सूर्या की चमक पर क्या चौंधिया गए थे संजय..?कमिश्नर के निर्देश पर उपायुक्त ट्राईबल मे पहुंची फाइलें..
करोड़ों के अनियमित भुगतान का मामला
(विशेष संवाददाता)
शहडोल। कमिश्नर आदिवासी विकास के निर्देश पर उपायुक्त आदिवासी विकास उषाअजय सिंह शहडोल ने करोड़ों रुपए की 25 वर्ष से लंबित एरियर भुगतान की फाइल का निपटारा तृतीय वर्ग कर्मचारी मंडल संयोजक को प्रभारी सहायक आयुक्त आदिवासी विकास शहडोल बनाकर भ्रष्टाचार करने संबंधी जैसीहनगर के पांडे शिक्षा समिति की फाइल को उपायुक्त कार्यालय में बुला लिया गया है। जहां उसकी समीक्षा की जाएगी कि वास्तव में वर्षों से लंबित भुगतान करना विहित प्रक्रिया के अनुरूप कानूनन सही था अथवा करोड़ों रुपए क भुगतान करके अधिकारियों ने बंदरबांट कर लिया…?
हालांकि जबलपुर में होने वाली आदिवासी विकास आयुक्त की समीक्षा तैयारी बैठक के लिए 21 अक्टूबर को जब संयुक्त संचालक संजय वार्ष्णेय शहडोल आए तो पांडे शिक्षा समिति के प्रमुख उनके साथ छाया की तरह रहे और रात में सूर्या होटल में आदिवासी विकास के नाम पर जश्न भी मनाया। बताया जाता है तब जब किसी आरटीआई कार्यकर्ता ने पांडे शिक्षा समिति शिकायत उनसे की तो उन्होंने उसे यह कहकर दबा दिया की “व्यवस्था का अंग है और पांडे जी उनके ही कमरे में बैठे हुए हैं। जिससे शिकायतकर्ता चौक गए बहरहाल मामला चर्चित हो चुका था कि वर्षों से लंबित भ्रष्ट फाइल का निपटारा कोई तृतीय वर्ग कर्मचारी को प्रभार देकर कैसे किया जा सकता था ।
और वह भी संबंधित कर्मचारियों के खाते में एरियर की राशि ना डाल कर करीब आठ करोड़ 34 लाख रुपए शिक्षा समिति के खाते में डाल दिया गया। यह जानते हुए की उसके कई कर्मचारी विवादित हैं और कई बेनामी भी, तो कुछ के गायब हो जाने की भी बातें सामने आई है। किंतु अब यह कहकर बातें टाली जा रही है की तृतीय वर्ग कर्मचारी अंसारी की क्या औकात है अगर तत्कालीन कलेक्टर सत्येंद्र सिंह ने भुगतान पर दबाव बनाया था। अंसारी का भी यह दावा स्वाभविक है कि यदि कलेक्टर ने उन्हें पांडे शिक्षा समिति का भुगतान करने को कहा तो वह कैसे रोक सकता था। किंतु इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता कि भुगतान सही व्यक्ति को मिलना चाहिए था जो नहीं हुआ और ना ही उसके पावती की पुष्टि की गई। यह बात अंततः 22 अक्टूबर को जबलपुर की समीक्षा बैठक में कमिश्नर संजीव सिंह ने उठाई भी। जिसका निष्कर्ष यह था कि पहले मौखिक और फिर बाद में लिखित तौर पर आदेश के अनुसार शहडोल उप आयुक्त आदिवासी विकास उषा अजय सिंह ने संबंधित शिक्षा समिति जैसीनगर के फाइलों की जांच करने के लिए अपने कार्यालय में बुलवा लिया है।
अब देखना होगा कि कितनी इमानदारी से इस बात को प्रमाणित किया जाता है कि कोई तृतीय वर्ग कर्मचारी, यदि कोई कलेक्टर भी कहता है तो क्या वह जिला कोषालय अधिकारी की सहमति से करोड़ों रुपए गैर कानूनी तरीके से आदिवासी विकास के नाम पर बंदरबांट के लिए आहरित कर सकता है…? और उसे किसी शिक्षा समिति के नाम पर भुगतान कर सकता है..? जबकि उसमें विवाद बहुत हो।
सूत्रों के अनुसार पांडे शिक्षा समिति जैसीहनगर में 115 कर्मचारी कार्यरत हैं इसमें 45 कर्मचारी का सरकारीकरण हो चुका है। समिति शिक्षा गुणवत्ता मापदंडों के खिलाफ आदिवासी शिक्षण संस्थानों का संचालन करती है। पांडे शिक्षा समिति राज्य प्रवर्तित योजनाओं पर तथा केंद्र प्रवर्तित योजनाओं के जरिए करोड़ों रुपए का बजट आदिवासी बच्चों के नाम पर वर्षों से लेती चली आ रही है। इसके लिए वह सीधे सहायक आयुक्त कार्यालय के प्रति अपनी जवाबदेही घोषित करती है। या फिर आदिवासी विकास मध्य प्रदेश और केंद्र सरकार के साथ संपर्क रखती हैं। जबकि जमीनी स्तर खंड शिक्षा अधिकारी व संबंधित संकुल क्षेत्र के कर्मचारियों और अधिकारियों को वह बेखौफ निरीक्षण करने की अनुमति भी नहीं देती क्योंकि उसे मालूम है आंख के अंधे, आदिवासी विकास के भ्रष्ट अधिकारी; जिला और राज्य तथा केंद्र में बैठकर भ्रष्टाचार को नहीं देख पाएंगे और ना ही देखना चाहेंगे और जब कभी संयुक्त संचालक स्तर के संजय जैसे लोग जांच करने भी आएंगे तो सूर्या होटल की चमक में उन्हें वही दिखेगा जो दबंग चुलबुल पांडे दिखाएगा। इस तरह उनके “बिहार का जंगलराज” शहडोल में यदि कोई तृतीय चतुर्थ वर्ग कर्मचारी दो दशक से ज्यादा लंबित एरियर भुगतान के लिए लाया गया प्रभारी सहायक आयुक्त के पद पर बैठकर करोड़ों का भुगतान करके भ्रष्टाचार करता है तो वह सिस्टम का हिस्सा मात्र है, उसका कोई दोष नहीं है।
ऐसे में यह देखना और भी रोमांचकारी होगा कि ईमानदार दिखने वाली उपआयुक्त आदिवासी विकास उषाअजय सिंह शहडोल में कितनी इमानदारी से इस भ्रष्टाचार के प्याज के छिलके उतारती हैं, अथवा वे किसी निष्कर्ष पर पहुंच कर कोई मील का पत्थर साबित होती हैं…? ताकि भविष्य में किसी भी स्तर का कोई अधिकारी किसी नेता के संरक्षण में किसी तृतीय अथव चतुर्थ वर्ग के कर्मचारी को अधिकारी बना कर आदिवासियों के नाम पर करोड़ों का भ्रष्टाचार न कर सके….? यह भी देखना होगा।



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