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MP-Breaking– रेहवा घाटी में फंसी गायों की एक-एक करके हो रही मौत // पशु चिकित्सा अधिकारियोंऔर प्रशासन की गैर-जिम्मेदारी का खामियाजा भुगत रहा भारत का बेजुबान गोवंश // पशु चिकित्सा डिग्रीधारी रीवा कलेक्टर इलैयाराजा टी के जिले में गोवंशों की यह दुर्दशा // प्रदेश की 4 हज़ार से अधिक गोशालाएं हवा हवाई, भीषण क्रूरता के शिकार हो रही भारतीय संस्कृति की माता

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रीवा जिले के सिरमौर वन परिक्षेत्र की रेहवा घाटी में 27-28 सितम्बर 2021 के दरम्यान भीषण पशु क्रूरता कारित की गयी थी जिसमें लगभग 150 गोवंशों को घाटी के नीचे धकेलने का मामला प्रकाश में आया था. इसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा जब मामले को उच्च स्तर और मीडिया में उठाया गया तो प्रशासन के कानों में जूं रेंगना प्रारंभ हुआ और प्रशासन अपनी नाकामी को छुपाने के लिए फंसे हुए गोवंशों के रेस्क्यू ऑपरेशन की औपचारिकताएं पूरी करने में जुट गया. लेकिन यह प्रशासनिक औपचारिकता भी महज दिखावा तक ही सीमित रह गयी. जिन 4 सदस्यीय जांच दल का गठन कलेक्टर रीवा डॉक्टर इलैयाराजा टी के निर्देशन में सिरमौर एसडीएम नीलमणि अग्निहोत्री द्वारा किया गया था उनमें से अधिकतर गायब ही रहे. यहाँ सबसे अधिक आवश्यकता गोवंशों के पोषण और इलाज को लेकर थी लेकिन जिस पशु चिकित्सक रत्नेश सिंह को इस कार्य के लिए लगाया गया था वह पूरी तरह से नदारद रहा और जब भी मौके पर आया भी तो मात्र घाट के ऊपर से ही औपचारिकता पूर्ण कर निकल गया और कभी भी घाट के नीचे पहुंचकर घायल और बीमार गोवंशों का इलाज नहीं किया. जिन गोवंशों को रेस्क्यू भी किया गया उन्हें गोशाला में पहुंचाया जाना था लेकिन एक भी गोवंशों को गौ शाला में नहीं पहुंचाया गया और मात्र बाहर ही बेसहारा छोड़ दिया गया.

 

 एक-एक कर दम तोड़ रही गायें, प्रशासन बना मूक दर्शक

 

   बता दें की सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी जिन्होंने इस पूरे मामले को प्रारंभ से उठाया है और निरंतर मामले को लेकर सक्रिय रहकर स्वयं प्रतिदिन जाकर घायल और बीमार गोवंशों का इलाज और पोषण कराने का प्रयास भी कर रहे हैं और उन्हें रेस्क्यू भी कर रहे हैं उनके द्वारा बताया गया की अब तक 7 चरणों का रेस्क्यू अभियान संपादित किया जा रहा है जिसमें कुल 104 गोवंशों को घाटी ने ऊपर भी रेस्क्यू कर पहुंचाया गया है. शेष लगभग 2 दर्जन पहले ही मृत हो चुकी हैं और एक दर्जन के आसपास पिछले 2 सप्ताह में भूख, चोट और घायल होने के कारण मरी हैं. शेष लगभग एक दर्जन के आसपास गोवंश अभी भी बचे हैं जिनका रेस्क्यू किया जाना आवश्यक है लेकिन प्रशासन के असहयोगात्मक और नकारात्मक रवैये के चलते यह अभियान फीका पड़ रहा है. मात्र घाट के नीचे एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी अपने कुछ साथियों और वन कर्मियों के साथ परेड कर रहे हैं. चूँकि डॉक्टर की अनुपलब्धता के चलते कोई इलाज नहीं हो पा रहा है और इलाज और पोषण के अभाव में गोवंश एक-एक करके मरते जा रहे हैं.

 

 

घायल भूखे गोवंशों को अब घाटी के ऊपर मात्र उठाकर ही रेस्क्यू संभव

 

   जिस प्रकार शेष बचे हुए गोवंश घायल और चोट के कारण बीमार अवस्था में हैं इससे स्पष्ट है की उनको घाट के ऊपर चढ़ा पाना इतना आसान नहीं होगा. दिनांक 18 अक्टूबर 2021 को देरी से पहुंचे वन रेंज सिरमौर के रेंज अफसर देवेन्द्र अहिरवार ने भी अपने स्टाफ के साथ शाम 4:30 के बाद घाट के नीचे परेड लगाई तो उन्होंने ने भी अपना अनुभव शेयर किया और कहा की अब रेस्क्यू कठिन होगा और पहले गोवंशों का इलाज और पोषण किया जाना आवश्यक होगा.

   सवाल यह है की इलाज और पोषण की व्यवस्था पशु चिकित्सा विभाग द्वारा ही कराया जाएगा लेकिन जिस प्रकार पशु चिकित्सा विभाग का गैर जिम्मेदाराना पूर्ण रवैया सामने आ रहा है और स्वयं भी कोई रुचि नहीं ली जा रही है उससे स्पष्ट है की यह विभाग मात्र अपने मजे के लिए जनता की गाढ़ी कमाई से प्राप्त टैक्स के पैसे का उपयोग कर रहे हैं इनकी अपने कर्तव्यों के प्रति कोई निष्ठा शेष नहीं बची है.

 

पशु चिकित्सा डिग्रीधारी रीवा कलेक्टर इलैयाराजा टी के जिले में गोवंशों की यह दुर्दशा

 

शायद यह बात कम लोगों को ज्ञात होगी की रीवा कलेक्टर डॉक्टर इलैयाराजा थान्गामुत्थू स्वयं भी एक पशु चिकित्सक हैं. कलेक्टर इलैयाराजा ने तमिलनाडु के पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, वेटरनरी कॉलेज और रिसर्च इंस्टिट्यूट चेन्नई, मद्रास वेटरनरी कॉलेज जैसे पशु चिकित्सा से जुड़े बड़े संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त की है लेकिन उनकी इस शिक्षा का कोई लाभ गोवंशों को मिल नहीं रहा है. गौशालाओं के निर्माण को लेकर उन्होंने रीवा कलेक्ट्रेट कार्यालय के गेट पर एक ढांचा रखा था लेकिन वह भी अब साइड में कर दिया गया है और शायद यह भी अब एक दिखावे तक ही सीमित रह गया है. सवाल यह है यदि स्वयं पशु चिकित्सक रहे डॉक्टर इलैयाराजा टी के जिले में गोवंशों की यह दुर्दशा होगी तो बांकी की क्या स्थिति होगी. डॉक्टर इलैयाराजा टी को इस मामले की जानकारी पहले दिन से है. उन्होंने शिवानंद द्विवेदी के आवेदन को सिरमौर एसडीएम नीलमणि अग्निहोत्री को फॉरवर्ड कर दिया. नीलमणि स्वयं भी कभी मौके पर नहीं पहुंचे. मात्र कार्यालय में बैठकर ही डीलिंग और आदेश देते रहे. इन अधिकारियों की आदेशों का इनके कनिष्ठों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा. मामला तब तूल पकड़ा जब मीडिया एक्टिव हुई और पूरे देश की मीडिया में मामले की खिंचाई हुई.

 

 

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी ट्वीट कर मामले को बताया गंभीर

 

      मामला एक बार फिर तूल पकड़ा जब मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और वर्तमान राज्यसभा सांसद ने ट्वीट कर इसे काफी गंभीर बताया और 150 गोवंशों को 2 हज़ार फीट गहरी रेहवा घाटी के नीचे धकेले जाने को लेकर भाजपा सरकार को घेरा. हालाँकि इस विषय पर स्वयं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने कई इंटरव्यू देकर सत्ताधारी पार्टियों द्वारा गाय के नाम पर की जा रही वोट बैंक की राजनीति को आड़े हांथों लेते हुए जमकर खिचाई की. उन्होंने कहा की चाहे वह कांग्रेस की सरकारें रही हों अथवा भाजपा की सभी ने मिलकर भारत में गायों की दुर्दशा और ह्त्या को बढ़ावा ही दिया है. जहाँ कांग्रेस ने स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर आज तक अंग्रेजों की बीफ निर्यात की नीति को आगे बढ़ाया वहीं  भाजपा सत्ता में आने के बाद बूचड़खानों को करोड़ों की सब्सिडी देकर गोहत्या में एक नया आयाम स्थापित किया. यह सब अत्यधिक दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है. लेकिन जिस प्रकार भारत में गोवंश आज मारे-मारे फिर रहे हैं और उनके प्रति सामाजिक संवेदनशीलता भी समाप्त होती जा रही है इससे जाहिर है भारत में गोवंशों की अब कोई कद्र नहीं रह गयी और उनका जीवन संकट बढ़ना तय है.

19 अक्टूबर 8 वें चरण का रेस्क्यू अभियान भी पोषण और इलाज तक ही रहा सीमित

   इस बीच 19 अक्टूबर 2021 को भी रेस्क्यू अभियान चलाया गया और सुबह से ही पशु चिकित्सा से जुड़ें गोसेवक, डिप्टी रेंजर वन अमला एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी के साथ रेहवा घाटी सिरमौर वन परिक्षेत्र 2 हज़ार फीट गहरी घाटी के नीचे पहुंचे और दो घायल गोवंशों का इलाज किया गया. एक गाय मौके पर मृत पाई गयी. शेष लगभग दर्जन भर गायें रेस्क्यू नहीं की जा सकीं. उपस्थित वन अमले के कर्मचारी और कुछ गोसेवक गायों को वापस चढाने का प्रयास किया लेकिन वह बीच घाटी से ही लौट गए. गौरतलब है की रेहवा घाटी में कई स्थान काफी कठिन होने से गोवंश चढ़ पाने में असमर्थ रहते हैं. वहां रास्ता बनाया जाना आवश्यक है लेकिन वन विभाग के अधिकारियों द्वारा बताया गया की यदि रास्ता बनाया जाता है तो जंगल की कटाई बढ़ जायेगी इसलिए वहाँ रास्ता नहीं बनाया गया. अब सवाल यह है इस प्रकार से रीवा जिले की कई घाटियों में पशु क्रूरता कैसे बंद की जाए? ज्यादातर घाटियाँ वन विभाग के अंतर्गत आती हैं जिसमें विभाग की जिम्मेदारी बनती है की इस प्रकार की वारदातों को रोंके और कार्यवाही करें.

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