित रहे रेस्क्यू टीम के सदस्यों में ज्यादातर सरकारी मुलाजिम मात्र आराम करने के लिए गए थे जो घाट के ऊपर बैठकर डीलिंग ही देते रहे. वनकर्मी काफी देर से पहुंचे और मात्र नजदीकी ग्राम का बाबूलाल यादव ही सुबह पहुँच पाया था. काकर चौकी के वनपाल संजय यादव काफी देरी से पहुंचे और ऊपर बैठकर आराम फरमाते रहे. यह बात लगभग उपस्थित सभी लोगों ने मानी की यदि वन विभाग के कर्मचारी अधिकारी अपनी ड्यूटी सही तरीके से करते तो यह घटना वारदात कारित नहीं होती और इसे बंद किया जा सकता था. लेकिन चूँकि वन चौकीदार डिप्टी रेंजर, रेंजर सिरमौर द्वारा अपने दायित्यों का निर्वहन सही ढंग से नहीं किया गया और पहाड़ों की इन घाटियों में पेट्रोलिंग नहीं किये इसलिए आततायियों ने जाकर घाटी के नीचे मवेशियों को धकेल दिया और वन विभाग को 10 दिन बाद भी खबर नहीं लगी.
अगले दिनों दूसरे रास्तों से रेस्क्यू किये जाने का प्लान
मामले की सूचना एसडीएम सिरमौर नीलमणि अग्निहोत्री को दे दी गयी जिसमें उन्हें अवगत करा दिया गया है की अभी भी लगभग सैकड़ा भर गोवंश जंगल में फंसे हुए हैं जिनका 07 अक्टूबर को रेस्क्यू नहीं कराया जा सका है. 07 अक्टूबर को रेस्क्यू ऑपरेशन नाकामयाब होने के पीछे का कारण सरकारी अफसरान का ढुलमुल और आलसी रवैया रहा है. यद्यपि पहला वाला रास्ता भी काफी कठिन होने से मवेशियों को घाटी के ऊपर निकालना काफी कठिन रहा.
अब अगले दिनों घाट के नीच-नीचे ही एक अन्य रास्ते से मवेशियों को निकाले जाने का प्लान किया गया है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की उस नए रास्ते के विषय में भी लोगों को ज्यादा बेहतर जानकारी नहीं है की क्या वाकई वह इतना आसन होगा पर चूँकि कुछ अदिवाशियों से चर्चा के दौरान यह बात सामने आई है की शायद नीचे का रास्ता बेहतर और आसान हो सकता है.


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