भारत में सबसे तेजी से उभरता हुआ वेब न्यूज़ चैनल

MP-Breaking – क्लिनिकल लीगल एजुकेशन विषय पर आयोजित हुआ 69 वां राष्ट्रीय आरटीआई वेबिनार // मुंबई विश्वविद्यालय की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. रश्मि ओझा और प्रो. इन्द्रायण ने किया संबोधित // सूचना आयुक्त राहुल सिंह की अध्यक्षता में हुआ आयोजन और पूर्व केन्द्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गाँधी, प्रवीण पटेल, आश्विन कारिया ने भी रखे विचार//

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दिनांक 17 अक्टूबर 2021 रीवा मप्र.
सूचना के अधिकार कानून की जानकारी और लीगल नॉलेज को जन जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से कोविड लॉकडाउन के दौरान प्रारंभ किया गया राष्ट्रीय सूचना का अधिकार वेबीनार के कार्यक्रम का दिनांक 17 अक्टूबर 2021 को 69 वां एपिसोड का आयोजन किया गया। परंपरागत रूप से रविवार को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक वेबीनार का आयोजन चला। इस बीच कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने की जबकि कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी, मुंबई विश्वविद्यालय की कानून शिक्षा विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष श्रीमती रश्मि ओझा, सौराष्ट्र यूनिवर्सिटी के कानून शिक्षा विभाग के हेड ऑफ डिपार्टमेंट एनके इंद्रायण, फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के ट्रस्टी और वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण भाई पटेल, पालनपुर लॉ कॉलेज के पूर्व प्राचार्य अश्विन भाई कारिया, फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के ट्रस्टी वेंकटरमण एवं अध्यक्ष भगवान जी रैयानी, माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक भास्कर प्रभु, हाई कोर्ट जबलपुर के अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, पूर्व मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप आदि सम्मिलित हुए। कार्यक्रम का संचालन और संयोजन का कार्य एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी और उनके साथियों के द्वारा किया गया।

क्लिनिकल लीगल एजुकेशन अत्यंत आवश्यक हर व्यक्ति को मिले कानूनी सहायता

– एक्सपर्ट पैनल कार्यक्रम की शुरुआत उपस्थित विशेषज्ञों और एक्सपर्ट के इंट्रोडक्शन के साथ प्रारंभ हुआ। जिसमें सबसे पहले वेबीनार को संबोधित करते हुए मुंबई विश्वविद्यालय के कानून शिक्षा विभाग की विभागाध्यक्ष एवं चेंबूर लॉ कॉलेज की वर्तमान डायरेक्टर श्रीमती डॉ. रश्मि ओझा ने कहा कि आज वकीलों को समाज में संवेदनशील होकर काम करने की आवश्यकता है और सभी व्यक्तियों को आसानी से न्याय उपलब्ध हो इसके लिए सभी स्कूल कॉलेज और विश्वविद्यालय में कानून से संबंधित शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कोर्स करिकुलम में क्लीनिकल लीगल एजुकेशन के महत्व को रेखांकित करते हुए कंपलसरी क्रेडिट सिस्टम होना चाहिए और विद्यार्थियों को मूट कोर्ट, प्रैक्टिकल ज्ञान, और समाज में जाकर वर्कशॉप आयोजित करना चाहिए और लोगों की क्या लीगल समस्या है और किस प्रकार कानूनी ज्ञान का प्रचार प्रसार घर-घर किया जाकर उनके मानवाधिकार का संरक्षण किया जाए इस विषय पर कार्य करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि प्रत्येक कॉलेज में लीगल एड क्लीनिक की व्यवस्था रहती है लेकिन बार काउंसिल की समितियां बहुत कम कॉलेज में इस बात का सर्वेक्षण और दौरा कर जानकारी एकत्रित करती है। इस विषय में आज वकील ध्यान नहीं दे रहे और सभी का उद्देश्य किसी कंपनी में लीगल एडवाइजर बनना या कारपोरेट के लिए काम करना होता है। पैसे की दौड़ में लोग समाज के प्रति अपने दायित्व को भूल जाते हैं जो उचित नहीं कहा जाएगा। आजकल कॉलेज और स्कूल से निकलने वाले ला के स्टूडेंट्स को मानवाधिकार, गरीबों, पिछड़ों, महिलाओं और बच्चों के अधिकार के लिए काम करने की ललक लानी पड़ेगी। हालांकि इस विषय में सुप्रीम कोर्ट ने भी टिप्पणी की हुई है और क्लीनिकल लीगल एजुकेशन के आधार पर कई महत्वपूर्ण निर्णय का भी हवाला दिया गया। उन्होंने कहा कि उपभोक्ता कानून और मानवाधिकार कानून को आए हुए वर्षों हो गए लेकिन आज न तो उपभोक्ताओं का संरक्षण हो रहा है और न ही मानवाधिकार का ही संरक्षण दिख रहा है और जगह-जगह इनका उल्लंघन देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि चाहे कितने भी जजों की नियुक्ति कर दी जाए लेकिन देश की अदालतों में सवा 4 करोड़ से अधिक पेंडिंग पड़े केस को यदि देखा जाए तो देश की न्यायिक व्यवस्था पटरी पर आने में कई वर्षा की दशकों लग सकते हैं। उन्होंने बेल और नाट जेल टर्म पर ध्यानाकर्षण करते हुए कहा कि ऐसे अपराध जो जमानती है और बड़े अपराधों की श्रेणी में नहीं आते उनमें जमानत दी जानी चाहिए जिससे जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की संख्या कम हो पाए और उनके मानवाधिकार का भी संरक्षण हो।

कैसे पोस्ट कार्ड में लिखे पत्र पर चीफ जस्टिस भगवती ने संज्ञान लेकर 30 साल के कैदी को दिलाया न्याय

कार्यक्रम में अगले वक्ता के रूप में प्रोफेसर अश्विन कारिया ने कहा की यदि भारतीय समाज में सोशल जस्टिस को प्रमोट करना है तो लीगल एड क्लीनिक को बढ़ावा देना पड़ेगा. इसके लिए क्लिनिकल लीगल एजुकेशन का महत्व बहुत बढ़ जाता है। इसी बात को रेखांकित करते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की कमेटी के सुझाव को भी बताया जिसमे लीगल ऐड क्लिनिक पर बल दिया गया है। उन्होंने कहा की 2 वर्ष पहले गुजरात में 33 कॉलेज थे लेकिन अब 19 कॉलेज ही बचे हैं। उन्होंने एडवोकेट एक्ट की धारा 6 और 7 का भी उल्लेख किया और कहा कि लॉ कॉलेज में बार काउंसिल द्वारा निरीक्षण किए जाने का प्रावधान होता है लेकिन उनके कार्यकाल में आश्चर्यचकित करने वाले मामले सामने आए जिसमें मात्र एक बार ही बार काउंसिल के सदस्यों ने लॉ कॉलेज का निरीक्षण किया। इस प्रकार उन्होंने कहा कि बार काउंसिल स्वयं लीगल एड के बारे में काफी लापरवाह है। उन्होंने कहा की यह देश का दुर्भाग्य है की आज ला स्टूडेंट मात्र कारपोरेट, कंपनियों और पैसे वाली जगह में लीगल एडवाइजर बनना चाहते हैं और पैसा कमाना चाहते हैं जबकि शिक्षा में ऐसे संस्कार दिए जाने चाहिए जिससे मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के प्रति ऐसे विद्यार्थियों मैं झुकाव उत्पन्न हो और वह देश समाज के लिए काम करें और इसके लिए स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी एवं डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विस अथॉरिटी के साथ लीगल एड क्लीनिक को चलाना चाहिए। उन्होंने अहमदाबाद में एक व्यक्ति और हिमाचल प्रदेश के मिड डे मील का उदाहरण देकर बताया कि कैसे मानवाधिकार आयोग ने मुद्दा उठाया गया था और उन्हें फाइनेंसियल हेल्प मिली और साथ में कार्यवाही भी हुई। कार्यक्रम में आगे सौराष्ट्र यूनिवर्सिटी के लॉ विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर इंद्रायण ने भी क्लीनिकल लीगल एजुकेशन पर जोर दिया और और बताया कि पैरा लीगल वालंटियर द्वारा गरीबों को न्याय दिलाए जाने का प्रावधान रहता है लेकिन न तो सरकार और न ही कोर्ट इस विषय पर गंभीर है। उन्होंने आरटीआई कानून के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए बताया की चाहे वह शिक्षा का अधिकार हो, गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोग की खाद्यान्न की समस्या हो, गरीबों के वैक्सीनेशन की समस्या हो, बीपीएल कैटेगरी के छोटे बच्चों के वैक्सीनेशन की समस्या हो या सरकारी योजनाओं में किसी भी प्रकार की जानकारी को लेकर हो इन सभी में आरटीआई लगा कर जानकारी प्राप्त की जा सकती है और गरीबों, पिछड़ों, महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों और अत्याचारों के विषय में भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियन में भी आरटीआई कानून के माध्यम से जानकारी प्राप्त की जा सकती है और साथ में हर एक ट्रेड यूनियन में कानूनी एक्सपोर्ट्स का एक ग्रुप होना चाहिए। उन्होंने एक उदाहरण देकर बताया कि एक व्यक्ति 30 वर्ष तक तिहाड़ जेल में बंद था और तब किसी सामाजिक कार्यकर्ता ने एक पोस्ट कार्ड में उस समय के भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री भगवती को पत्र लिखा जिसे जनहित याचिका के तौर पर स्वीकार करते हुए कार्यवाही की गई और उस व्यक्ति को न्याय मिला।

आरटीआई कानून को लेकर भी लीगल ऐड की है जरुरत, कुछ इस दिशा में पहले से प्रयासरत – शैलेश गाँधी

कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने भी सूचना के अधिकार कानून के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आरटीआई कानून को लेकर भी लोग आरटीआई क्लीनिक चलाते हैं जो अच्छी बात है। इस प्रकार की क्लीनिक से गरीबों को न्याय मिलता है और फ्री में आर टी आई आवेदन दायर करने के ज्ञान मिलते हैं। उन्होंने गुजरात में पंक्ति जोग द्वारा चलाए जा रहे आरटीआई हेल्पलाइन का उदाहरण देते हुए बताया कि उनका बहुत अच्छा प्रयास है और इसके माध्यम से एक आरटीआई ऑन व्हील गाड़ी जगह-जगह जाकर आरटीआई कानून के विषय में जानकारी देती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रकार के आरटीआई वेबीनार में शामिल होने वाले सभी सदस्यों को यह ध्येय बनाना चाहिए की वह प्रत्येक सप्ताह कम से कम चार से पांच लोगों को जाकर आरटीआई कानून के बारे में फ्री ऑफ़ कास्ट बताएंगे और आवेदन कैसे करना है इसकी जानकारी दें. इससे भी आरटीआई कानून के विषय में जन जागरूकता फैलेगी और लोग अपने अधिकारों के विषय में जागरूक होंगे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय आरटीआई वेबीनार में सम्मिलित होना बहुत अच्छी बात है और इससे हम बहुत कुछ सीखते हैं लेकिन इस कार्य को सप्ताह के अन्य दिनों फिजिकली भी प्रोपागेट करना चाहिए। इस प्रकार कार्यक्रम में अन्य विशेषज्ञ प्रवीण भाई पटेल, वेंकटरमण, श्याम मुरारी प्रसाद, नरोत्तम मिश्रा, सुरेंद्र भनोट, सनोलिया आदि ने भी अपने विचार साझा किए और बताया की कॉलेज और स्कूल स्तर से ही कानूनी शिक्षा देकर अच्छे विद्यार्थी तैयार किए जाएं जो आगे चलकर समाज में न्याय और कानून व्यवस्था के लिए काम करें और संवेदनशील बने। कुछ लोगों ने आरटीआई कार्यकर्ताओं के ऊपर हो रहे हमलों को लेकर भी प्रश्न खड़ा किए जिस पर श्रीमती रश्मि ओझा सहित प्रवीण भाई पटेल और शैलेश गांधी ने मार्गदर्शन किया. शैलेश गांधी ने बताया की जब भी किसी आरटीआई आवेदक पर हमला किया जाय तो प्रयास यह करना चाहिए कि जो जानकारी वह प्राप्त करना चाह रहा था और जिसकी वजह से उसके ऊपर हमला किया गया उस जानकारी को सार्वजनिक पोर्टल पर डाला जाए जिससे हमलावर बेनकाब हो जाएँ. इससे आर टी आई एक्टिविस्ट को टारगेट बनाने की चेष्टा में बदलाव आयेगा.


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