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MP//Rewa// डिप्टी कमिश्नर केपी पांडेय पर सूचना आयोग ने ठोंका 25 हज़ार का जुर्माना// 30 दिन के भीतर जमा करें जुर्माना और कमिश्नर रीवा राजेश जैन दर्ज करें सेवा पुस्तिका में// कोर्ट स्थगन की स्थिति में भी जानकारी सेवा पुस्तिका में हो दर्ज// मामला एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी के कराधान की आरटीआई का// मप्र की 1148 पंचायतों में 300 करोड़ जांच के दायरे में।।

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सूचना आयोग के इतिहास में एक बार फिर एक वरिष्ठ अधिकारी को सूचना आयुक्त के द्वारा 25 हज़ार रु के जुर्माने एवं अनुशासनात्मक एवं विभागीय कार्यवाही के साथ दंडित किया गया है। मामला रीवा जिला से संबंधित है जहां आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी द्वारा दिनांक 15 नवंबर 2019 को लगभग 1 वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के बहुचर्चित 1148 पंचायतों के 300 करोड़ के कराधान घोटाले से संबंधित रीवा जिला की 75 पंचायतों एवं गंगेव जनपद की 38 पंचायतों के विषय में तत्कालीन कमिश्नर रीवा संभाग अशोक भार्गव के द्वारा स्थापित जांच का जांच प्रतिवेदन चाहा गया था एवं उसके साथ संलग्न समस्त दस्तावेज की प्रमाणित प्रति चाही गई थी। परंतु तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी संभागीय कार्यालय डिप्टी कमिश्नर पीसी शर्मा के द्वारा 13 दिसंबर 2019 को पत्र जारी कर जांच प्रचलित होने की बात कही गई थी। इसके बाद अपीलार्थी के द्वारा दिनांक 27 दिसंबर को प्रथम अपील की गई जिस पर 13 जनवरी 2020 को आवेदक को तत्कालीन कमिश्नर अशोक भार्गव के सामने पेशी के लिए बुलाया गया जिस पर आवेदक के द्वारा 518 पन्ने की जानकारी न दिए जाने की बात कही गई थी। जिस पर संभागायुक्त अशोक भार्गव ने 29 जनवरी 2020 को आदेश पारित कर आवेदक को जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए निर्देशित किया। इसके उपरांत 25 फरवरी 2020 को लोक सूचना अधिकारी के द्वारा आवेदक को मात्र 63 पन्ने की जानकारी उपलब्ध करवाई गई जिस पर आवेदक ने शेष संलग्न 518 पन्ने की जानकारी दिए जाने की बात कही। परंतु लोक सूचना अधिकारी कार्यालय के बाबुओं के द्वारा आवेदक को गुमराह किया गया और बताया गया कि समस्त दस्तावेज कलेक्टर कार्यालय को भेज दिए गए हैं जहां पर आरटीआई लगाकर जानकारी प्राप्त करें। इसके बाद आवेदक ने असंतुष्ट होकर दिनांक 5 मार्च 2020 को मामले की द्वितीय एवं अंतिम अपील मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग में कर दी।।

   सूचना आयोग ने सुनवाई पर डिप्टी कमिश्नर केपी पांडे को पाया दोषी

   मामले की पहली पेशी 16 अक्टूबर 2020 को हुई और अंतिम ऑर्डर 28 अक्टूबर 2020 को आया। मामले की सुनवाई करते हुए सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने स्पष्ट किया कि आयोग के समक्ष दिनांक 28 अक्टूबर 2020 को सुनवाई में लोक सूचना अधिकारी के पी पांडे एवं आवेदक शिवानंद द्विवेदी उपस्थित हुए। सुनवाई में के पी पांडे द्वारा कथन किया गया कि अपीलार्थी द्वारा 63 पेज की जानकारी कार्यालय से प्राप्त की गई एवं शेष बची 455 पेज की जानकारी द्विवेदी द्वारा लेने से इनकार किया गया यह कहते हुए की जानकारी सत्यापित नहीं है। शिवानंद द्विवेदी द्वारा सुनवाई में इस बात से इनकार किया गया कि उन्हें कभी भी 455 पेज की जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए लोक सूचना अधिकारी द्वारा कभी कोई कार्यवाही पूर्व में की गई थी। श्री द्विवेदी द्वारा यह भी कथन किया गया की लोक सूचना अधिकारी इस प्रकरण में जुर्माने की कार्यवाही से बचने के लिए आयोग को गुमराह कर रहे हैं। अपीलार्थी शिवानंद द्विवेदी द्वारा यह दावा किया गया कि दस्तावेज पूर्व में ही कार्यालय में उपलब्ध होने के बावजूद लोक सूचना अधिकारी के कार्यालय द्वारा बार-बार उनसे असहयोग करते हुए उन्हें जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश के बावजूद भी उन्हें जानकारी उपलब्ध कराने में विलंब हुआ। और बाद में शेष बची हुई जानकारी के लिए उन्हें आयोग में द्वितीय अपील दायर करनी पड़ी। आयोग द्वारा इस प्रकरण में जांच संस्थित की गई एवं संबंधितों से लिखित में साक्ष्य लिए गए। 

   आयोग की जांच में मामला हुआ स्पष्ट

   आयोग द्वारा की गई जांच उपरांत उपलब्ध दस्तावेज साक्ष्य से स्पष्ट है कि लोक सूचना अधिकारी के पी पांडे के द्वारा किया कथन आयोग के समक्ष निम्नलिखित कारणों से स्वीकार करने योग्य नहीं है। आयोग ने आगे कहा कि दिनांक 25 फरवरी 2020 को अपीलार्थी  को 63 पेज प्राप्त करते समय लोक सूचना अधिकारी के कार्यालय में जो पावती दी गई उसमें कहीं भी अपीलार्थी द्विवेदी द्वारा यह लेख नहीं किया गया कि सत्यापित अथवा असत्यापित प्रति देने की वजह से जानकारी लेने से इनकार किया गया है। शिवानंद द्वारा  जानकारी के बारे में यह लेख किया गया कि 518 पन्ने उपलब्ध नहीं कराए गए हैं आवेदक द्वारा इसके बाद अपील दिनांक 5 मार्च 2020 को दायर की गई उसमें भी उनके द्वारा शेष बची जानकारी के संबंध में यही कहा गया कि उन्हें 518 की जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। आवेदक शिवानंद द्विवेदी के द्वारा लिखित में आयोग के समक्ष उपलब्ध कंप्लेंट में पूर्व से लेकर बाद में भी कहीं कोई बदलाव नहीं आया और उसने एकरूपता रही कि उन्हें 518 पन्ने की जानकारी नहीं प्रदान की गई। यहां सत्यापित असत्यापित प्रति का प्रश्न ही पैदा नहीं हुआ।

   455 पेज की जानकारी उपलव्ध करने का डिप्टी कमिश्नर ने लगाया झूंठा आरोप

   आयोग ने आगे लिखा कि दस्तावेजों में उपलब्ध तथ्यों से स्पष्ट है कि शिवानंद द्विवेदी को यह भी ज्ञात नहीं था कि 518 पन्ने की कुल संख्या है क्योंकि अपीलार्थी द्विवेदी द्वारा लोक सूचना अधिकारी के कार्यालय में यह टीप दर्ज कराई गई कि संलग्न 518 पन्ने उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। इससे यह स्पष्ट है कि अपीलार्थी को यह मानते हुए टीप दर्ज की है कि शेष बची जानकारी 518 पन्ने की ही है। जबकि लोक सूचना अधिकारी के कथन के मुताबिक उनके द्वारा 455 पेज की जानकारी अपीलार्थी को उपलब्ध करवाने की कोशिश की गई जिससे आवेदक ने लेने से मना कर दिया। उसके बाद उक्त टीप आवेदक द्वारा लोक सूचना अधिकारी कार्यालय में दर्ज कराई थी कि अगर ऐसा हुआ होता तो आवेदक द्विवेदी द्वारा 455 पेज की जानकारी के बारे में अवश्य लिखा जाता। इससे यह स्पष्ट है कि यह 455 पेज की जानकारी डिप्टी कमिश्नर केपी पांडे के द्वारा आवेदक द्विवेदी के समक्ष दिनांक 25 फरवरी 2020 को प्रस्तुत ही नहीं की गई थी।

   लोक सूचना अधिकारी एवं डिप्टी कमिश्नर के पी पांडे के द्वारा कोई भी ऐसा तथ्य आयोग के समक्ष उपलब्ध नहीं कराया गया जिससे यह साबित होता है कि शिवानंद द्विवेदी द्वारा लोक सूचना अधिकारी के कार्यालय में उपस्थित होकर 455 पेज की जानकारी असत्यापित होने के आधार पर लेने से इनकार किया गया।

  यूट्यूब में ऑनलाइन वीडियो से भी सिद्ध हुआ कि आवेदक को जानकारी चाहिए थे और मना नहीं किया 

  अपीलार्थी शिवानंद द्विवेदी के द्वारा आयोग को अपील के संबंध में अपनी लिखित शिकायत में पहले कहा गया है कि उनके द्वारा दिनांक 13 जनवरी 2020 को लोक सूचना अधिकारी कार्यालय में इसी प्रकरण में जानकारी लेने के लिए संपर्क किया गया। आवेदक द्वारा साक्ष्य के रूप में ऑनलाइन अपलोडेड वीडियो रिकॉर्डिंग आयोग को उपलब्ध कराई गई। वीडियो रिकॉर्डिंग में आवेदक द्विवेदी द्वारा जब इस प्रकरण के संबंध में जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए कहा गया तो उन्हें डिप्टी कमिश्नर के पी पांडे के कार्यालय के बाबुओं द्वारा सूचित किया गया की जानकारी उपलब्ध नहीं है साथ ही जब उन्होंने पूछा की जानकारी कैसे उपलब्ध होगी तो उन्हें उल्टा सलाह दी गई कि कलेक्टर कार्यालय से जानकारी प्राप्त कर लें। 

    जबकि आयोग के समक्ष यह स्पष्ट है कि दिनांक 31 दिसंबर को चाही गई जानकारी के पी पांडे के कार्यालय में उपलब्ध थी। आयोग द्वारा उक्त संबंध में डिप्टी कमिश्नर पांडेय से जब स्पष्टीकरण मांगा गया तो उन्होंने यह कहा कि वह उक्त वार्तालाप में वे सम्मिलित नहीं थे इसलिए उस घटना के लिए उन्हें उत्तरदाई नहीं ठहराया जा सकता है। 

  लोक सूचना अधिकारी कार्यालय के बाबुओं के व्यवहार की जिम्मेदारी पीआईओ की है

    आयोग के समक्ष स्पष्ट है कि उक्त घटना के लिए डिप्टी कमिश्नर एवं लोक सूचना अधिकारी के पी पांडे को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन लोक सूचना अधिकारी के कार्यालय में बाबुओं द्वारा अपीलकर्ता के साथ धारा 5(3) का उल्लंघन करते हुए असहयोगात्मक रवैया रखते हुए उन्हें जानकारी से वंचित रखा गया। लोक सूचना अधिकारी कार्यालय में सूचना का अधिकार अधिनियम से जुड़े दस्तावेजों के बारे में जानकारी सलाह देने की अधिकारिता बाबू को किसने दी है? यह भी आरोप लगाया गया कि डिप्टी कमिश्नर के कार्यालय में अपीलकर्ता से मिलते ही नहीं थे। आयोग के समक्ष यह स्पष्ट है कि लोक सूचना अधिकारी के कार्यालय में सूचना के अधिकार अधिनियम को लेकर चल रही अव्यवस्था के लिए लोक सूचना अधिकारी स्वयं दोषी है। 

   लोक सूचना अधिकारी के रूप में आरटीआई के प्रति डिप्टी कमिश्नर केपी पांडेय की अकर्मण्यता साफ झलकती है- सूचना आयुक्त

    सूचना के अधिकार अधिनियम में लोक सूचना अधिकारी को कानून के तहत जानकारी तक पहुंचने के लिए समस्त अधिकार दिए गए हैं इसलिए इस अधिनियम में उल्लंघन होने की स्थिति में कार्यवाही का प्रावधान भी सिर्फ लोक सूचना अधिकारी के खिलाफ ही बनता है। कमिश्नर कार्यालय में जारी पत्र दिनांक 31 दिसंबर 2019 से स्पष्ट है कि जानकारी कार्यालय में उपलब्ध थी तो लोक सूचना अधिकारी पांडे द्वारा उक्त जानकारी नहीं उपलब्ध कराई गई। उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि डिप्टी कमिश्नर एवं लोक सूचना अधिकारी केपी पांडे लोक सूचना अधिकारी के पद पर 1 जनवरी 2020 से है। लोक सूचना अधिकारी एवं डिप्टी कमिश्नर पांडे द्वारा बताया गया है कि इसका जवाब जिस अधिकारी ने पत्र प्रेषित किया है वही बता सकते हैं। अब आयोग के समक्ष पांडे का जवाब स्वीकार करने योग्य कतई नहीं है इसमें लोक सूचना अधिकारी के रूप में सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रति उनकी अकर्मण्यता साफ झलकती है क्योंकि आवेदक द्विवेदी द्वारा चाही गई जानकारी लोक सूचना अधिकारी के कार्यालय में सरल और सुलभ तरीके से दिनांक 31 दिसंबर 2019 को उपलब्ध थी और पांडे द्वारा जानकारी को लेने का कोई प्रयास नहीं किया गया। इससे स्पष्ट है कि लोक सूचना अधिकारी द्वारा अधिनियम के अनुरूप निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए जानकारी प्राप्त करके आवेदक द्विवेदी को उपलब्ध कराने का कोई भी प्रयास नहीं किया गया।

   जब जनाकारी उपलब्ध है तो अपील के आदेश का इन्तेजार करने की जरूरत नही – सूचना आयुक्त

  लोक सूचना अधिकारी एवं डिप्टी कमिश्नर केपी पांडे का यह कथन कि उक्त प्रकरण में प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश की प्रति प्राप्त होने पर उनके द्वारा यथाशीघ्र सत्य प्रति उपलब्ध कराई गई, यह आयोग के समक्ष कथन स्वीकार करने योग्य नहीं है क्योंकि लोक सूचना अधिकारी द्वारा दिनांक 13 दिसंबर 2019 को इस आधार पर जानकारी रोकी गई की जानकारी उपलब्ध नहीं है। अगर आवेदक द्वारा प्रथम अपील दायर की गई तो यह लोक सूचना अधिकारी के लिए कोई आधार नहीं बनता है की वह जानकारी रोके। लोक सूचना अधिकारी इस प्रकरण में जानकारी देना चाहते तो वह अपीलीय प्रक्रिया का इंतजार नहीं करते और न ही सूचना के अधिकार अधिनियम में ऐसी कोई बाध्यता लोक सूचना अधिकारी के ऊपर लागू होती है। अपील के दौरान जानकारी नहीं देने के प्रावधान को मान्य किया जाए तो फिर लोक सूचना अधिकारी की स्वयं की भूमिका सूचना के अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन में शेष रह जाएगी। ऐसे में प्रथम अपील के निराकरण के बाद ही लोक सूचना अधिकारी जानकारी देंगे जो सूचना के अधिकार अधिनियम में स्पष्ट है कि लोक सूचना अधिकारी को जानकारी एक निश्चित अवधि में अपीलकर्ता को उपलब्ध करानी होगी।

   30 दिन के अंदर आरटीआइ के निराकरण का प्रावधान प्रशासन को जनता के प्रति जबाबदेह और पारदर्शिता के लिए रखा गया – सूचना आयुक्त

   आयोग के समक्ष स्पष्ट है कि लोक सूचना अधिकारी पांडे लोक सूचना अधिकारी के पद पर एक जनवरी 2020 से कार्यरत है। जिस दिनांक से वह काबीज है उसी दिनांक से सूचना का अधिकार अधिनियम में चाहे गए दस्तावेज सरल एवं सुलभ तरीके से कार्यालय में उपलब्ध थे लेकिन इसके बावजूद लोक सूचना अधिकारी पांडे द्वारा उक्त दस्तावेज आवेदक शिवानन्द द्विवेदी को उपलब्ध नहीं कराए गए। बाद में मात्र 63 पेज की अधूरी जानकारी आवेदक द्विवेदी को उपलब्ध कराए गए। शेष बचे 455 दस्तावेजों को बाद में आयोग के आदेश दिनांक 16 अक्टूबर 2020 के परिपालन में अपीलकर्ता को पीआईओ पांडे द्वारा उपलब्ध कराया गया। सूचना के अधिकार अधिनियम में निर्धारित समय अवधि में दस्तावेजों को उपलब्ध कराने एवं अपील प्रक्रिया के निराकरण का प्रावधान है। कानून को बनाते समय 30 दिन की समय अवधि में अपीलकर्ता को जानकारी उपलब्ध करवाने का प्रावधान बहुत ही सोच कर प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने एवं शासकीय कार्यालयों में पारदर्शिता के सिद्धांतों को ऊपर रखते हुए बनाया गया है। यहां भी पांडे आयोग के समक्ष कोई युक्तियुक्त कारण नहीं बता पाए कि उनके द्वारा 1 जनवरी 2020 से लेकर आयोग के आदेश दिनांक 16 अगस्त 2020 तक का विलंब क्यों किया गया?

   लोक सूचना अधिकारी की सील हस्ताक्षर युक्त दिए जाते हैं आरटीआई के दस्तावेज-राहुल सिंह

   आयोग के समक्ष यह भी स्पष्ट है की लोक सूचना अधिकारी द्वारा अपीलकर्ता को बिना किसी सील हस्ताक्षर के 455 पेज की जानकारी आयोग के आदेश के बाद जारी की गई है। लोक सूचना अधिकारी द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया विधि विरुद्ध है। लोक सूचना अधिकारी कार्यालय से जारी सभी पत्र एवं दस्तावेजों पर कार्यालय के अधिकारी के हस्ताक्षर एवं शील होना अनिवार्य है। यह सील एवं हस्ताक्षर दस्तावेजों के सत्यापन के लिए नहीं किया जाता बल्कि इसके लिए किया जाता है कि उक्त दस्तावेज सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत लोक सूचना अधिकारी कार्यालय से जारी किए गए हैं। दस्तावेज लोक सूचना अधिकारी कार्यालय द्वारा जारी किए जाते हैं एवं हस्ताक्षर अवश्य रहता है

   आरटीआई 2005 की धारा 6 के तहत प्रपत्र 5 और 6 भी कमिश्नर कार्यालय में नही थे संधारित्र

   लोक सूचना अधिकारी को आयोग द्वारा इस प्रकरण के संबंध में दिनांक 29 अक्टूबर 2020 को आदेशित किया गया था कि वह सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6 के अंतर्गत संधारित करने वाली प्रपत्र 5 एवं 6 की पंजी सूचना आयोग को उपलब्ध कराएं। लेकिन लोक सूचना अधिकारी द्वारा प्रेषित पत्र एवं मात्र 6 कॉलम उपलब्ध है जबकि शासन द्वारा निर्धारित नियम के अनुरूप 15 कॉलम में प्रपत्र पांच संधारित किया जाता है। वही प्रपत्र 6 की पंजी लोक सूचना अधिकारी के कार्यालय में संधारित्र ही नहीं थी। इससे सूचना के अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन के प्रति लोक सूचना अधिकारी की मंशा उजागर होती है। आयोग द्वारा लोक सूचना अधिकारी को भविष्य में सूचना के अधिकार अधिनियम के अनुरूप कार्य करने के लिए सचेत किया जाता है।

   डिप्टी कमिश्नर केपी पांडेय पर 25 हज़ार रुपये का लगा जुर्माना

   आयोग ने कहा कि डिप्टी कमिश्नर एवं लोक सूचना अधिकारी केपी पांडेय को आयोग के समक्ष सुनवाई के दौरान पर्याप्त समय और अवसर दिया गया लेकिन पांडे द्वारा आयोग के समक्ष सुनवाई में ऐसा कोई तथ्य, प्रमाण पेश नहीं किया गया जिससे यह माना जा सके की अपीलार्थी  को जानकारी प्रदान करने का कोई भी प्रयास युक्तियुक्त रूप से सफलतापूर्वक उनके द्वारा किया गया हो। चाही गई जानकारी पूरी तरह से सामान्य और सहज रूप से प्रदान की जा सकती थी पर ऐसा न कर के लोक सूचना अधिकारी केपी पांडे ने सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असफल रहे हैं। धारा 20(1) में स्पष्ट है की प्रकरण में यदि लोक सूचना अधिकारी द्वारा आरटीआई आवेदन का निराकरण विधि सम्मत तरीके से किया गया है तो उसे साबित करने का भार स्वयं लोक सूचना अधिकारी पर ही है। आयोग प्रकरण में लोक सूचना अधिकारी के पी पांडे डिप्टी कमिश्नर रीवा मध्य प्रदेश द्वारा अपीलार्थी  के आवेदन दिनांक 15 नवंबर 2019 से चाही गई जानकारी असदभावपूर्ण, जानबूझकर बिना किसी उचित एवं पर्याप्त कारणों से उपलब्ध न करवाने के कारण प्रकरण की विशिष्ट परिस्थितियों में प्रतिदिन 250 रु के मान से अधिकतम 25 हज़ार रु का जुर्माना व्यक्तिगत रूप से निरूपित करता है।

   30 दिन में जुर्माना की राशि वसूल कर संभागीय कमिश्नर राजेश जैन आयोग को करें सूचित – राहुल सिंह

    आयोग ने आगे कहा कि यह देखने में आया है कि लोक सूचना अधिकारी पर अधिरोपित शस्ति की वसूली के प्रकरण वर्षों से लंबित हैं जिनमें की लोक सूचना अधिकारी ने माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका भी प्रस्तुत की है और कोई स्थगन भी नहीं है। फिर भी जुर्माना संबंधी आयोग का आदेश अंतिम होने के उपरांत भी राशि जमा नहीं की है। संबंधित विभागों ने सूचना के उपरांत भी वसूली हेतु उचित कार्यवाही नहीं की है। उपरोक्त के दृष्टिगत संभागीय कमिश्नर राजेश कुमार जैन रीवा मध्य प्रदेश एवं अनुशासनात्मक अधिकारी जिला कार्यालय में संबंधित लोक सूचना अधिकारियों की सेवा पुस्तिका संधारित्र की जाती हो, उनको निर्देशित किया जाता है कि इस द्वितीय अपीलीय प्रकरण में संबंधित लोक सूचना अधिकारी द्वारा मध्य प्रदेश का सूचना का अधिकार फीस एवं अपील अधिनियम 2005 की धारा 8(6)(1) के अनुसार आदेश प्राप्ति के 30 दिन के अंदर अधिरोपित शस्ति की राशि सूचना आयोग के कार्यालय में जमा न करने पर उनकी सेवा पुस्तिका में अंकित की जावे। एक माह में शस्ति की राशि जमा नहीं होने पर लोक सूचना अधिकारी से उनके आहरण एवं संवितरण अधिकारी भुगतान के समय उनके पेमेंट से यह राशि वसूल की जा कर शासकीय कोषालय में जमा करके आयोग को सूचित करें। कालांतर में उच्च न्यायालय से स्थगन प्राप्त किए जाने का आदेश परिवर्तित हो जाने या जुर्माना जमा करने संबंधी समस्त परिवर्तन भी संबंधित लोक सूचना अधिकारियों की सेवा पुस्तिका में अंकित किए जावे।

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