MP//Rewa पंचायतों की प्रशासकीय समिति घोटाले में अब तक कार्यवाहीनहीं // कैथा में 6माह से लटका प्रधान नियुक्ति का मामला // RTI धारा 7(1) के तहत 48 घंटे के भीतर देनी थीजानकारी, पत्राचार तक सिमटी जिला निर्वाचन अधिकारी की कार्यवाही // जिला निर्वाचन अधिकारी कार्यालय रीवा मेंएक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी ने दायर की थी आरटीआई //
मप्र में वर्ष 2015 में पंचायतों का चुनाव हुआ इसके बाद वर्ष 2019 में पंचायत का 5 वर्षीय कार्यकाल समाप्त हुआ. मप्र में तत्कालीन कांग्रेस की सरकार के पास बजट नहीं था तब उसने पंचायतों में वैकल्पिक व्यवस्था करते हुए सरपंच को प्रधान के तौर पर तब्दील कर दिया. प्रधान का मतलब यह था की पंचायतें पहले जैसे ही चलती रहेंगी और सरपंच को प्रशासकीय समिति का मुखिया बनाया जाएगा. जो पंच थे वह उस प्रशासकीय समिति के सदस्य होंगे. पंचायतें पूर्ववत चलती रहेंगी और अगले चुनाव तक यह व्यवस्था लागू रहेगी. लेकिन समय ने करवट ली. कोरोना का दौर आया. पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो गयी. सभी सरकारी काम प्रभावित हुए. नौकरी चाकरी लेबर से लेकर सब कुछ प्रभावित हुआ. लेकिन जो प्रभावित नहीं हुआ वह था विधायकों और सांसदों का धंधा. विधानसभा और लोकसभा के चुनाव तो हुए लेकिन पंचायतों के चुनाव में कोरोना आड़े आ गया. पहले कांग्रेस के समय में बजट और भाजपा के समय में कोरोना. स्थिति यह हुई की आज तक पंचायतों का चुनाव नहीं हो पाया.
*मप्र में पंचायतीराज का सबसे बड़ा प्रशासकीय समिति घोटाला*
मप्र में 2019 में पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होते ही प्रशासकीय समितियों का गठन हुआ और सरपंच को उस प्रशासकीय समिति का मुखिया बनाया गया. प्रशासकीय समिति के सदस्यों में अनिवार्यतः सभी पंचों को रखा जाना था. लेकिन खेल यहाँ से प्रारंभ हुआ. चूँकि मप्र में ग्राम पंचायतों के हाल तो सबको पता हैं. यहाँ कभी भी ग्राम सभाओं का आयोजन नहीं होता और न ही पंचों की कोई कीमत होती इसलिए प्रारंभ से ही कई पंचों को ग्रामसभा से दूर रखा जाता है. विशेषकर ऐसे पंचों को तो बिलकुल ही दूर कर दिया जाता है और ग्रामसभा में सूचित नहीं किया जाता जो सरपंच के गलत और भ्रष्टाचार के कार्यों का विरोध करते हैं. क्योंकि ऐसे कुछ ईमानदार पञ्च नहीं चाहते की पंचायतों के फर्जी कार्य चलें इसलिए सरपंच और उनके चमचे ऐसे पंचों को बाहर रखना ही उचित समझते हैं. लेकिन क्या पंचायत जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था से पंचों को अधिकारिक तौर पर बाहर कर दिया जाना उचित कहलायेगा? जी बिलकुल ऐसा ही हुआ. पहले तो प्रारंभ के 5 वर्षों में कुछ ऐसे पंचों को ग्राम सभाओं और बैठकों से दूर रखा गया और यहाँ तक की उन्हें पंच हैं इस बात का कोई प्रमाण पत्र तक नहीं दिया गया और फिर जब पंचायत का 5 वर्षों का आधिकारिक कार्यकाल समाप्त हुआ तब जब प्रशासकीय समिति का गठन कर वैकल्पिक व्यवस्था मप्र शासन द्वारा की गयी तब ऐसे पंचों को बाकायदा कलेक्टर के आदेश से जारी प्रशासकीय समिति से ही बाहर कर दिया गया. शायद इससे बदतर लोकतान्त्रिक व्यवस्था नहीं कहलाएगी की संवैधानिक संस्था पंचायतीराज से चुने गए जन प्रतिनिधियों/पंचों को एक सबसे जिम्मेदार आईएएस अधिकारी कलेक्टर के हस्ताक्षरित आदेश से ही बाहर कर दिया गया हो. कम से कम अब तक जो जानकारी सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा आरटीआई दायर कर प्राप्त की गयी उससे रीवा जिले की दर्जनों पंचायतों में यह घोटाला सामने आया है जिसमे पंचायतों में कलेक्टर द्वारा गठित प्रशासकीय समिति में चुने हुए पंचों को प्रशासकीय समिति और पंचायतों की कार्यवाही से ही बाहर कर दिया गया है. हालाँकि यह पूरे मप्र में जांच का विषय है. यदि पूरे मप्र में यह जाँच कार्यवाही की जाय तो शायद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला सामने आयेगा जिसमे एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक पंचायतीराज संस्था से चुने हुए जन प्रतिनिधियों को अवैधानिक तरीके से बाहर रखा गया.
*क्या बिना निर्वाचित पंचों के पंचायतों के चलने का कोई औचित्य है?*
जानकारों से इस विषय में चर्चा हुई तो सबका यही कहना है की कोई भी संवैधानिक संस्था जिसमे जन प्रतिनिधियों को जनता अपना मत देकर चुनती है उससे उनके चुने हुए निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को अवैधानिक तरीके से बाहर नहीं रखा जा सकता. यह बात अलग है की वह निर्वाचित जन प्रतिनिधि अगर स्वयं ही अपने पद से इस्तीफा दे दे तो वह पद अगले 6 माह के भीतर वापस मतदान करवाकर भरा जाता है. लेकिन आधिकारिक तौर पर कोई कलेक्टर अथवा कोई भी सक्षम कोर्ट भी बिना पर्याप्त कारण के उन चुने हुए पंचों को पंचायतीराज व्यवस्था से बाहर नहीं कर सकती. अब जो मामला मप्र के रीवा जिले में देखने को मिला है जिसमे बकायदे कलेक्टर के हस्ताक्षर से जारी प्रशासकीय समिति के सदस्यों से पंचों को बाहर रखा गया है उससे पूरे सिस्टम और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को ही सवाल के घेरे में खड़ा कर दिया है.
*कैथा में बर्खास्त सरपंच के 6 माह बाद भी नहीं हुई नए प्रधान की नियुक्ति*
यदि गंगेव जनपद की कैथा पंचायत की बात की जाय तो यहाँ 15 जनवरी 2021 को रीवा कलेक्टर डॉक्टर इलैयाराजा टी के आदेश के बाद कैथा का सरपंच और प्रशासकीय समिति का प्रधान संत कुमार पटेल को पंचायतीराज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की धारा 89, एवं 40-92 के तहत पद से पृथक कर बर्खास्त कर दिया गया था और लगभग 9 लाख रूपये प्रत्येक के हिसाब से तत्कालीन कैथा पंचायत सचिव अच्छेलाल पटेल और सरपंच संत कुमार पटेल को कुल लगभग 17 लाख 92 हज़ार रूपये के आसपास की वसूली अधिरोपित की गयी थी. इसके बाद आज 6 माह का समय व्यतीत हो रहा है और कैथा पंचायत में प्रशासकीय समिति के सदस्यों से नए प्रधान की नियुक्ति नहीं की गयी जिससे पूरा सिस्टम सवाल के घेरे में आ गया है.
*कैथा प्रशासकीय समिति में सदस्यों की कम संख्या से मामला आया प्रकाश में*
सबसे पहले प्रशासकीय समिति में घोटाला कैथा पंचायत से ही प्रकाश में आया. जब मार्च 2020 में जिला कलेक्टर रीवा द्वारा पंचायतों में प्रशासकीय समिति का गठन किया गया था तब मात्र कैथा में कुल 18 में से 13 पंचों को ही प्रशासकीय समिति में रखा गया था. यद्यपि चूँकि वह बाहर किये गए 5 पंचों को प्रारंभ से ही किसी भी प्रकार के ग्रामसभा की जानकारी नहीं थी और न ही उन्हें कभी निर्वाचन का प्रमाण पत्र दिया गया. इसके पहले जब प्रथम ग्रामसभा की मीटिंग हुई तब बर्खास्त सरपंच संत कुमार पटेल और ऊसके गुर्गों के गाली-गलौज और मारपीट की थी इसके बाद पंचों ने चर्चा ही छोड़ दी और डर से रूचि ही नहीं ली. इसकी शिकायतें भी गयी थी लेकिन उच्चाधिकारियों की मिलीभगत के चलते कोई कार्यवाही न करने से पंचों की रूचि और मनोबल में काफी विपरीत प्रभाव पड़ा. यह सिलसिला चलता रहा लेकिन जब पंचायतों का कार्यकाल 2019 में समाप्त हुआ और नयी प्रशासकीय समितियों का गठन सम्बंधित जिला कलेक्टर के द्वारा किया गया तब भी कैथा पंचायत-जनपद गंगेव के उन 5 पंचों को बाहर कर दिया गया. इसका भी पता नहीं चलता लेकिन जब कैथा का बर्खास्त सरपंच संत कुमार पटेल और तत्कालीन सचिव अच्छेलाल पटेल पर अनियमितता और भ्रष्टाचार की कार्यवाही हुई और इनके विरुद्ध पद से हटाने और एफआईआर की कार्यवाही हुई तब नए प्रधान की नियुक्ति का मामला सामने आया. जब प्रशासकीय समिति के सदस्यों से प्रधान के चयन की बात आई तो पता चला की मार्च 2020 में गठित प्रशासकीय समिति में 5 पंचों को अधिकारिक तौर पैर परमानेंट बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था. शायद यह भारत के पंचायतीराज और ग्राम स्वराज अधिनियम में सबसे काला दिन कहा जा सकता है. क्योंकि यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी की पंचायतों के चुने हुए पंचों को ही एक जिला कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर से बाहर कर दिया गया था.
*सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी की आरटीआई में हुआ बड़ा खुलासा*
यह बड़ा खुलासा सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी ने किया जिन्होंने सबसे पहले इसे कैथा पंचायत के मामले में पकड़ा और उसके बाद फिर आसपास की कई पंचायतों का पता लगाने पर हिनौती, बांस, अगडाल आदि में भी मामला प्रकाश में आया. इसके बाद रीवा जिले की गंगेव जनपद में आरटीआई दायर की गयी तो जो दस्तावेज मिले वह सबके होश उड़ाने वाले थे. ऐसी दर्जनों पंचायतें थीं जहां कलेक्टर द्वारा आदेशित प्रशासकीय समिति के सदस्यों से निर्वाचित पंचों को दरकिनार करते हुए भारतीय संविधान और लोकतंत्र का सबसे बड़ा घोटाला कर दिया गया था. निर्चावित सदस्यों को लोकतान्त्रिक और संवैधानिक संस्था से बाहर कर दिया जाना आम बात नहीं कही जा सकती थी लेकिन यह मप्र के रीवा जिले में हुआ जिसका प्रूफ आरटीआई से प्राप्त हुआ.
*जांच में मात्र पंचायत इंस्पेक्टर बालेन्द्र पाण्डेय पर आंशिक कार्यवाही*
जब सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा मामले की शिकायत जिला निर्वाचन अधिकारी से लेकर मप्र निर्चाचन आयोग और भारत निर्वाचन आयोग में की गयी तब आंशिक कार्यवाही देखने को मिली. तत्कालीन मनगवां एसडीएम अखिलेश कुमार सिंह के द्वारा प्रस्ताव भेजते हुए गंगेव में पदस्थ पंचायत इंस्पेक्टर बालेन्द्र पाण्डेय को निलंबित करने और विभागीय जांच के लिए प्रस्ताव जिला पंचायत सीईओ को भेजा गया. जिला पंचायत सीईओ स्वपिल वानखेड़े द्वारा आंशिक कार्यवाही करते हुए बालेन्द्र पाण्डेय को जिला पंचायत कार्यालय रीवा में मात्र अटैच कर दिया गया. हालाँकि यहाँ निलंबन की कार्यवाही करना था लेकिन तर्क यह दिया गया की इसके पहले बालेन्द्र पाण्डेय द्वारा एक अन्य मामले में निलंबन के विरुद्ध हाईकोर्ट जबलपुर से स्टे-स्थगन आदेश प्राप्त हुआ था इसलिए सीईओ जिला पंचायत स्वप्निल वानखेड़े द्वारा पंचायत इंस्पेक्टर को निलंबित न करते हुए मात्र जिला पंचायत में अटैच किया गया. लेकिन जानकारों का यह कहना है की जिला सीईओ का यह तर्क उचित नहीं था क्योंकि बालेन्द्र पाण्डेय को पिछली अनियमितता में निलंबन के विरुद्ध स्थगन मिला था न की अगले सभी भविष्य के निलंबन के विरुद्ध. एक कर्मचारी बार-बार गलती और अपराध करेगा तो हर बार उसके विरुद्ध नई कार्यवाही होगी. कोई भी कोर्ट जब स्थगन देता है तो यह आदेश नहीं देता की भविष्य में दोषी के विरुद्ध कोई कार्यवाही ही न की जाए. अतः जिला पंचायत रीवा के सीईओ द्वारा बालेन्द्र पाण्डेय को निलंबित न किया जाना उचित और न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता.
*लोगों की नजर की कब होगा कैथा में नए प्रधान की नियुक्ति*
जैसा की विदित है की मार्च से लेकर मई 2021 तक निरंतर कोरोना का कहर बना रहा. कोरोना ने लोगों की बेतहाशा जाने लीं. चाहे वह पंचायतें रहीं हों अथवा शहरी इलाके सभी जगह कोरोना से लोग बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं. अब ऐसे में समझा जा सकता है की एक प्रधान विहीन पंचायत में कोरोना काल में व्यवस्थाओं की देखभाल की जिम्मेदारी कैसे निर्वाहित होगी. यद्यपि सचिव शशिकांत मिश्रा को काम मिला था लेकिन पंचायत का खाता बंद होने से अन्य पंचायती व्यवस्थाएं सुचारू रूप से नहीं चल पायीं. यद्यपि बर्खास्त सरपंच संत कुमार पटेल एवं निलंबित तत्कालीन सचिव अच्छेलाल पटेल के कार्यकाल के दौरान तो कैथा पंचायत के और भी बुरे हाल थे. काफी लोग तो इस बात से खुश थे की भ्रष्टाचारी को सजा मिली लेकिन लोग इसकी भी आस लगाए बैठे थे की शायद कोई बेहतर व्यक्ति प्रधान के तौर पर नियुक्त होता और इस कोरोना महामारी के दौर में उनकी राशन, दवा, सुरक्षा और कुछ विकास के कार्य करवाता लेकिन प्रधान की नियुक्ति न होने से समस्या बनी हुई है. यहाँ तक की छोटे मोटे कार्य जिसमे सामान्य आवेदन और प्रमाण पत्रों की जरुरत होती है उसके लिए भी लोगों को परेशान होना पड़ रहा है.
पूरे मामले को लेकर रीवा जिले की पंचायतों में हुए प्रशासकीय समिति घोटाले की जांच के लिए सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी तत्काल उच्चस्तरीय टीम गठित कर आंच की माग की है और दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही की माग की है.


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