MP-Breaking – रेहवा घाटी में पशु क्रूरता की घटना के 24 दिन पूरे – घायल गायों का चल रहा इलाज और पोषण // कलेक्टर इलैयाराजा टी ने दो पशु मालिकों के विरुद्ध अब तक नहीं दर्ज कराई एफआईआर // रेहवा घाटी के नीचे मिले गायों के कान में लगाए गए टैग से सामने आया दोनों पशु मालिकों का नाम// सोनवर्षा-लालगांव के हैं दोनों पशु मालिक, मप्र गोवंश वध प्रतिषेध अधिनियम ने तहत प्रकरण दर्ज कराये जाने की माग//
जिला रीवा अंतर्गत सिरमौर वन परिक्षेत्र के सरई बीट अंतर्गत रेहवा घाटी में 27 एवं 28 सितंबर 2021 के दरमियान भीषण पशु क्रूरता कारित की गई थी जिसमें लगभग 150 की संख्या में गोवंशों को 2000 फीट से अधिक गहरी घाटी में जबरन धकेला गया था। इसके बाद जानकारी मिलने पर औपचारिक तौर पर सामान्य धाराओं में एफ आई आर दर्ज की गई और मामला वहीं शांत कर दिया गया लेकिन जैसे ही सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी की नजर पूरे मामले में पड़ी और फरियादी संजय महापात्र निवासी लालगांव के द्वारा जानकारी दी गई और बताया गया कि पुलिस और जिला प्रशासन मामले को दबाने में लगा हुआ है और कोई कार्यवाही नहीं कर रहा है। ऐसे में सामाजिक कार्यकर्ता ने मोर्चा संभाला और मामले को उच्च स्तर एवं मीडिया तक पहुंचाया इसके बाद प्रशासन की कानों में जूं रेंगी और तब जाकर रेस्क्यू किए जाने की कार्यवाही शुरू हुई।
रेस्क्यू किये गए गोवंशों को प्रशासन ने भी छोड़ा ऐरा
इस रेस्क्यू ऑपरेशन में अब तक कुल 9 चरण पूरे हो चुके हैं और 104 गोवंशों को घाटी के ऊपर निकाला जा चुका है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि रेस्क्यू किए गए गोवंश के पोषण और पुनर्वास के लिए न तो पंचायत विभाग द्वारा न तो पशुपालन विभाग द्वारा और न ही जिला प्रशासन के द्वारा कोई प्रयास किए गए और पुनः निकाले गए गोवंशों को बेसहारा छोड़ दिया गया। इस बीच जब प्रशासन पर दबाव बढ़ाया गया तो रो-गाकर किसी तरह एन केन प्रकारेण पशु चिकित्सा विभाग, पंचायत विभाग और जंगल विभाग हरकत में आया और सामाजिक कार्यकर्ता के साथ मदद का हाँथ बढ़ाया। लेकिन घाटी गहरी, टेढ़ी-मेढ़ी और खतरनाक होने के चलते शेष बचे हुए लगभग एक दर्जन गायों को घाटी के ऊपर निकाला जाना काफी मुश्किल पड़ रहा है। सबसे बड़ी समस्या इस बात की है की इनमें से शेष बची हुई ज्यादातर गायें कमजोर, बीमार, घायल और टूटी फूटी है जिसकी वजह से उनका पोषण और इलाज किया जाना आवश्यक है। अब यह गोवंश स्वयं घाटी के ऊपर चढ़ा पाने में असमर्थ हैं। दिनांक 20 अक्टूबर 2021 को एक्टिविस्ट द्विवेदी की सूचना पर अनुविभागीय एवं दंडाधिकारी सिरमोर नीलमणि अग्निहोत्री के द्वारा पशु चिकित्सा विभाग के डॉक्टर और गौ सेवक भेजे गए। हालांकि नीलमणि अग्निहोत्री को पर्याप्त मात्रा में लगभग 5 से 6 बोरी प्रतिदिन भूसा उपलब्ध कराने हेतु एवं पोषण के लिए अन्य व्यवस्था हेतु भी एक्टिविस्ट द्विवेदी के द्वारा मांग की गई थी परंतु इसके बावजूद भी गोवंशों के बेहतर पोषण हेतु कोई व्यवस्था नहीं की गई जिसकी वजह से वह दिन प्रतिदिन कमजोर होते जा रहे हैं। पिछले कई दिनों से लगभग दर्जनभर गोवंश मर भी चुके हैं जिनके पंचनामा भी प्रतिदिन बन रहे हैं। यह वही गोवंश हैं जो घाटी के नीचे धकेल दिए गए थे और जिनको चोट लग गई थी जिसके कारण उनके घाव में कीड़े पड़े, भोजन-पानी की समुचित व्यवस्था न होने से कमजोर पड़ कर मर गए। क्योंकि गोवंश मानवीय समाज में रहते हैं इसलिए जंगल की आबोहवा भी इन्हें सूट नहीं करती है जिसकी वजह से भी भीषण घनघोर जंगल के अंदर जंगली जानवरों के भय के बीच यह बहुत बेहतर महसूस नहीं कर रहे हैं जिसकी वजह से भी यह कमजोर होकर मर रहे हैं। यदि इन्हें सुरक्षित नहीं निकाला गया तो एक-एक कर इनका मरना तय है।
घटना के 24 वें दिन एक अन्य गाय का भी हुआ इलाज, पैर के गहरे घाव में पड़े थे कीड़े
दिनांक 20 अक्टूबर 2021 को गौ सेवक संतोष साकेत एवं ग्रामवासी लालबहादुर पटेल, महेश पटेल के साथ सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी घाटी के नीचे लगभग 11 बजे सुबह पहुंचे और पाया कि लगभग 7 गोवंश जिनमें से 5 गायें और दो बछड़े थे वहीं पर एक जंगली झरने के पास एकत्रित थे। हालांकि इनमें वह दो गाय नहीं थी जिसका इलाज पिछले दिनों 19 अक्टूबर को डॉक्टर द्वारा किया गया था। इस बीच इनमें दो गाय ऐसी मिली जिनमें एक की पूंछ कटी हुई थी और पैर में घाव थे एवं दूसरी गाय के दाहिने निचले पैर में घुटने के पास बहुत गहरा घाव था जिसमें कीड़े पड़े हुए थे। यह दोनों गाय इसके पहले नहीं देखीं गयीं थीं और संभवतः झाड़ियों के बीच में घुसी रही होंगी जिनका उपस्थित गौ सेवक संतोष साकेत ने मलहम पट्टी और दर्द-मल्टीविटामिन इंजेक्शन लगाकर इलाज किया। दिनांक 20 अक्टूबर को मानसेवी वनकर्मी बाबूलाल यादव के द्वारा अपने घर से अपनी स्वेच्छा से एक बोरी भूसा ले जाया गया था जिसे वहीं पर कमजोर गायों के लिए डाल दिया गया. यद्यपि यह भूसा अपर्याप्त था और गोवंशों की संख्या के मुताबिक कम से कम पांच से छः बोरी भूसा प्रतिदिन डाला जाना चाहिए था जिसकी मांग भी की गई थी।
जिम्मेदार पशु-पशुपालकों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज किये जाने की मांग
इस पूरे मामले में एक सबसे महत्वपूर्ण बात जो सामने आई है वह यह है कि कई गोवंश ऐसे देखे गए हैं जिनके कानों में पशु चिकित्सा विभाग द्वारा लगाया गया टैग देखा गया है और उसकी विधिवत फोटो और वीडियो भी बना कर जिला कलेक्टर डॉक्टर इलैयाराजा टी, पशु चिकित्सा अधिकारी एवं एसडीएम सिरमौर नीलमणि अग्निहोत्री को भेज दी गई है और उनसे मांग की गई है कि दोनों पशुपालकों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करवाई जाए और उनसे पूछा जाए कि आखिर उनकी यह गायें 2000 फीट गहरी घाटी के नीचे कैसे पहुंची हैं ? इसमें यह बात स्पष्ट हो जाएगी की या की पशुपालकों ने स्वयं इन गायों को घाटी के नीचे धकेला अथवा कोई अन्य व्यक्ति जो भी इन्हें घाटी के नीचे धकेला वह कौन था इसकी भी जानकारी पशुपालकों से उपलब्ध हो जाएगी। जिला प्रशासन और पुलिस द्वारा अभी तक इस विषय पर कोई कार्यवाही नहीं की गई है जिससे साफ स्पष्ट है कि जिला प्रशासन स्वयं नहीं चाहता कि पशुओं के साथ बढ़ रही क्रूरता कम हो और यह भी स्पष्ट हो गया है कि सरकार के द्वारा करोड़ों-अरबों रुपए खर्च कर पशुओं के कानों में लगाया गया टैग जिससे की उस पशु मालिक को आईडेंटिफाई किया जाए वह भी फीका पड़ रहा है।
आवारा छोड़ने वाले पशु पलकों पर कार्यवाही नहीं ही तो पशु क्रूरता की घटना को रोक पाना मुश्किल
आखिर सवाल यह है कि यदि पशुपालकों के ऊपर कार्यवाही नहीं की गई तो यह पशु क्रूरता कैसे बंद होगी? पशुपालक अमूमन दूध खाने के बाद गायों को आवारा छोड़ देते हैं जिसके कारण यह जाकर किसी के खेत में नुकसान करती हैं और ऐसे में अक्सर पशु क्रूरता बढ़ती हुई देखी गई है। एक बात और भी सामने आ रही है जिसमें गायों को सड़क के किनारे एकत्रित देखा गया है और हाई वे पर चलने वाले तेज और भारी वाहनों के द्वारा उन्हें रौंद दिया जाता है और वह वहीं पर मर जाते हैं। यदि इन पशुपालकों के विरुद्ध कार्यवाही होने लगे और एफआईआर दर्ज कर जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया जाए तो निश्चित तौर पर मवेशियों को बेसहारा और आवारा छोड़ने की प्रथा पर भी लगाम आएगा और पशु क्रूरता भी बंद होगी।


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