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MP//Rewa// पीएचसी और सीएचसी को करें मजबूत, जिला आपदा प्रबंधन से सम्बंधित लगाएं आरटीआई – डॉक्टर धीरेंद्र मिश्रा// कोविड 19 के दौरान संक्रमित डॉक्टर का विकल्प नही मिल पा रहा, मानव शक्ति का भारी अभाव // 45 वें राष्ट्रीय वेबिनार पर कोरोना महामारी से उपजी कई परिस्थितियों पर हुई चर्चा, सूचना आयुक्त राहुल सिंह की अध्यक्षता में हुआ आयोजन//

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कोरोना लॉक डाउन के समय भारत में चिकित्सा और फार्मास्यूटिकल के क्षेत्र में व्यापक अनियमितता देखी गई है। पर्याप्त और उचित मात्रा में दवा, ऑक्सीजन, हॉस्पिटल फैसिलिटी, इंजेक्शन उपलब्ध न हो पाना और साथ में इसकी कालाबाजारी जैसे मामले प्रकाश में आए। कोरोना लॉकडाउन के समय देखा जाए तो भारत में मेडिकल क्षेत्र में व्यापक कमियां उजागर हुई है। 

      सूचना के अधिकार से भी जोड़ा जाना उचित होगा क्योंकि जिस प्रकार वर्ष 2005 में आरटीआई कानून आने के आज 16 वर्ष पूरे होने वाले हैं और इस दौरान कानून की मंशा अनुरूप धारा 4 के प्रावधान प्रशासकीय विभागों में लागू न हो पाना भारत में आरटीआई कानून की असफलता को दर्शाता है। यदि देखा जाए तो इसके पीछे सरकार की लालफीताशाही, ब्यूरोक्रेसी और व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार प्रमुख कारण है जिसके चलते ऊपर बैठे लोग और नेता मंत्री नहीं चाहते कि उनके भ्रष्टाचार सामने आएं। इसी बात को लेकर कोरोना का सिस्टम और। पारदर्शिता विषय पर 2 मई 2021 को 45 वें राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया जिसमें कई वरिष्ठ विशेषज्ञों ने अपनी बातें रखी। रीवा संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल से मनोविज्ञान विज्ञान विभाग के मनोचिकित्सक डॉक्टर धीरेंद्र मिश्रा ने बताया कि आजकल सभी डॉक्टर्स की एक ही जिम्मेदारी हो गई है कि वह कोरोना के पेशेंट को ही ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। चाहे वह स्पेशलिस्ट है या सामान्य डॉक्टर सभी की जिम्मेदारी कोविड-19 में तय कर दी गई है। इसके चलते सामान्य बीमारी का इलाज करने का समय नहीं रहता है। रीवा के अस्पतालों की बात करें तो स्थिति काफी चिंताजनक है। रीवा के संजय गांधी अस्पताल में बाहरी जिलों से भी मरीज आ रहे हैं इसलिए लोड बढ़ रहा है और बिस्तर भी कम पड़ रहे थे। रीवा में छिंदवाड़ा आदि जिलों से भी मरीज आ रहे हैं। यदि दिल्ली महानगर की बात करें तो वहां स्थिति और अधिक खराब हो रही है। रीवा सरकारी अस्पताल में संसाधनों की कमी के चलते स्क्रीनिंग और जांच के बाद पाई जाने वाली गंभीरता के आधार पर यह सुनिश्चित किया जाता है कि ऑक्सीजन बेड और अन्य संसाधनों का वितरण किस प्रकार किया जाए। डॉक्टर मिश्रा ने बताया कि यदि ऑक्सीजन की बात करें तो वह उन मरीजों को उपलब्ध कराया जाता है जिन्हें इसकी सर्वाधिक आवश्यकता होती है।  रीवा के संजय गांधी अस्पताल के आईपीडी में कौन सी मंजिल पर किस नंबर का बिस्तर खाली है यह टोकन प्रक्रिया के माध्यम से जारी किया जाता है। डॉक्टर ने कहा कि कई बार आईसीयू बेड की उपलब्धता न हो पाने के कारण वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाता है जिससे मरीज को एक सहारा जरूर मिल जाता है। पहले अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी होती थी और मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने से पहले सोचना पड़ता था। लेकिन अब पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन प्लांट से ऑक्सीजन मिलने के कारण कम दिक्कतें हो रही है। बेड की उपलब्धता होने के बावजूद भी मरीजों की भर्ती उसी आधार पर की जाती है जहां ऑक्सीजन उपलब्धता सुनिश्चित हो। हमारे पास 600 बिस्तर हैं और डिस्चार्ज रेट 50 से 60 तक प्रतिदिन रहता है लेकिन मरीजों की आवक बढ़ने से उन्हें व्यवस्थित करने में काफी कठिनाई आ रही है।

  कोरोना के सामने अन्य बीमारियां जैसे हार्ड किडनी मरीजों की फजीहत 

     मनोचिकित्सक डॉक्टर धीरेंद्र मिश्रा द्वारा बताया गया कि कोविड-19 के दौरान सबसे बड़ी समस्या यह है कि अब पूरा अटेंशन कोविड 19 मरीजों की तरफ होने से सामान्य बीमारियों का इलाज ढंग से नहीं हो पा रहा है। डॉक्टर ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को हार्ट या किडनी की समस्या है तो इस समय समुचित इलाज उपलब्ध नहीं हो पा रहा है इसके पीछे का कारण यह है कि सामान्य वार्ड को भी कोविड-19 बदल दिया गया है जिससे दिक्कत आ रही है। कुल मिलाकर देखा जाए तो प्राथमिकताएं बदल गई हैं जैसे ही हमें ऑक्सीजन मिली है हम बिस्तरों की संख्या भी बढ़ा दिए हैं जो पहले 600 से बढ़कर लगभग 800 तक तैयार कर दिए गए हैं। परंतु इसके बावजूद भी हम एक सीमा तक ही बिस्तर बढ़ा सकते हैं। यदि हम रीवा की जनसंख्या देखें तो रीवा मेंयदि 10 प्रतिशत लोग कोविड-19 संक्रमित होते हैं और उनमें यदि देखा जाए तो यदि 1 प्रतिशत मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है तो यह व्यवस्था बना पाना बहुत मुश्किल पड़ जाएगा। डॉक्टर धीरेंद्र मिश्रा ने बताया कि वह यह नही कह सकते की पॉलिसी लेवल पर प्रशासनिक सोच कैसे काम कर रही है लेकिन धरातल पर वर्तमान स्थितियों में देखा जाए तो काफी अच्छा प्रयास किया जा रहा है। 

   कोविड 19 के दौरान संक्रमित डॉक्टर का विकल्प नही मिल पा रहा, मानव शक्ति का अभाव

     डॉक्टर मिश्रा ने बताया कि यह तो ठीक है कि बिस्तर और ऑक्सीजन बढ़ाई जा रही है क्योंकि वह वित्तीय व्यवस्था पर आधारित है लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत मैनपावर की आ रही है क्योंकि मानव शक्ति पर कोविड-19 प्रभाव डाल रहा है। डॉक्टर संक्रमित हो रहे हैं। यदि कोविड-19 में लगे हुए डॉक्टर संक्रमित हो जाते हैं तो उनका रिप्लेसमेंट विकल्प नहीं मिल पा रहा है। यह काफी बड़ी समस्या पैदा कर रहा है। सामान्यतया हम डॉक्टरों की 10 दिन के हिसाब से ड्यूटी रहती है और डॉक्टर इतना अधिक थक जाते हैं कि वह मरीज को प्रॉपर तरीके से केयर नहीं कर पा रहे हैं। कई बार किसी मरीज को आईसीयू बेड की जरूरत रहती है लेकिन हम उपलब्ध करा पाने में अक्षम रहते हैं क्योंकि सभी ओवरफुल रहते हैं। कभी-कभी प्रभावी व्यक्तियों की वजह से भी कंप्रोमाइज करनी पड़ती है क्योंकि यदि कोई बड़ा प्रशासनिक अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति फोन करता है कि उनके मरीज को बिस्तर उपलब्ध कराना है तो यह भी व्यवस्था बनानी पड़ती है। अस्पताल की स्थितियां ऐसी हैं की उन्हें पर्याप्त मात्रा में मास्क तक उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं जिसकी वजह से यदि डॉक्टरों को दिन में दो या तीन मास्क चाहिए तो नहीं मिल पा रहे हैं। यह सही है कि अस्पताल सभी को सुविधा उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं इसलिए हमें कुछ विशेष परिस्थितियों में प्राथमिकता के आधार पर कार्य करना पड़ रहा है। 

 कोविड 19 के इलाज से बेहतर है सुरक्षा और बचाव 

   डॉक्टर धीरेंद्र मिश्रा ने कहा की कोविड-19 की स्थिति में वह लोगों को यह सुझाव देना पसंद करेंगे कि इलाज से बेहतर सुरक्षा और बचाव करें। डॉक्टर ने कहा कि पिछले लॉकडाउन में मजदूरों के पलायन जैसी अव्यवस्था से उत्पन्न स्थितियों को अब तक की सबसे बड़ी मानव त्रासदी का नाम दिया गया। लेकिन आज जब हम अस्पताल के अंदर होते हैं और मरीजों की स्थिति देख रहे हैं तो हमें लगता है कि यह सबसे बड़ी मानव त्रासदी है। आज इस कोरोना समय में मीडिया को अस्पताल के अंदर आने की अनुमति नहीं दी गई है। डॉक्टर मिश्रा ने कहा कि हमें लगता है कि शायद यह बढ़िया निर्णय है क्योंकि जिस प्रकार अस्पताल के अंदर की स्थितियां हैं और यह मीडिया के माध्यम से यह विसुअल आम जनता के समक्ष यदि प्रस्तुत किया गया तो आम जनता यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। क्योंकि कई बार तो हमें स्वयं ही रात में नींद नहीं आती है।

  कोविड-19 से पीड़ित एक दंपति की कहानी काफी पीड़ादायक

    डॉक्टर धीरेंद्र मिश्रा ने कहा कि उनके सामने अभी हाल ही में एक कोरोना से पीड़ित पति पत्नी दांपत्य का मामला आया था जिसमें उसकी पत्नी  कोविड-19 के अंतिम स्टेज में थी और ऐसा लग रहा था कि उनको बड़े मुश्किल से 4 से 6 घंटे तक का ही समय था। साथ में उनके पति भी संक्रमित थे। ऐसे में डॉक्टर को लगा कि मानवता के आधार पर उन दोनों को एक जगह व्यवस्था कर दी जाए जिससे उनके अंतिम क्षणों में वह उनके साथ में रह सके। इसी प्रकार ऐसे पता नहीं कितने मामले प्रतिदिन आते हैं जिसमें पूरा का पूरा परिवार ही कोविड-19 संक्रमित रहता है और आइसोलेशन में होने के कारण एक-दूसरे की केयर तक नहीं कर पाते हैं। अन्य बीमारियों के मुकाबले कोविड-19 बीमारी सबसे दुखद बात यह है कि इसमे मरीज साथ में नहीं रह सकते। 

      डॉ मिश्रा ने कहा कि यदि इसे युद्ध काल की स्थिति कहा जाए तो गलत नहीं होगा बल्कि यह तो युद्ध काल की स्थित से भी बदतर है क्योंकि युद्ध तो बॉर्डर में होते हैं लेकिन कम से कम आपके गांव शहर और मोहल्ले सुरक्षित होते हैं। डॉक्टर ने कहा कि वह मानसिक रोग विशेषज्ञ हैं  और लोगों को सलाह देते हैं कि वह अपना संतुलन हमेशा बनाकर रखें। डॉक्टर ने कहा कि यद्यपि वह मनोवैज्ञानिक डॉक्टर हैं लेकिन कभी-कभी उन्हें स्वयं ही रात में सोने में दिक्कत होती है क्योंकि जिस प्रकार का नजारा होता है उसे पूरा मन मस्तिष्क हिल जाता है। डॉक्टर ने बताया कि वह स्वयं भी अपने मन में ऐसे विचार रखते हैं कि यदि उन्हें स्वयं ही कुछ हो गया तो उस स्थिति में उनके बच्चे और परिवार के लिए क्या व्यवस्था की जाए। इस प्रकार जो भी व्यक्ति फ्रंटलाइन वर्कर है और कोविड-19 के समय काम कर रहा है उसके लिए यह समय काफी चुनौतीपूर्ण है।

   पीएचसी और सीएचसी को करें मजबूत, जिला आपदा प्रबंधन से सम्बंधित लगाएं आरटीआई

   डॉ मिश्रा ने कहा की मेडिकल कॉलेज और संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल पर सामान्य तौर पर मरीजों को सीधे भर्ती करने के पहले पीएचसी और सीएचसी पर ले जाया जाना चाहिए जहां पर उपस्थित डॉक्टर उनका मेडिकल चेकअप और इलाज करें और जब व्यवस्था और इलाज संभव न हो उन स्थितियों में मेडिकल कॉलेज से संबंधित अस्पताल में भेजा जाना चाहिए। पीएचसी और सीएचसी पर मेडिकल फैसिलिटी बेहतर कर दी जाए और व्यवस्थाएं सुनिश्चित कर दी जाएं तो मेडिकल कॉलेज और संबंधित अस्पताल में ओवरलोड ओवर क्राउड होने से बच सकते हैं। इससे फायदा यह होगा कि जो वास्तव में काफी गंभीर किस्म के मरीज है वही हेड क्वार्टर आएंगे जिससे उनका बेहतर ढंग से इलाज हो पाएगा। सूचना के अधिकार कानून के विषय में आरटीआई कहां लगाई जाए इस विषय पर डॉ मिश्रा ने कहा की जिला आपदा प्रबंधन समिति की मीटिंग और वहां से की जाने वाली व्यवस्था बजट आवंटन वितरण और किए गए कार्यों के विषय में आरटीआई लगाकर जानकारी प्राप्त की जा सकती

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