सत्र के 11 वें ज़ूम मीटिंग वेबीनार का हुआ आयोजन, आरटीआई एवं सहकारिता विषय पर वेबीनार का हुआ आयोजन,

आरटीआई और सहकारिता विषय पर सत्र के 11 में जो मीटिंग वेबीनार का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने की एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री शैलेश गांधी पूर्व राज्य सूचना आयुक्त श्री आत्मदीप एवं माहिती अधिकार मंच मुंबई से संयोजक श्री भास्कर प्रभु शामिल हुए।
कार्यक्रम का संयोजन एवं प्रबंधन एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी ने किया। जूम मीटिंग सुबह 11 बजे से प्रारंभ होकर दोपहर 1 बजकर 30 मिनट तक चलती रही जिसमें पूरे देश के विभिन्न प्रदेशों यूपी, एमपी, राजस्थान, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, विहार, झारखंड, नई दिल्ली आदि जगहों से जुड़े हुए कार्यकर्ताओं ने सहकारिता एवं अन्य विषयों पर अपने जिज्ञासापूर्ण प्रश्न रखकर समाधान पाया।
आरटीआई पर नियमित ज़ूम मीटिंग सूचना के क्षेत्र में क्रांति का युग
बता दें कि जूम मीटिंग का यह कार्यक्रम प्रत्येक रविवार को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक नियमित तौर पर आयोजित किया जाता है जो भारत के सूचना आयोग के इतिहास के स्वर्णिम अध्याय के तौर पर देखा जा रहा है। जूम मीटिंग वेबीनार के विषय में भारत के राष्ट्रीय स्तर के अखबारों में आर्टिकल छप चुके हैं जिसमें कार्यक्रम की प्रशंसा की जा रही है। यह अकेले ऐसा कार्यक्रम है जिसमें मध्य प्रदेश के वर्तमान एक्टिंग राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह सम्मिलित हो रहे हैं।
आखिर सहकारिता विभाग एवं सहकारी समितियां सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर क्यों?
जब सूचना के अधिकार की बात आती है तो स्वाभाविक तौर पर पारदर्शिता की बात आती है ऐसे में एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत कार्य करने वाले सभी विभाग और संस्थानों की जानकारी आम जनमानस तक आसानी से सुलभ हो सके इसके लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। जब बात सहकारिता विभाग की आती है तो कुछ विशेष मामलों को छोड़कर इसे आरटीआई के दायरे से बाहर रखा जाता है पर सवाल यह है कि जिस विभाग में प्रतिवर्ष अरबों खरबों का कारोबार हो, जिस विभाग में जनता के पैसे का इतना अधिक मात्रा में आवक-जावक बना हो, जिस विभाग का गठन विधायिका में सहकारिता कानून पारित करके किया गया हो, जिस विभाग में सरकार स्वयं निगरानी करती हो तो सवाल यह है कि आखिर वह विभाग आरटीआई के दायरे से बाहर क्यों रखा जाए? सवाल यह भी है कि आज सहकारी समितियों में चाहे वह बीज की बात हो या खाद की अथवा किसानों और आम नागरिकों के पैसे के लेनदेन की यह सभी जानकारी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती और इसी के चलते सहकारी समितियों में व्यापक स्तर का भ्रष्टाचार परिलक्षित होता रहता है।
डभौरा सहकारी बैंक जैसे घोटाले सहकारी संस्थाओं के कार्यकलाप पर प्रश्न चिन्ह
मध्य प्रदेश के रीवा जिले के परिपेक्ष में बात की जाए तो देखा जाएगा कि डभौरा में सहकारी बैंक से संबंधित एक व्यापक स्तर का घोटाला हुआ जिसकी जांच आज तक पूरी नहीं हो पाई। तो स्वाभाविक तौर पर यह बात सामने आती है कि यदि यह सभी संस्थाएं और सहकारी बैंक सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आ जाएं तो इस प्रकार के भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जा सकती है और काफी हद तक पारदर्शिता आ सकती है।
50 हज़ार रु अनुदान प्राप्त सहकारी संस्थाएं आरटीआई के दायरे में – सूचना आयुक्त राहुल सिंह
जब बात सहकारी समितियों की आती है तो एक नियम सामने आता है जिसमें सब्सटेंशियल फंडिंग की बात आती है। जिन सहकारी संस्थाओं को सरकार से सब्सटेंशियल फंडिंग दी जाती है वह संस्थाएं अभी कानून के दायरे में आती हैं। तो सवाल यह है कि आखिर यह सब्सटेंशियल फंडिंग है क्या? और इसे परिभाषित कैसे करते हैं? सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह द्वारा बताया गया की जिन सहकारी संस्थाओं को पचास हजार रुपए तक का अनुदान मिला हो अथवा उन्हें सरकारी भूमि का आवंटन किया गया हो अथवा 23 प्रतिशत से अधिक की राशि किसी न किसी रूप में इन संस्थाओं को दी गई हो अथवा यदि कोई सरकारी कर्मचारी सहकारी संस्थाओं में कार्यरत हो वह सभी संस्थाएं आरटीआई कानून के दायरे में आती है।
लोक सूचना अधिकारी जानकारी न होने की बात कहकर आवेदन वापस नहीं कर सकता – पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी
पार्टिसिपेंट्स के कुछ प्रश्नों का जवाब देते हुए पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री शैलेश गांधी द्वारा बताया गया कि आरटीआई कानून में कोई भी लोक प्राधिकारी किसी भी प्रकार से आरटीआई का आवेदन वापस नहीं कर सकता और न ही यह कह सकता कि वह जानकारी उसके कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। यदि चाही गई कोई जानकारी किसी कार्यालय में उपलब्ध नहीं है तो यह लोक सूचना अधिकारी का दायित्व होता है की आवेदन धारा 6(3) के अंतर्गत उस कार्यालय के लिए अंतरित कर दें जिस कार्यालय में वह जानकारी उपलब्ध हो।
क्या पीएम केयर्स फंड आरटीआई के दायरे में आता है?
जूम वेबीनार के दौरान एक बार फिर यह प्रश्न उठा कि क्या पीएम केयर्स फंड आरटीआई कानून के दायरे में आता है इस विषय पर पार्टिसिपेंट्स सुनील खंडेलवाल गिरिडीह झारखंड ने बताया कि उन्होंने आरटीआई आवेदन दायर कर पीएम केयर्स फंड के विषय में जानकारी चाही थी लेकिन उन्हें जानकारी उपलब्ध नहीं करवाई गई और बताया गया कि पीएम केयर्स फंड आरटीआई के दायरे में नहीं आता। इस पर मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री शैलेश गांधी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि इस विषय में श्री गांधी ज्यादा बेहतर प्रकाश डाल सकते हैं क्योंकि उन्होंने इस पर काम किया है । इसके बाद श्री शैलेश गांधी ने बताया कि ऐसे सभी संस्थान यहां पर पब्लिक प्रॉपर्टी और पब्लिक मनी लगी हुई है वह सभी संस्थान चाहे पीएम केयर्स फंड हो या की कोई अन्य संस्था सभी आरटीआई के दायरे में आने चाहिए। इस विषय पर उन्होंने कहा कि यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में जाकर ही निराकृत हो सकता है और कोर्ट की प्रक्रिया इतनी पेचीदी होती है की इसमें दशकों का समय लगना स्वाभाविक है।
पंचायत विभाग के वेब पोर्टल में जानकारी अपग्रेड न होने से हो रही समस्या – उपस्थित जिज्ञासु
इस बीच आरटीआई की धारा 4 के अंतर्गत जानकारी साझा किए जाने एवं उस जानकारी को समय-समय पर अपग्रेड किए जाने के विषय पर भी चर्चा हुई जिस पर रीवा से आवेदक प्रदीप उपाध्याय एवं सुरेश उपाध्याय सहित अन्य कार्यकर्ताओं ने बताया कि जब भी वह पंचायत दर्पण अथवा नरेगा के वेब पोर्टल में जाकर पंचायत विभाग की जानकारी देखते हैं तो उसमें काफी कमियां समझ में आती है जिसमें न तो किसी भी कार्य की फोटो अपलोड होती है और न ही बिल वाउचर साथ में इस बात की भी जानकारी नहीं रहती है कि वह कार्य किस दिनांक को पूरा हुआ और कितना एस्टीमेट बना। इस पर उपस्थित विशेषज्ञों सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री शैलेश गांधी एवं महिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक श्री भास्कर प्रभु एवं अन्य ने बताया कि इस विषय में सबसे पहले उस विभाग को एक शिकायत की जानी चाहिए और वेब पोर्टल को अपग्रेड करने की मांग की जानी चाहिए तत्पश्चात उस शिकायत की प्रति के साथ में संबंधित सूचना आयोग में धारा 18 के तहत शिकायत प्रस्तुत कर कार्यवाही की मांग की जानी चाहिए जिसके बाद आयोग संज्ञान लेगा और संबंधित विभाग को वेब पोर्टल में नियमित जानकारी साझा करने और अपग्रेड करने को निर्देशित करेगा।
धारा 4 के तहत रिकॉर्ड किस प्रकार से मेंटेन होते हैं इसकी जानकारी ली जानी चाहिए – श्री भास्कर प्रभु

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो से जुड़े हुए एक मामले में प्रबल प्रजापति द्वारा गृह मंत्रालय से कुछ जानकारी चाही गई थी जिसे संबंधित विभाग ने अन्य विभागों को अंतरित करते हुए जानकारी न होने की बात कही इस पर भास्कर प्रभु ने बताया कि हमें कोई भी जानकारी मांगने से पूर्व यह देखना चाहिए कि जो जानकारी कैटलॉग अथवा संकलित फार्म में हम मांग रहे हैं वह उस विभाग के पास उपलब्ध है अथवा नहीं इसलिए आवेदकों को पहले रिकॉर्ड के निरीक्षण की मांग करनी चाहिए और फिर उसके बाद यदि वह जानकारी उस रिकॉर्ड फॉर्म में उपलब्ध है तो आरटीआई की धारा 6(1) के तहत उनकी प्रमाणित प्रतियों की माग की जानी चाहिए। कई बार ऐसा होता है कि हम जानकारी मांग लेते हैं लेकिन विभाग के पास संकलित नहीं रहती है इसके लिए सूचना आयोग में धारा 18 के तहत शिकायत प्रस्तुत कर धारा 4 के तहत उन जानकारियों को संकलित करने की भी मांग की जा सकती है। जिसके आधार पर सूचना आयोग अपनी 19(8) की शक्तियों का प्रयोग कर संबंधित विभाग को जानकारी संकलित करने और कैटलॉग फार्म में व्यवस्थित रखने के लिए निर्देशित कर सकता है।
सूचना के अधिकार की मूल भावना है पारदर्शिता लाना सूचना – आयुक्त श्री राहुल सिंह
रीवा से जूम वेबीनार कार्यक्रम में जुड़े दैनिक जागरण अखबार से देवेंद्र सिंह ने बताया कि सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह का कार्य बेहद प्रशंसनीय है और उनके कार्य से मध्य प्रदेश के सूचना आयोग के इतिहास और साथ में पूरे भारत के सूचना आयोग के इतिहास में एक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। देवेंद्र सिंह ने श्री राहुल सिंह का इसके लिए धन्यवाद दिया। इस पर अपना विचार व्यक्त करते हुए सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि वर्ष 2005 से सूचना का अधिकार का कानून लागू किया गया है और आज वर्ष 2020 को पूरे 15 वर्ष हो चुके हैं लेकिन अभी भी कानून अपने स्वरूप पर नहीं पहुंच पाया है और मूल भावनाएं अभी भी बहुत दूर है। सूचना आयुक्त ने बताया आरटीआई कानून की मूल भावना पारदर्शिता लाना है लेकिन सरकारी लोक प्राधिकारी और लोक सूचना अधिकारी इस पर पलीता लगा रहे हैं और अभी भी जानकारी साझा न कर आरटीआई कानून की मूल भावना पर प्रहार कर रहे हैं। सिंह ने पत्रकारों वकीलों और एक्सपर्ट को धन्यवाद देते हुए कहा यह बहुत अच्छी बात है की यह सभी लोग इस प्रकार की मीटिंग और ज़ूम वेबीनार से जुड़ रहे हैं और सूचना के अधिकार के आंदोलन के सहभागी बन रहे हैं और निश्चित ही आने वाले समय में एक विशेष परिवर्तन देखने को मिलेगा।
11वें जूम वेबीनार में यह यह कार्यकर्ता रहे सम्मिलित
आरटीआई कानून और सहकारिता विषय पर आयोजित 11वें ज़ूम मीटिंग में लगभग एक सैकड़ा कार्यकर्ता सम्मिलित हुए जिसमें प्रमुख रुप से अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा शिवेंद्र मिश्रा, टूरिस्म एक्टिविस्ट सर्वेश सोनी, एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी, प्रबल प्रजापति, झारखंड से ए के सिंह एवं सुनील खंडेलवाल, मध्य प्रदेश से राज तिवारी, नागपुर से वीरेंद्र द्विवेदी, अंबुज पांडे, रीवा से प्रदीप उपाध्याय एवं सुरेश उपाध्याय, डाढ़ से पुष्पराज तिवारी, गंगेव से रवि मिश्रा, गढ़ से संजीव पांडेय, शैलेंद्र तिवारी मदरी से स्वतंत्र शुक्ला, इंदौर से मेघना गतिया, केशव पारीक, राजस्थान से राम खिलाड़ी एवं सपना मीणा, कमिश्नर कार्यालय रीवा से कृष्णानंद पांडेय, दैनिक जागरण रीवा से देवेंद्र सिंह एवं पत्रिका संपादक मृगेंद्र सिंह आदि लगभग एक सैकड़ा जिज्ञासु मीटिंग से जुड़े और अपने अपनी समस्याओं का समाधान पाया।
बता दें कि ज़ूम मीटिंग वेबीनार प्रत्येक रविवार सुबह 11:00 बजे से 1:00 बजे तक आयोजित किया जाता है जिसमें पूरे भारत देश के विभिन्न राज्यों से कार्यकर्ता एवं जिज्ञासु सम्मिलित होते हैं।


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