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मॉनसून में करें आखों की खास केयर

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जब भी मानसून का मौसम आता है तो मन खुश हो जाता है, गर्मी से निजात, रिमझिम फुहारों से खुशगवार मौसम, बारिश की छटा ही निराली होती है। लेकिन मानसून के सीजन में आखों की विशेष देखभाल भी जरूरी होती है। तरह तरह के आँखों के संक्रमण इस ही मौसम में पनपते है। बच्चें एवं स्कूल कालेज जाने वाले छात्रों को विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि उनमें ही संक्रमण अधिक फैलता है। मध्य जून से सितम्बर तक की गर्मी में काफी उमस एवं धूप तीखी होती है. इन महीनों में दोहरा मौसम होता है अर्थात् वर्षा एवं गर्मी का मिला-जुला मौसम रहता है. जिसके कारण मानव शरीर का सबसे संवेदनशील अंग आंख जल्दी बाहरी वातावरण के उतार चढ़ाव झेलती है. इस प्रदूषण भरे वातावरण एवं भागदौड़ की जिंदगी में लोगों द्वारा आंखों की देखभाल के प्रति लापरवाही बरती जाती है.
बरसात में होने वाली सामान्य इंफेक्षन
कन्जकटीवाईटिस
आँखों का सफेद भाग एवं पलक का अन्दरूनी भाग कन्जकटीवा कहलाता है। आंख के इस भाग में जलन, लाली और सूजन होने को कन्जकटीवाईटिस या नेत्रशोथ कहते है। इसके मुख्य कारण है इन्फेक्शन और एलर्जी, इस मौसम में आने वाले वायरल बुखार जो शरीर की प्रतिरोघक क्षमता को कम कर देते है उसकी वजह से भी नेत्रशोथ हो जाता है। इस मौसम में सबसे ज्यादा फैलने वाली आम बीमारी यही है। कन्जकटीवाईटिस का संक्रमण बहुत तेजी से फैलता है। आँखों को सबसे अधिक कन्जकटीवाईटिस से ही बचाने की जरूरत होती है।
स्टाई
स्टाई पलको के आसपास लाली लिए हुए आई सूजन को कहते है। इसमें पस बन जाता है और पस के पूरी तरह साफ होने पर ही ठीक होती है। इसके होने का मुख्य कारण बिना धूले हाथों से आँखों को रगड़ना एंव बेक्टिरिया है। ये बिमारी भी इस मौसम में आम है।
कॉर्नील अल्सर
आंखों में किर-किराहट व जलन होने लगती है. ऐसा लगता है कि उनमें कुछ गिर पाया हो. रोगी को काफी तकलीफ होती है. आंखों को धूप तथा तेज रोशनी चुभती है. जिससे आंखों को पूरी तरह खोलने से रोगी हिचकता है. आंखों में थकान तथा दर्द भी महसूस होता है. कभी-कभी आंखों की पुतलियों पर दाने पड़ जाते हैं. उपयुक्त उपचार न होने की स्थिति में दूसरे बैक्टीरिया भी आंखों को प्रभावित कर देते हैं. जिससे सफेद गाढ़ा पदार्थ आंखों के कोने तथा पलकों के किनारों पर एकत्रा हो जाता है. यह कीचड़ इतना हो सकता है कि जब सुबह व्यक्ति उठता है उसकी दोनों पलकें चिपकी होती है.
उपचार
रोग की प्रारंभिक व्यवस्था आरंभ होते ही तुरंत नेत्रा रोग विशेषज्ञ की राय लें. बिना डॉक्टरी सलाह लिए कोई दवा न लें. साथ ही मेडिकल स्टोर से स्टेरायड वाली दवा न लें. आंखों का तेज रोशनी से बचाव करें. आंखों को तेज रोशनी से होने वाली परेशानी से बचने के लिए आंखों पर गहरे रंग का शीशे वाला धूप का चश्मा पहनना चाहिए. आंखों को पट्टी बांधकर बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे आखों से निकलने वाले पानी की स्वतंत्रा निकासी रूक जाती है तथा पट्टी बांधने से हुई गर्मी आंख में इन्फेक्शन को और बढ़ावा देती है. इस रोग की चिकित्सा केवल दो बातों पर निर्भर करती है, पहली किसी उचित विसंक्रामक द्रव से आंखों की बार-बार सफाई एवं दूसरी आंखों में सेकेन्डरी इन्फेक्शन को रोकने के लिए एंटीबायोटिक का प्रयोग. इसका प्रमुख कारण आंखों से निकलने वाले हानि कारक पदार्थों को धेना है. इस तरह आंखों को तब तक धुलना चाहिए जब तक कि आंखों से निकलने वाला पदार्थ कीचड़ पूरी तरह से साफ न हो जाए।

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