प्राकृतिक जीवाणु से भूमि की बढ़ती है उर्वरा शक्ति
फसल प्रक्षेत्र दिवस का किया गया आयोजन

विक्रम लालवानी जिला रिपोर्टर
– कृषि विज्ञान केन्द्र शहडोल द्वारा ग्राम चटहा में चना फसल पर प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन किया गया। केंद्र के वैज्ञानिक डाॅ. ब्रजकिषोर प्रजापति ने किसानों को बताया कि फसलों में जैव उर्वरक इस्तेमाल करने से वायुमण्डल में उपस्थित नत्रजन पौधों को सुगमता से उपलब्ध होती है तथा भूमि में पहले से मौजूद अघुलनशील फास्फोरस आदि पोषक तत्व घुलनशील अवस्था में परिवर्तित होकर पौधों को आसानी से उपलब्ध होते हैं। जीवाणु प्राकृतिक हैं, इसलिए इनके प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और पर्यावरण पर विपरीत असर नहीं पड़ता। चना फसल में फली छेदक कीट फली बनने पर फलियों में छेदकर दानों को खाकर क्षति पहुंचाता है। इसके नियंत्रण हेतु रोकथाम के लिए सबसे पहले यौन आकर्षण जाल फेरोमैन ट्रैप द्वारा नियमित निगरानी करते रहें जैसे ही 5-6 नर कीट/ट्रैप 24 घंटे के अन्दर मिलने शुरू हो जाए तो नियंत्रण तकनीक अपनायें। इसके अतिरिक्त न्यूक्लियर पाॅलीहेड्रोसिस विषाणु का 250 लार्वा समतुल्य प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें एवं परभक्षियों के लिये खेत में टी आकार की लकड़ी लगा दें। उसके साथ ही नीम के तेल के 5 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।
डाॅ. प्रजापति ने बताया कि नैनो-उर्वरक पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में बहुत कम मात्रा में उपयोग किए जाते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है। ये पौधों को आवश्यक मैक्रो और माइक्रो-पोषक तत्व प्रदान करते हैं, जिससे पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता और तनाव सहने की क्षमता बढ़ती है। ये उर्वरक पौधों के विकास को बढ़ावा देते हैं, पोषक तत्वों के अवशोषण को बढ़ाते हैं, जिससे पैदावार और गुणवत्ता बढ़ती है, और अंततः किसानों की आय में वृद्धि होती है। नैनो-उत्पाद और जैविक उत्पाद (जैसे सागरिका) मिट्टी और पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं, प्रदूषण कम करते हैं और मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करते हैं। एक किलो बीज में 5 मिली नैनो डीएपी का उपयोग कर सकते हैं। अच्छे परिणाम के लिए 30-35 दिन की फसल में 4 मिली प्रति लीटर पानी से खड़ी फसल में छिड़काव कर सकते हैं। कृषि अभियांत्रिकी, वैज्ञानिक श्री दीपक चैहान ने किसानों को बताया कि कृषि उत्पादकता को बढ़ाने में सिंचाई जल का एक अहम योगदान है, खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि ऐसी तकनीकों को उपयोग में लाया जाये, जो न केवल जल संरक्षण में सहायक हो अपितु फसलों की उत्पादकता भी बढ़ाए। जल प्रबंधन की शुरुआत कृषि क्षेत्र से करनी चाहिए, सर्वाधिक मात्रा में कृषि कार्यों में ही जल का उपयोग किया जाता है तथा सिंचाई में जल का दुरुपयोग एक गंभीर समस्या है। हमारे देश में अधिकांशतः खेतों में सिंचाई के लिये कच्ची नालियों द्वारा पानी लाया जाता है, जिससे तकरीबन 30-40 फीसदी पानी रिसाव की वजह से बेकार चला जाता है। बूँद-बूँद सिंचाई, बौछार (फव्वारा तकनीकी) तथा खेतों के समतलीकरण से सिंचाई में जल का दुरुपयोग रोका जा सकता है।

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