MP//Rewa// गले में हलाहल विष धारण करने के कारण शिव हुए नीलकंठ // कैथा में शिवमहापुराण कथा का तीसरा दिन।।

पावन पुनीत यज्ञस्थली कैथा श्रीहनुमान-श्रीशिव मंदिर प्राँगण में आयोजित 11 दिवशीय श्रीशिवमहापुराण कथा का तीसरा दिन रहा. इस बीच नारद द्वारा परमात्मा प्राप्ति के लिए तपश्या करना, नारद की तपश्या से भयभीत होकर इंद्र द्वारा कामदेव को भेजना और उनकी तपश्या भंग करना, शिव पूजन के महत्व, पार्थिव शिवलिंग ज्योतिर्लिंग के पूजन की कथा, सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग का पूजन ब्रह्मा विष्णु द्वारा किया जाना, सृष्टि रचना की कथा, रौद्री शक्ति कथा, शंकर पार्वती द्वारा भक्तों के कल्याणार्थ दर्शन देना आदि विभिन्न पौराणिक कथा प्रसंग की चर्चा आयी.
पार्थिव पूजन की महत्व
आचार्य डॉक्टर श्री गौरीशंकर शुक्ला जी ने बताया की भगवान शिव के पार्थिव शिवलिंग के पूजन का बड़ा ही महत्व है. बताया गया की सर्वप्रथम ब्रह्मा एवं विष्णु द्वारा पार्थिव शिवलिंग का पूजन कार्य किया गया था और उसके महत्व को बताया गया था. शिवलिंग का पूजन कई प्रकार से किया जाता है जिसमे लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गन्ने के रस से एवं मधु से, संतान आदि की प्राप्ति के लिए गौ के दुग्ध से, ग्रह आदि शांति के लिए कुस के रस मिश्रित जल से, वृष्टि बरसात आदि के लिए गंगाजल से, पशु आदि की कामना के लिए दही से, और समस्त कामनाओं के लिए इनकी मात्रा अलग अलग रहती है ऐसा शास्त्रों द्वारा बताया गया है.
गले में हलाहल विष धारण करने के कारण शिव हुए नीलकंठ
आचार्य जी ने बताया की भगवान शिव त्याग की प्रतिमूर्ति हैं. समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से एक विष भी था जिसे ग्रहण करने के लिए सम्पूर्ण देवी देवता पलायन कर जाते हैं और सभी त्राहि त्राहि करने लगते हैं क्योंकि किसी भी देव दानव में इतना सामर्थ्य नही रहता की वयह इस हलाहल विष को संभाल सकें. सब देवी देवता दानव दैत्य आदि ब्रह्मा एवं विष्णु जी के पास जाते हैं और इसका समाधान पूंछते हैं. समाधान में ब्रह्मा जी ने बताया की भगवान शिव के पास जाकर ही इसका समाधान मिल सकता है बांकी इस सृष्टि में कोई इसे संभालने वाला नही है. इस प्रकार सभी देवी देवता शिवजी के पास पहुचते हैं और व्यथा कथा सुनाते हैं. भूतभावन सर्वज्ञ भगवान शिव अपनी अन्तरचक्षु से सब देख लेते हैं और कहते हैं की इस सृष्टि के बचाव के लिए इस विष को वह अपने कंठ में धारण करेंगे. इस प्रकार भगवान शिव हलाहल विष को अपने गले में धारण कर ब्रह्मांड को नष्ट होने से बचाते हैं और स्वयं नीलकंठ बन जाते हैं. भगवान शिव से भक्तों को यही प्रेरणा लेनी चाहिए की जीवन की कड़वाहट रूपी विष को गले में समाहित करते हुए ब्रह्मांड को प्रेम करुणा दया प्रदान किया जाय.

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