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MP-Breaking रेहवा घाटी में भीषण पशु क्रूरता के 31 दिन पूरे, अभी भी जीवन और मौत से जूझ रहे कई गोवंश// प्रशासनिक कार्यवाही मात्र खानापूर्ति तक सिमटी//

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गाय के नाम पर वोट बैंक की राजनीति करने वाले और गौ रक्षा की बात करने वाले आज इस बात से अनभिज्ञ नहीं है कि रीवा जिले के सिरमौर वन परीक्षेत्र अंतर्गत थाना गढ़, लालगांव चौकी, सरई बीट की रेहवा घाटी में लगभग 2 हज़ार फीट से अधिक गहरी घाटी में धकेले गए 150 से अधिक गोवंशों की स्थिति आज कैसी है? यह बात आए दिन मीडिया में सुर्खियों में रहती है और चल रहे रेस्क्यू ऑपरेशन की खबर भी प्रकाशित होती ही रहती है। लेकिन सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि ये हिंदुत्व और गायों के ठेकेदार राजनीतिक दल और सत्ताधारी पार्टी एवं इनके साथ गौरक्षा की बात करने वाले कुकुरमुत्ता की तरह उत्पन्न हुए संगठन कहीं दूर-दूर तक नहीं दिख रहे हैं।  वैसे तो पता नहीं कितने गैर सरकारी संस्थान भी है जो सरकार से पैसा लेकर गायों के नाम पर अपना गोरख धंधा खोले बैठे हैं लेकिन 27 सितंबर 2021 की यह वारदात आज पूरे 1 माह पूर्ण कर चुकी है लेकिन न तो कोई राजनीतिक दल और न ही गायों के नाम पर माल ऐंठने वाले एनजीओ या कोई गौ सेवक ही इसकी खबर लेने आया कि आखिर वह घाटी में आज गोवंश की वर्तमान स्थिति क्या है? गाय को भारतीय समाज ने बहिष्कृत कर दिया। जिस समाज ने अपने माता पिता को ही आज वृद्ध आश्रम का रास्ता दिखा दिया है वह भला माल मवेशियों के लिए क्या कर सकता है? यह गोवंश तो मात्र मानव के स्वार्थ तक सीमित थे जहां उन्हें खेती किसानी और दूध खाने के लिए उपयोग किया जाता था। गाय हमारी माता है भारत भाग्य विधाता है यह सब बकवास का कोई औचित्य नहीं रह गया है। मात्र हमारा पेट और पैसा कहां से मिले आज भारतीय समाज की यही प्राथमिकता रह गई है। नैतिकता की तो बात ही भूल जाइए स्वार्थ ही सर्वोपरि है और ऐसे में काहे की गाय और काहे की माता।

   31 में दिन दो गायों का हुआ इलाज दर्जनभर अभी भी घाटी के नीचे फंसी 

     इस बीच दिनांक 27 अक्टूबर को रेहवा घाटी में गोवंशों के साथ की गई भीषण क्रूरता का पूरा 31 दिन पूरा हुआ। सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने एक बार फिर पशु चिकित्सा विभाग के चिकित्सकों के साथ जाकर घाटी के नीचे फंसे हुए घायल गोवंशों का इलाज करवाया। हालाकी इसकी सूचना पहले भी जिला कलेक्टर रीवा डॉक्टर इलैयाराजा टी एवं अनुविभागीय एवं दंडाधिकारी सिरमौर नीलमणि अग्निहोत्री को दे दी गई थी। सूचना तो पशु चिकित्सा अधिकारी गंगेव एस के पांडेय को भी दे दी गई थी लेकिन दिनांक 27 अक्टूबर को रेहवा घाटी में लगभग 12:00 बजे दोपहर मात्र दो मानसेवी वन सुरक्षाकर्मी जगन्नाथ यादव एवं बाबूलाल यादव ही उपस्थित हुए जबकि पंचायत विभाग की तरफ से न तो भूसा-चारा की व्यवस्था की गई और न ही कोई पंचायत का कर्मचारी ही उपस्थित हुआ। पशु चिकित्सा विभाग से पशु चिकित्सक डॉ रत्नेश सिंह, गोसेवक रंजीत साकेत, सीए राजबहोर गर्ग के साथ मीडियाकर्मी अरुणेंद्र पटेल, लालबहादुर पटेल घाटी पर उपस्थित हुए। इस बीच घाटी के नीचे मानसेवी वन चौकीदार जगन्नाथ यादव, मीडियाकर्मी अरुणेंद्र पटेल, लाल बहादुर पटेल, गोसेवक रंजीत साकेत, सीए राजबहोर गर्ग 2 हज़ार फीट गहरी घाटी के नीचे पहुंचकर दो गायों का इलाज किया जिसमें ऑक्सीटेटरासाइक्लिन, मल्टीविटामिन, एनाल्जेसिक, एल्बेंडाजोल, टॉपिक्योर स्प्रे, हीमेक्स लोशन आदि दवाओं का उपयोग कर इलाज किया गया। 

   प्रशासन ने नही किया चारा भूसा का इंतेजाम 

   दिनांक 27 अक्टूबर को किसी भी प्रकार से पोषण की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी जिसके कारण गोवंश भूसा-चारा से वंचित रहे। मौके पर घाटी के नीचे झाड़ियों के बीच 14 गोवंश देखे गए जिसमें 9 गाय तीन बैल एवं दो छोटे बच्चे थे। इस प्रकार इलाज कर उन्हें जंगल से बांस के पत्ते तोड़कर खिलाये गए। घाट के नीचे गोवंशों की स्थिति बेहतर नहीं है और वह दिन प्रतिदिन कमजोर हो रहे हैं एवं साथ में जंगली जानवरों के भय से भी भयभीत रहते हैं। अक्सर यह देखा जा रहा है कि पत्थरों के बीच में चढ़ते उतरते समय उन्हें कहीं न कहीं चोट भी लग रही है जिसकी वजह से घाव में कीड़े पड़ रहे।

 3 दिन तक नहीं हुआ कोई इलाज

    बता दें कि पूरे मामले में जिन 150 गोवंशों को 2 हज़ार फीट से अधिक गहरी रेहवा घाटी के नीचे धकेला गया था उनमें से 104 गोवंशों को रेस्क्यू किया जाकर बाहर निकाले जाने में सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी का मुख्य रोल रहा है और मीडिया के लगातार दबाव के चलते घाटी के नीचे डॉक्टर और अन्य कर्मचारी भी पहुंचे। लेकिन क्योंकि 24 से लेकर 26 अक्टूबर तक शिवानन्द द्विवेदी स्वयं भी घाट के नीचे नहीं जा पाए जिसकी वजह से उनकी अनुपस्थिति में न तो कोई पशु चिकित्सा कर्मचारी वहां पर पहुंचा और न ही किसी भी प्रकार से गोवंशों का पोषण किया गया। अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर घाट के नीचे फंसे हुए गोवंशों के प्रति किसका सरोकार है और कौन इन्हें जीवित वहां से बाहर निकाल पाएगा? यदि प्रशासन की देखी जाए तो जब 20 बार सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा फोन किया जाता है और जानकारी प्रेषित की जाती है तब जाकर कुछ आंशिक तौर पर कार्यवाही होती है और डॉक्टर पहुंचते हैं और वह भी किसी प्रकार के पोषण की व्यवस्था नहीं की जाती। ऐसे में जाहिर है कि गोवंशों की स्थिति आने वाले समय में दयनीय बनी रहेगी।

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