भारत में सबसे तेजी से उभरता हुआ वेब न्यूज़ चैनल

भाजपा नेताओं द्वारा बंगाल चुनाव के दौरान मछली खाते हुए किए जा रहे प्रदर्शन ने उनकी ‘सुविधाजनक राजनीति’ का चेहरा उजागर कर दिया है। शक्ति

76
Above News

विकास सचदेव की ब्यूरो रिपोर्ट

आम आदमी पार्टी मध्यप्रदेश के सचिव शक्ति सिंह चंदेल ने अपने बयान में कहा है की भाजपा नेताओं द्वारा बंगाल चुनाव के दौरान मछली खाते हुए किए जा रहे प्रदर्शन ने उनकी ‘सुविधाजनक राजनीति’ का चेहरा उजागर कर दिया है।मेरा सीधा सवाल और बयान इस प्रकार है:जाति और खान-पान का सम्मान: भारत का आदिवासी समाज और दलित जाति सहित कई अन्य दलित समुदाय सदियों से अपनी परंपराओं और संस्कृति के हिस्से के रूप में सुअर के मांस (पोर्क) का सेवन करते आए हैं। यह उनकी विरासत और जीवनशैली का हिस्सा है।भाजपा की दिखावटी राजनीति पर प्रहार: आज जो भाजपा नेता कैमरे के सामने बैठकर मछली खाकर खुद को ‘प्रगतिशील’ दिखा रहे हैं, मैं उनसे पूछना चाहता हूँ— क्या भाजपा के ये नेता आदिवासी समाज और दलित जाति के भाइयों के साथ बैठकर सुअर का मांस (पोर्क) खा सकते हैं? अगर नहीं, तो फिर मछली खाने का यह ढोंग केवल बंगाल के वोटों के लिए क्यों?सामाजिक भेदभाव का सवाल: क्या भाजपा केवल उन्हीं खान-पान की आदतों को स्वीकार करेगी जो उनके वोट बैंक की राजनीति में फिट बैठती हैं? दलितों और आदिवासियों के खान-पान को अक्सर हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है। अगर भाजपा वास्तव में सभी हिंदुओं और भारतीय समुदायों की बात करती है, तो उसे इन वर्गों की खान-पान की विविधता को भी वही सम्मान देना चाहिए जो वह मछली को दे रही है।असली मुद्दों की मांग: मध्य प्रदेश की जनता और विशेषकर हमारे वंचित वर्ग अब इन चुनावी स्टंट्स में नहीं फंसने वाले। आप मछली खाएं या कुछ और, लेकिन यह बताएं कि आपने दलित जाति के युवाओं को कितने सरकारी रोजगार दिए? आपने आदिवासियों की जमीन बचाने के लिए क्या किया? निष्कर्ष:राजनीति का स्तर इतना नहीं गिरना चाहिए कि आप वोट के लिए अपनी विचारधारा बदल लें। आम आदमी पार्टी हर समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति और खान-पान का बिना किसी भेदभाव के सम्मान करती है। भाजपा को यह ‘भोजन का भेदभाव’ बंद कर जनता के बुनियादी काम करने चाहिए।”

खबरों के अपडेट पाने के लिए हमारा फेसबुक पेज लाइक करें| आप हमारा एंड्राइड ऐप भी डाउनलोड कर सकते है|

Comments are closed.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Privacy & Cookies Policy
E-Paper