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MP breaking- 9 साल से बर्खास्त सहायक यंत्री के कंधे पर भ्रष्टाचार की कमान// रीवा के जवा ब्लॉक में पदस्थ अमूल्य खरे 4 वर्ष से कर रहा अवैतनिक कार्य // तत्कालीन कलेक्टर एस एन रूपला ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सहायक यंत्री अमूल्य खरे को किया था बर्खास्त // मात्र 31 मार्च 2013 तक के हाईकोर्ट स्थगन के बाद कैसे पंचायत विभाग में भ्रष्टाचार फैला रहा अमूल्य खरे?

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जनता को यह जानकर ताज्जुब होगा कि यदि कोई संविदा कर्मचारी है और वह बर्खास्त हो जाता है तो उसके लिए संविदा बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं और वह अपने रिटायरमेंट तक नौकरी कर सकता है। मात्र शर्त यह होती है कि संविदा कर्मचारी को भ्रष्टाचार करना होता है और बर्खास्त होने के फिर कोर्ट में जाकर महीने दो महीने के लिए स्थगन लेकर आना होता है। वह स्थगन फिर अनंत समय तक चलता रहता है। 

    मामला कुछ ऐसा ही रीवा जिले का है जिसमें ग्रामीण यांत्रिकी सेवा संभाग रीवा में पदस्थ सहायक यंत्री अमूल्य खरे को संविदा शर्तों के आधार पर सहायक यंत्री के पद पर नियुक्त किया गया था। इनकी पदस्थापना रीवा जिले के रीवा, रायपुर कर्चुलियान और नईगढ़ी में सबसे अधिक रही। अन्य ब्लॉक में भी समय-समय पर इनकी पदस्थापना हुई है। जबकि संविदा नियमों में जहां के लिए संविदा अवधि होती है मात्र वहीं पदस्थापना होती है अन्यत्र नहीं की जा सकती।

जानें क्या है पूरा मामला

  तत्कालीन रीवा कलेक्टर एसएन रूपला के द्वारा एक जांच में तत्कालीन सहायक यंत्री अमूल्य खरे को दोषी पाया जाता है। मामला रीवा जिले के नईगढ़ी जनपद का था जहां ग्राम पंचायत भरिगवां के निर्माण कार्य में व्यापक तौर पर अनियमितता और भ्रष्टाचार पाए जाने पर तत्कालीन सहायक यंत्री अमूल्य खरे की दिनांक 01.04.201214 से लेकर 31.03.2013 के दौरान की संविदा को समाप्त कर दिया गया।

हाई कोर्ट का स्थगन आदेश मात्र 31 मार्च 2013 तक

  इसके बाद जैसा कि सभी मामलों में होता है तत्कालीन सहायक यंत्री अमूल्य खरे के द्वारा हाई कोर्ट जबलपुर में रिट पिटिशन दायर की गई। इस रिट क्रमांक 2033/2013(एस) दिनाँक 08.02.2013 में पिटिशन में इस रिट मैं हाईकोर्ट ने सहायक यंत्री अमूल्य खरे को राहत देते हुए मात्र 31 मार्च 2013 अर्थात उसकी वार्षिक संविदा समाप्ति की अवधि तक किसी भी प्रकार की कार्यवाही न करने के लिए मध्यप्रदेश शासन को आदेश दिया। पर यह आदेश विशेष तौर पर मात्र 31 मार्च 2013 तक के लिए ही था।

सीईओ जिला पंचायत एवं कलेक्टर रीवा ने 5 साल तक हाई कोर्ट में नहीं किया जवाब पेश

  अभी तक तो मात्र ट्रेलर था और खेल यहां से चालू हुआ। अमूल्य खरे के द्वारा सरकारी तौर पर सांठगांठ करते हुए सीईओ जिला पंचायत रीवा और कलेक्टर रीवा कार्यालय में फाइल को दबबा दिया गया। इस प्रकार जिस हाई कोर्ट जबलपुर ने 4 सप्ताह के भीतर मध्यप्रदेश शासन अर्थात सीईओ जिला पंचायत एवं जिला कलेक्टर रीवा से जवाब मांगा था वह जवाब अगले 5 साल तक नहीं दिया गया। जब मामला पुनः उठा और अमूल्य खरे का भ्रष्टाचार फैलता नजर आया तो कुछ शिकायतकर्ताओं ने जिला पंचायत सीईओ, जिला कलेक्टर रीवा आदि को अमूल्य खरे के विषय में शिकायत की और कहा कि एक बर्खास्त सहायक यंत्री किस हैसियत से काम कर रहा है और उसे पेमेंट क्यों दी जा रही है? क्या हाई कोर्ट के द्वारा अमूल्य खरे को नियमित किए जाने और संविदा बढ़ाए जाने का कोई आदेश है? मामले पर पेपरबाजी भी हुई जिसकी वजह से तत्कालीन अधीक्षण यंत्री ग्रामीण यांत्रिकी सेवा अजीम खान एवं सीईओ जिला पंचायत रीवा के द्वारा वर्ष 2018-19 में सहायक यंत्री अमूल्य खरे की पेमेंट रोक दी गई और उसे अवैतनिक कार्य करने के लिए छोड़ दिया गया। मामला यहां से गड़बड़आया क्योंकि किस आधार पर 2013 से लेकर 2018 तक पेमेंट दे दी जा रही थी और फिर किस आधार पर 2018-19 के बाद पेमेंट बंद कर दी गई? जाहिर है हाईकोर्ट ने मात्र तत्कालीन संविदा अवधि 1 अप्रैल 2012 से लेकर 31 मार्च 2013 के लिए मात्र स्थगन दिया था न कि अनंत समय के लिए।

 संविदा कर्मी बर्खास्तगी के बाद पाते हैं परमानेंट पोस्ट

  तमाशा यहां भी देखिए की एक संविदा कर्मी जो कोई गलती नहीं करता अथवा भ्रष्टाचार नहीं करता उसे नियमन संविदा अवधि पूर्ण होने के बाद संविदा शर्तों के आधार पर उसके सीआर के आधार पर संविदा बढ़ाई जाती है। लेकिन यदि वही संविदा कर्मी भ्रष्टाचार और अनियमितता करें उस स्थिति में उसकी बर्खास्तगी के बाद यदि वह कर्मी हाईकोर्ट से स्थगन लेकर के आ जाए तो फिर संविदा बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती और वह परमानेंट हो जाता है। है न अजीबोगरीब दास्तां। ये कैसा नियम है क्या इस विषय में जिला पंचायत जिला कलेक्टर अथवा संभागायुक्त जवाब दे सकते हैं? जब स्वयं हाईकोर्ट ने स्पष्ट तौर पर उल्लेख करते हुए यह लेख किया था कि संविदा मात्र 31 मार्च 2013 तक ही रहेगी और मात्र इस दिनांक तक के लिए ही स्थगन है तो सवाल यह है जिला पंचायत रीवा एवं जिला कलेक्टर रीवा के साथ-साथ संबंधित विभागों ने किस आधार पर 31 मार्च 2013 के बाद अमूल्य खरे को सहायक यंत्री पद पर रखा और बिना संविदा बढ़ाए हुए किस आधार पर पेमेंट दी और फिर शिकायत के बाद एक बार पुनः वर्ष 2018-19 के बाद क्यों पेमेंट बंद कर दी और अब अवैतनिक कार्य करने के लिए रखा?

 कोई भला कैसे बिना वेतन के इतने समय तक कार्य कर सकता है?

  यहां पर बड़ा सवाल यह है कि मध्य प्रदेश शासन द्वारा जिला कलेक्टर रीवा एसएन रूपला के संविदा समाप्ति के आदेश के विरुद्ध जब स्वयं अमूल्य खरे हाई कोर्ट जबलपुर में स्थगन लेने गया तो फिर उसने इस मामले की पैरवी क्यों नहीं की क्योंकि न्याय तो अमूल्य खरे को जल्दी चाहिए था? मामला साफ है क्योंकि यदि अमूल्य खरे पैरवी करेगा तो केस हारेगा और यदि मामला हाईकोर्ट में चलता रहेगा और मध्य प्रदेश शासन के द्वारा कोई जवाब प्रस्तुत नहीं किया जाता तो जैसा कि ज्यादातर मामलों में चलता है हाईकोर्ट के मामले अनंत समय तक चलते रहते हैं। यदि इस मामले में वर्ष 2018-19 में अमूल्य खरे की पेमेंट रोक दी गई तो अर्जेंट याचिका अमूल्य खरे को लगाना था लेकिन अमूल्य खरे को पता था कि इस मामले को जितना दबा रहने दे उतना ही अच्छा है क्योंकि यदि मामला जल्दी सुनवाई में आया तो अमूल्य खरे केस हारेगा क्योंकि भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितता का तथ्यात्मक और प्रमाणित मामला था। इसलिए भारत की घटिया न्याय प्रणाली और अत्यंत धीमी न्याय प्रणाली का फायदा उठाते हुए अमूल्य खरे ने किसी भी प्रकार से मामले को उठाना बेहतर नहीं समझा और न्याय प्रणाली कछुए की चाल से चलती रही। यह बात सबको पता है की पंचायत विभाग में किसी सहायक यंत्री या यहां तक कि रोजगार सहायक को भी पेमेंट लेने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि यहां इतना अधिक भ्रष्टाचार है कि बिना पेमेंट के ही कई गुना कमाया जा सकता है। और सवाल यह है कि जो एक बार भ्रष्टाचार में फंस चुका है तो फिर चाहे वह कितने भी भ्रष्टाचार करें क्या फर्क पड़ता है?

 सीईओ जिला पंचायत और जिला कलेक्टर रीवा की पूरे मामले में क्या भूमिका है?

   अब देखिए सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अमूल्य खरे के प्रकरण में जब 31 मार्च 2013 तक का ही स्थगन हाई कोर्ट जबलपुर के द्वारा दिया गया तब सीईओ जिला पंचायत रीवा एवं जिला कलेक्टर रीवा के द्वारा तत्काल हाई कोर्ट में जवाब पेश क्यों नहीं किया गया? क्यों मामले की पैरवी नहीं की जाती? क्योंकि इन सब की सह है। किसी भी शिकायतकर्ता के द्वारा शिकायत किए जाने पर बड़े मुश्किल से जांच और कार्यवाही होती है लेकिन यह तथ्य है कि कोई भी उच्च अधिकारी चाहे वह सीईओ जिला पंचायत हो अथवा जिला कलेक्टर हो कभी भी किसी भी इंजीनियर अथवा सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध मन से कार्यवाही नहीं करता है। यहां तक की स्थगन लाने के आइडियाज भी सीईओ जिला पंचायत और जिला कलेक्टर कार्यालय से ही दिए जाते हैं। और पूरा मामला लेनदेन कर सेटल कर लिया जाता है। यह कोई आरोप नहीं है बल्कि सच्चाई है क्योंकि सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने सीईओ जिला पंचायत कार्यालय रीवा में आरटीआई लगाकर यह जानना चाहा था कि सीईओ जिला पंचायत रीवा एवं अन्य के द्वारा जो न्यायिक प्रकरण कोर्ट से संबंधित मामले हैं उनकी वर्तमान में क्या स्थिति है? अर्थात वह डिस्पोज़ हो चुके हैं अथवा चल रहे हैं? कब जवाब पेश हुआ? और उनकी क्या स्थिति है? इस आरटीआई में जो जवाब सामने आया वह बहुत ही चौकाने वाला था। यहां सीईओ जिला पंचायत कार्यालय के द्वारा एक सूची उपलब्ध करवाई गई जिसमें वर्ष 2013-14 से मामले पेंडिंग पड़े हुए हैं जिनमें आज तक सीईओ जिला पंचायत के द्वारा जवाब ही पेश नहीं किए गए। इनके द्वारा बनाए गए ऑफिसर इंचार्ज ने जवाब पेश किया अथवा नहीं किया इसका पता सीईओ जिला पंचायत को नहीं है और न ही जिला कलेक्टर को है। 

    अब सवाल यह है कि जब मामला न्यायिक प्रणाली में जाता है और हाईकोर्ट में उसका जवाब समय पर पेश नहीं होगा और शासन प्रशासन की तरफ से पैरवी नहीं होगी तो भला इन भ्रष्टाचारियों पर कैसे समय पर कार्यवाही होगी? पता नहीं कितने ऐसे अमूल्य खरे जैसे भ्रष्टाचारी हैं जिनकी सेवा समाप्त कर दी गई या की जुर्माना लगाया गया या बर्खास्त किया गया लेकिन इसी लूप होल का फायदा उठाकर और शासन-प्रशासन के अंदरूनी लेन-देन और सेटलमेंट का फायदा उठाकर यह अभी भी पद में बने हुए हैं और जितना भ्रष्टाचार कर रहे थे उससे कहीं कई गुना अधिक भ्रष्टाचार कर रहे हैं क्योंकि एक बार डर रहता है कि कोई गलती न हो लेकिन जब फस गए और भ्रष्टाचार प्रमाणित हो गया तो चाहे वह एक भ्रष्टाचार करें अथवा 100 भ्रष्टाचार करें क्या फर्क पड़ता है।

 जवा में पदस्थ बर्खास्त एई अमूल्य खरे अमृत सरोवर योजना में अब कर रहा है भ्रष्टाचार

  भारत और मध्य प्रदेश सरकार की नरेगा योजना के तहत रीवा जिले में बनाए जा रहे लगभग 115 अमृत सरोवर के हालात यह हैं कि सारा काम मशीनों जेसीबी और यंत्रों से किया जा रहा है जबकि फर्जी मस्टररोल जारी किए जा रहे हैं। अभी हाल ही में गंगेव जनपद के ग्राम पंचायत हिनौती, पचोखर, सरई कला, भौखरी खुर्द, क्योटी, कोल्हई एवं त्योंथर की गंगतीरा आदि पंचायतों का मामला सामने आया है जिसमें मशीनों और जेसीबी से काम लिया जा रहा है और ऐसे लोगों के नाम मस्टररोल में भरे जा रहे हैं जो स्वयं गांव में है ही नहीं और कई वर्षों से दिल्ली या मुंबई में कार्यरत हैं। कुछ तो नाम ऐसे सामने आए हैं जो विकलांग हैं अथवा अत्यधिक वृद्ध हैं जो किसी भी प्रकार से कार्य करने योग्य ही नहीं है उनके नाम पर भी राशि भेजी जा रही है। इसी प्रकार कई ऐसे नाम है जो मृत हो चुके हैं लेकिन वह भी नरेगा पोर्टल पर दर्शाए गए मस्टररोल में दिखाए जा रहे हैं जिनके नाम प्रतिदिन 204 रु मजदूरी के नाम पर पेमेंट होता दिख रहा है।

    इसी तरह जवा ब्लॉक में भी बनाए जा रहे दर्जनभर से अधिक अमृत सरोवरों में अब बर्खास्त एई अमूल्य खरे खेल खेल रहा है। अब तो वह पूरी तरह से स्वतंत्र है क्योंकि भ्रष्टाचार का आरोप तो एक ही बार लगता है और भला उस व्यक्ति को नियम कायदों से क्या लेना देना जो पहले से ही बर्खास्त है। अब सवाल यह है कि इतने बड़े घोटाले में सीईओ जिला पंचायत रीवा स्वप्निल वानखेडे और जिला कलेक्टर मनोज पुष्प और पता नहीं कितने अधिकारी नेता मंत्री सम्मिलित हैं।

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