वैश्विक त्रासदी का हमारे उत्सवों और त्योहारों पर दिखता असर- भावना द्विवेदी
शहडोल ,मध्यप्रदेश
अखिलेश कुमार शर्मा (7999140850 )
शहडोल ।उत्सवों ,त्योहारों और परंपराओं का देश हमारा भारत । अपनी कला ,धर्म और सांस्कृतिक धरोहर के लिए दुनिया में विशिष्ट पहचान रखने वाला हमारा देश ,जहां हर दिन कोई न कोई त्योहार होता है जिसे हम उत्सव की तरह मनाते हैं
हजारों वर्षों से चली आ रही हमारी परंपराएं और सांस्कृतिक धरोहर आज भी सुरक्षित है क्योंकि हमने हर दिन को उत्सव की तरह जिया है और उसे पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित किया ताकि युगों युगों तक उसे सहेजा जा सके…ऐसे ही धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में आते है भारत में विभिन्न अवसरों पर लगने वाले मेले, जिनका उद्देश्य सामाजिक ,धार्मिक,सांस्कृतिक एवं व्यापारिक होने के साथ – साथ पूरे देश को एक सूत्र में पिरोना होता है ।
मेला का मतलब ही मेल मिलाप यानी मिलना । धार्मिक आयोजनों में लगाए गए मेलों में तो दुनिया भर के लोग इकट्ठा होते है । विद्वानों के मतानुसार कुंभ मेला – प्रयाग , हरिद्वार , उज्जैन और नासिक कुम्भ पर्व हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है , जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुम्भ मेले में स्नान करते हैं, कुंभ मेला चार जगहों (प्रयाग , हरिद्वार , उज्जैन और नासिक ) पर प्रत्येक बारह वर्ष में होता है। यह मेला मकर संक्रान्ति के दिन प्रारम्भ होता है , जब सूर्य और चन्द्रमा , वृश्चिक राशि में और वृहस्पति , मेष राशि में प्रवेश करते हैं । मकर संक्रान्ति के होने वाले इस योग को ” कुम्भ स्नान – योग ” कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलकारी माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं। यहाँ स्नान करना साक्षात् स्वर्ग दर्शन माना जाता है । इसका हिन्दू धर्म मे बहुत ज्यदा महत्व है । इन धार्मिक मेलों में एक मेला बाणगंगा का भी है जो हमारे शहडोल जिले में मकर सक्रांति के अवसर पर लगता है मकर संक्रान्ति का पर्व वैसे तो पूरे देश भर में मनाया जाता है ,परंतु देश के अलग अलग प्रांतों में इसे अपने अपने तरीके से लोग मनाते है । भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मकर संक्रांति के पर्व को अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। आंध्रप्रदेश, केरल और कर्नाटक में इसे संक्रांति कहा जाता है और तमिलनाडु में इसे पोंगल पर्व के रूप में मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा में इस समय नई फसल का स्वागत किया जाता है और लोहड़ी पर्व मनाया जाता है, वहीं असम में बिहू के रूप में इस पर्व को उल्लास के साथ मनाया जाता है। मध्यप्रदेश में इसे मकर संक्रांति के साथ – साथ खिचड़ी या खिचड़िहाई बोलते है । इस दिन आदि वासी भोर में गीत गाते हुए खिचड़ी मांगने आते है और उन्हें पैसे ,वस्त्र चावल और बड़ियां दी जाती है । यह पौराणिक परंपरा है । खिचड़ी और तिल के लड्डू भी घर में बनाए जाते है । इस दिन आसपास के धार्मिक स्थलों में विशाल मेले का आयोजन भी होता है ,जो अकसर पवित्र नदी के तट पर बने मंदिर क्षेत्र में किया जाता है । इस दिन जब सूर्य देव मकर राशि पर आते है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है । धार्मिक दृष्टिकोण से देखे तो इस दिन का विशेष महत्व होता है क्योंकि इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। इस दिन सूर्य भगवान उत्तरायण होते हैं। मान्यता है कि इस दिन से देवताओं के दिन शुरू हो जाते हैं। इस खास पर्व पर लोग सूर्यदेव को खिचड़ी का भोग लगाते हैं और पवित्र नदियों में स्नान करते हैं। एक मान्यता यह भी है कि संक्रांति के दिन ही मां गंगा स्वर्ग से अवतरित होकर राजा भागीरथ के पीछे-पीछे कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई गंगासागर तक पहुँची थी। धरती पर अवतरित होने के बाद राजा भागीरथ ने गंगा के पावन जल से अपने पूर्वजों का तर्पण किया था। इस दिन पर गंगा सागर पर नदी के किनारे भव्य मेले का आयोजन किया जाता हैं।
मकर संक्रांति के अवसर पर शहडोल जिले के विराट नगरी क्षेत्र में बाणगंगा का विशाल मेला लगता है । इस मेले की शुरूआत तात्कालीन रीवा महाराजा गुलाब सिंह ने 1895 मे कराई थी। तब से बांणगंगा मे निरंतर मेले की परांपरा चली आ रही है। मेले का उदेश्य स्नान, दान व पुण्य की प्राप्ति होती है । मिसाल कल्चुरी कालीन एक हजार पहले बने विराट मंदिर के प्रांगण में अपनी अमिट छाप छोड़ रही है। मेले में लोगों का मेल मिलाप और उत्साह पुरानी रीति रिवाज को समेटे हुए आदिवासियों के प्रकृति प्रेम का गवाह बना हुआ है। जब मेले की शुरुआत हुई थी तब तीन दिन तक ही मेला लगता था। जो अब पांच दिन तक लगने लगा है। किंतु पिछले दो सालों से कोरोना महामारी के चलते मेले का न सिर्फ स्वरूप बदला बल्कि लोगों में उत्साह की भी कमी आई है । कोरोना महामारी से होने वाले मौत की बढ़ते आंकड़े ने लोगों में भय और चिंता उत्पन्न कर दिया । पिछले वर्ष तो जरूरी एहतियात के साथ शासन के निगरानी में मेला लगा ,परंतु इस बार कोरोना के नए वैरियंट और उसके बढ़ते प्रकोप के कारण मेले को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है । मेले में लगने वाले झूले ,रंगविरंगे गुब्बारे ,सजी धजी दुकानें ,मिठाइयां और खिलौने जो बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी जो बच्चों को मनोरंजन और खुशी देने के साथ साथ उन्हें उनकी संस्कृत से जोड़े रखती थी बच्चे उनसे दूर होते जा रहे हैं ।
सबसे ज्यादा नुकसान उन छोटे छोटे दुकानदार और उन शिल्पकारों का हुआ है जो अपनी स्वनिर्मित वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाते थे और उन्हें अपने परिश्रम का मूल्य भी अपेक्षाकृत अधिक मिल जाता था । त्रासदी के इस बुरे दौर में हमने कठिनाइयां देखी मगर उससे हिम्मत से लड़ने का हौसला भी पाया । अपनों को खोया आर्थिक संकट से गुजरे परंतु ईश्वर पर हम सबका विश्वास नहीं डगमगाया । और यही कारण है कि आज भले ही मेलेे का विशाल मैदान सूना पड़ा हो परंतु आस्था का केंद्र पवित्र नदी का तट और मंदिर प्रांगण सूना नही रहा । एक निश्चित दूरी और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लोग मकर संक्रांति का स्नान करते नजर आए । जहां कई दिनों तक चहल – पहल हुआ करती थी वहां आज सन्नाटा छाया हुआ है सूना पड़ा विशाल मेला मैदान और वह आशा भरी नजरों से आने वाले कल की ओर देख रहा है की फिर नई सुबह आएगी । फिर सन्नाटा शोर में बदलेगा सुनहरा कल आयेगा मकर संक्रांति का उत्सव फिर से मनाया जाएगा । आस्था और विश्वास का यह पर्व समस्त संसार में उन्नति और प्रगति लाए । भगवान भास्कर से यही प्रार्थना है की तमो से आक्षादित समस्त संसार प्रकाशमय हो ….






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