MP//Rewa// कैथा हनुमान मन्दिर प्रांगण में भागवत महायज्ञ का पांचवां दिन // जगत को ब्रह्ममय मानने से ही रागद्वेष नष्ट होंगे – डॉक्टर गौरीशंकर शुक्ला
यज्ञों की पावन स्थली कैथा हनुमान जी स्वामी मंदिर प्रांगण में श्रीमद भागवत महायज्ञ का पाँचवाँ दिन रहा. इस बीच कलश यात्रा के साथ दिनांक 10 सितम्बर को प्रारंभ हुई भागवत कथा में डॉक्टर गौरीशंकर शुक्ला के मुखारबिंद से अमृतमयी पापविनाशक भागवत कथा की अविरल धारा प्रवाहित हो रही है.
कथा के चौथे/पांचवे दिन डॉक्टर शुक्ला ने समुद्र मंथन, भगवान् का अवतार, राजा बलि कथा, बामन अवतार, पाताल लोक भेजना, रामावतार के पूर्वजों की कहानी, राजा अम्बरीश की कहानी, गंगा का धरती पर अवतरण की कथा, भागीरथ की कहानी आदि कथा प्रसंगों का वर्णन किया.
परमात्मा की प्राप्ति वैराग्य युक्त ज्ञान और प्रेममय भक्ति से संभव – डॉक्टर गौरीशंकर शुक्ला
ज्ञान मार्ग में वैराग्य प्रमुख है जबकि भक्ति मार्ग में प्रेम प्रमुख है. आचार्य ने बताया की इस संसार सागर में सुखी रहने के लिए ज्ञान और भक्ति का आलंबन करना पड़ता है. जहां निष्काम भाव से कर्म कर व्यक्ति कर्म योग की प्राप्ति करता है और जीवन में ही मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है वैसे ही ज्ञान मार्ग कहता है की सब कुछ छोड़कर परमात्मा के प्रति बुद्धि को लगा दें. बताया गया की बिना वैराग्य के ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती. ज्ञान मार्ग में वैराग्य की प्रमुखता बतायी गयी है. वैराग्य का तात्पर्य विरक्त होने से है. जब कर्म और कर्म फल के प्रति आसक्ति समाप्त हो जाए तो वैराग्य उत्पन्न हो जाता है. ज्ञानमार्गी ईश्वरीय ज्ञान की दिशा में अग्रसर होते हुए भी अपने ज्ञान का अभिमान न करे. यह माने की सब कुछ ईश्वर की कृपा से हो रहा है. ऐसा भाव लाकर कर्म करना चाहिए. भक्ति मार्ग में सर्वस्व का त्याग संभव नहीं होता है इसलिए सभी कुछ ईश्वर है ऐसा मानकर सभी से विवेक पूर्वक प्रेम करना चाहिए. जहां ज्ञान-वैराग्य के प्रधान देवता शिव हैं वहीँ भक्ति और प्रेम के प्रधान देवता श्रीकृष्ण हैं.
निर्गुण ब्रह्म के प्रति निष्ठा के बिना भक्ति अपूर्ण है
आचार्य ने बताया की सगुण और निर्गुण ब्रह्म के दोनों स्वरूपों का ज्ञान आवश्यक है. निर्गुण के प्रति जब तक निष्ठा न हो सके तब तक मन के राग द्वेष नहीं जाते. बताया गया की जिसकी सगुण में निष्ठा हो लेकिन निर्गुण में न हो तो उस साधक की भक्ति अपूर्ण रहती है. मन का स्वरुप चंचल होता है इसलिए वह भटक जाता है. ध्यान में मन का स्थिर रहना आवश्यक है. लेकिन मन स्वभाववश बाहरी विषयों में भटक जाता है. वर्तमान समय भौतिकतावादी है इसलिए भोग प्रधान है. अतः मन को अंतर्मुखी रखना काफी कठिन है. जो ज्ञानी पुरुष होते हैं वह मन की मलीनता को धोने के लिए विराट पुरुष की धारणा करते हैं. विराट पुरुष से तात्पर्य ईश्वर के स्वरूप से है और सारे जगत को ब्रह्म स्वरुप मानना ऐसी धारणा करना चाहिए. साधारण मानव के लिए इस विराट पुरुष की कल्पना करना कठिन होता है इसलिए अतिसुन्दर नारायण का ध्यान करते हैं.
जगत को ब्रह्ममय मानने से ही रागद्वेष नष्ट होंगे
आचार्य ने बताया की जगत को जब तक ब्रह्म स्वरुप नहीं मानेंगे तब तक रागद्वेष नहीं मिटेगा. कुछ साधक जगत को ब्रह्ममय मानते हैं तो कुछ साधक प्रत्येक पदार्थ में ब्रह्मस्वरूप का अनुभव करते हैं. रागद्वेष के नाश के लिए विराट पुरुष का ध्यान करना चाहिए. समस्त स्थावर जंगम संसार उसी विराट पुरुष का स्वरुप है ऐसी भावना रखी जाय तो किसी वस्तु के प्रति हीनभाव उत्पन्न नहीं होता है और न ही किसी वस्तु विशेष के प्रति आसक्ति ही उत्पन्न होती है.
इस प्रकार भागवत कथा के चौथे/पांचवें दिन धर्म-अध्यात्म से जुड़ी गूढ़ बातों की आचार्य ने चर्चना की और उपस्थित श्रधालुओं को सन्मार्ग पर चलते हुए अपने विहित कर्मों को करने की प्रेरणा और ज्ञान दिया. कार्यक्रम का समापन हवन भंडारे के साथ दिनांक 17 सितम्बर 2021 को किया जाएगा और इस बीच 17 सितम्बर तक कथा अविरल प्रवाहित होती रहेगी.




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